भीम प्रज्ञा कविता
सागर सी आँखें
ये आँखें नहीं हैं तुम्हारी, ये दो गहरे सागर हैं,
जिनमें हज़ारों शांत तूफ़ान पलते हैं, मेरी जान।
इनमें जो सपने हैं, वो केवल ख़्वाब नहीं,
बल्कि हमारे आने वाले कल के सुंदर नज़ारे हैं।
इन सागरों की गहराई में मुझे खो जाने दो,
इन सपनों की दुनिया में बस जाने दो।
ये आँखें जहाँ रुक जाएँ, वहीं मेरा प्यार है,
ये आँखें, मेरे मन का एक सच्चा दर्पण हैं।
इनमें एक जादू है, एक अजीब सा नशा है,
इनमें डूबकर जीना ही हमारी जीवन की सुंदरता है।
ये नज़रें जो मिल जाएँ, तो सब कुछ मिल जाए,
बस इन्हीं आँखों में मेरी दुनिया रहती है।
– क्षमा राव, मुंबई
कवयित्री
