पितृसत्ता में एक बेटी की विदाई
आज विदाई का दिन आया है,
सबकी आँखों में पानी लाया है।
पर मेरे मन में एक सवाल है,
क्या सच में मैं इस घर का बोझ थी?
बाबुल का घर, बस कुछ सालों का ठिकाना था?
यहाँ हर कोना मुझे बेगाना लगा,
हर दीवार ने मेरे सपने देखे थे।
पर सब कहते, “यह तो पराया धन है”,
शायद इसीलिए मेरा मन यहाँ नहीं रमा था।
खेल-कूद सब पीछे छूट गए,
अपने खिलौने भी पराए हो गए।
माँ की ममता में भी एक दूरी थी,
“बेटी, पति के घर ही तेरा असली घर है”, यही सीख थी।
और तब…
माँ-बाप आँसू छुपाके, बेटी को “जा, जा, अब वही घर है तेरा” बोलकर हल्के से धक्के देते हैं।
उनके दिल का बोझ, उनकी छुपी हुई पीर,
बस यही बताती है कि विदाई है एक तकदीर।
आज जब ये बंधन टूट रहे हैं,
मेरे कदम आगे बढ़ रहे हैं।
ना कोई शिकवा, ना कोई शिकायत है,
बस एक टीस है, एक अनचाहा एहसास है।
मैं चली अपने नए ठिकाने,
जहाँ शायद मुझे अपनापन मिले।
पर इस घर को अलविदा कहते हुए,
क्या कभी मैं तुम्हारी अपनी थी?
– क्षमा राव, मुंबई
कवयित्री

Downloaded a game from jeekhogamedownload today. The download process was easy and the selection good enough. Definitely worth checking out. Download here: jeekhogamedownload