संपादकीय @ Advocate Haresh Panwar
*“मंच, माइक और पर्ची : राजस्थान की राजनीति में अनकहा विद्रोह”*
राजनीति कभी-कभी अपने आप में ऐसा दृश्य रच देती है, जो किसी व्यंग्यकार की कलम से नहीं, बल्कि सत्ता के मंच से जन्म लेता है। राजस्थान के टोंक-सवाई माधोपुर क्षेत्र में कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा का वह एक वाक्य— “अब पर्ची आ गई, मेरे को बैठना पड़ेगा”—सिर्फ एक क्षणिक संवाद नहीं रहा, बल्कि उसने पूरे प्रदेश की राजनीतिक कार्यशैली पर एक तीखा प्रश्नचिह्न लगा दिया। यह वाक्य जितना हल्का सुनाई देता है, उतना ही भारी संदेश अपने भीतर समेटे हुए है। यह एक मंत्री की बेबसी भी है, सत्ता के भीतर पनप रही असहजता भी और उस अदृश्य तंत्र की स्वीकारोक्ति भी, जो लोकतंत्र को ‘निर्देशित व्यवस्था’ में बदलता जा रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
राजस्थान की राजनीति में ‘पर्ची शासन’ शब्द कोई नया नहीं है, लेकिन जब सत्ता के भीतर बैठा मंत्री सार्वजनिक मंच से इस शब्द को जीवंत कर दे, तो मामला केवल विपक्षी आरोपों तक सीमित नहीं रहता। यह स्वयं सरकार के अंदर से उठी वह आवाज़ है, जो यह बताती है कि निर्णय लेने की शक्ति कहीं और केंद्रित हो चुकी है। लोकतंत्र में मंत्री बोलता है, सरकार बोलती है, लेकिन जब पर्ची बोलने लगे और जनप्रतिनिधि बैठ जाए, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था का संतुलन गड़बड़ा चुका है।
तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह पर्ची कार्यक्रम के समय-सारिणी या औपचारिक निर्देश से जुड़ी हो सकती है, और स्वयं मंत्री भी पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि वह आयोजन संबंधी सूचना थी। लेकिन राजनीति में शब्द केवल अपने शाब्दिक अर्थ में नहीं बोले जाते, वे अपने पीछे एक पूरा संदर्भ, इतिहास और मनोदशा लेकर आते हैं। यही कारण है कि यह एक वाक्य राजस्थान की मौजूदा शासन शैली का प्रतीक बनकर सामने आ गया।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि किरोड़ी लाल मीणा लंबे समय से अपनी ही सरकार की कार्यशैली को लेकर असहजता और नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। कभी प्रशासनिक फैसलों पर सवाल, कभी जनहित के मुद्दों पर खुली टिप्पणी—उनके बयान अक्सर यह संकेत देते रहे हैं कि सत्ता के भीतर सब कुछ सहज और संतुलित नहीं है। ऐसे में जब मंच पर “पर्ची” का जिक्र हुआ, तो वह केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं रहा, बल्कि उस अदृश्य तंत्र का प्रतीक बन गया, जिसे आम भाषा में ‘पर्ची शासन’ कहा जाने लगा है।
राजस्थान की राजनीति में यह शब्द नया नहीं है, लेकिन अब यह आरोपों से निकलकर सत्ता के मंच पर खुद को व्यक्त करने लगा है। लोकतंत्र में मंत्री जनता से संवाद करता है, योजनाओं का बखान करता है, जवाबदेह होता है। लेकिन जब मंत्री यह संकेत दे कि उसे कब बोलना है और कब बैठना है, यह भी किसी पर्ची से तय हो रहा है, तो लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह वही स्थिति है, जिसे कवि ने वर्षों पहले कहा था—
“खैर खुशी खासी बैर प्रीत मत पान।
यह छुपाए न छुपी जानत सकल जहान।”
अर्थात भीतर का भाव कितना भी छुपाने की कोशिश की जाए, वह किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाता है।
राजस्थान की मौजूदा शासन व्यवस्था में यही ‘छुपी हुई जान’ बार-बार सामने आती दिख रही है। ग्राम पंचायतों से लेकर नगर निकायों तक, परिसीमन से लेकर वित्तीय अधिकारों तक, हर जगह यह भावना पनप रही है कि निर्णय ऊपर से थोपे जा रहे हैं। पंचायत राज, जिसे लोकतंत्र की जड़ कहा जाता था, आज खुद अपनी जड़ों की तलाश में भटकता नजर आता है। सरपंचों का कार्यकाल खत्म हो चुका है, प्रशासक बैठे हैं, लेकिन फाइनेंस कमीशन की राशि समय पर नहीं पहुंच रही। विकास की योजनाएं कागजों में हैं, जमीन पर सन्नाटा है।
सरकार उद्घाटन, यात्राओं और बड़े आयोजनों में व्यस्त है, जबकि जमीनी हकीकत में योजनाएं दम तोड़ती दिखाई दे रही हैं। पूर्ववर्ती सरकार की योजनाओं को या तो नाम बदलकर पेश किया जा रहा है या इस तरह संशोधित किया जा रहा है कि उनकी मूल आत्मा ही समाप्त हो जाए। जनता के लिए यह सब केवल आंकड़ों और घोषणाओं का खेल बनकर रह गया है। ऐसे माहौल में विपक्ष के आरोप स्वाभाविक हैं, लेकिन असली चिंता तब पैदा होती है जब सत्ता के भीतर से भी असंतोष की आवाजें निकलने लगें।
किरोड़ी लाल मीणा का बयान उसी अंदरूनी असंतोष का अनायास फिसला हुआ शब्द लगता है। यह कोई औपचारिक विरोध नहीं था, न ही कोई योजनाबद्ध हमला, लेकिन राजनीति में कभी-कभी सबसे तीखी चोट वही होती है, जो अनायास लग जाती है। यह बयान बताता है कि सरकार के भीतर लोकतांत्रिक स्पेस सिकुड़ रहा है और निर्णयों का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा है। ब्यूरोक्रेसी का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि जनप्रतिनिधि खुद को हाशिये पर महसूस करने लगे हैं—ऐसी धारणा जनता के बीच भी तेजी से बन रही है।
व्यंग्य की ताकत यही है कि वह बिना नारा लगाए व्यवस्था को आईना दिखा देता है। “पर्ची आ गई” वाला वाक्य भी उसी आईने की तरह है, जिसमें सत्ता को अपना प्रतिबिंब दिख रहा है। सवाल यह नहीं है कि पर्ची कार्यक्रम की थी या नहीं, सवाल यह है कि जनता ने उसमें क्या पढ़ा। और जनता ने उसमें वही पढ़ा, जो वह पिछले कुछ समय से महसूस कर रही है—कि लोकतंत्र निर्देशों में सिमटता जा रहा है और संवाद कम होता जा रहा है।
अगर सरकार इस पूरे प्रसंग को केवल एक मजाक या गलत व्याख्या मानकर आगे बढ़ जाती है, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। यह समय आत्ममंथन का है। यह सोचने का समय है कि क्या शासन व्यवस्था जनता के भरोसे चल रही है या फाइलों, नोट्स और पर्चियों के इशारों पर। लोकतंत्र में ताकत का स्रोत जनता होती है, न कि अदृश्य निर्देश।
राजस्थान की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां व्यंग्य केवल मनोरंजन नहीं, चेतावनी है। किरोड़ी लाल मीणा का एक वाक्य इस चेतावनी को मुखर कर गया। अब यह सरकार पर निर्भर है कि वह इसे हल्के में लेती है या इसे लोकतांत्रिक सुधार का अवसर मानती है। क्योंकि इतिहास गवाह है—जब सत्ता जनता की आवाज से दूर जाती है, तो एक दिन जनता सत्ता से दूर हो जाती है। और तब पर्चियां नहीं, जनादेश बोलता है। क्योंकि सत्ता को यह समझना होगा कि लोकतंत्र आदेश से नहीं, विश्वास से चलता है। जनता केवल योजनाओं के नाम नहीं, उनके प्रभाव को देखती है। और जब उसे लगता है कि व्यवस्था उसकी पहुंच से दूर होती जा रही है, तो असंतोष शब्दों, इशारों और व्यंग्य में बाहर आने लगता है।
“पर्ची आ गई” कोई सामान्य वाक्य नहीं रहा। यह उस सन्नाटे की आवाज बन गया है, जो जनता और सत्ता के बीच पसर रहा है। सरकार चाहे तो इसे एक क्षणिक घटना मानकर भूल जाए, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे क्षण ही बड़े बदलावों की भूमिका बनते हैं।
अंततः लोकतंत्र में आखिरी पर्ची जनता के हाथ में होती है—मतपत्र की पर्ची। जब वही बोलती है, तो न मंच का अनुशासन काम आता है, न मौन के निर्देश। तब केवल जनादेश बोलता है, और वही तय करता है कि सत्ता सच में जनता की है या केवल पर्चियों की।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“जब सत्ता बोलने से पहले अनुमति मांगने लगे और सच मुस्कराकर चुप हो जाए, तब समझिए लोकतंत्र को आवाज़ नहीं, साहस की ज़रूरत है।”
