संपादकीय @ Advocate Haresh Panwar
“मनुष्य की पहचान: जन्म से नहीं, कर्म से”
प्राचीन काल से ही मानव समाज में एक सवाल बार—बार उठता रहा है कि किसी मनुष्य की सच्ची पहचान क्या है? क्या वह उसकी जाति है, उसका वंश है, उसका कुल-खानदान है, या उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति? यह प्रश्न जितना पुराना है, उतना ही संवेदनशील भी। इतिहास के पन्नों में दृष्टि डालें तो हमें स्पष्ट दिखता है कि कई सभ्यताएँ इस गलत धारणा के कारण बिखर गईं कि मनुष्य का मूल्य उसके जन्म या बाहरी पहचान से निर्धारित होता है। जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल विपरीत है — मनुष्य का असली परिचय उसके विचारों की गुणवत्ता, उसके चरित्र की मजबूती और उसके कर्मों की पुण्यता से होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
समाज ने सदियों तक जन्म आधारित भेदभाव को अस्तित्व दिया, परंतु मानवता ने हमेशा एक ही सन्देश दिया — मनुष्य महान जन्म से नहीं, कर्म से होता है। यही संदेश बुद्ध से लेकर कबीर, फुले, आंबेडकर और आधुनिक विचारकों तक की परंपरा में गूंजता रहा है। उनकी यह आवाज़ बताती है कि किसी के शरीर का रंग, किसी के पिता का नाम, या वह किस घर में पैदा हुआ — यह किसी भी तरह से उसकी महानता का पैमाना नहीं हो सकता।
मनुष्यता का वास्तविक मूल्यांकन तब होता है जब हम उसके व्यवहार को देखते हैं, उसकी सोच को पढ़ते हैं और उसके कर्मों के प्रभाव को समझते हैं। एक इंसान जिसके पास पद या पैसा तो बहुत है, पर दिल में संवेदना नहीं, वह समाज के लिए कितना उपयोगी है? इसके विपरीत, एक सामान्य व्यक्ति जिसके पास धन नहीं, वंश का गौरव नहीं, पर हृदय में करुणा, ईमानदारी और सेवा का भाव है — वही वास्तव में समाज का आधार स्तंभ है।
महानता का अर्थ कभी भी ऊँचे पद, बड़ी संपत्ति या उच्च कुल से नहीं रहा। यह मन के भीतर के प्रकाश से है। जितना प्रकाश भीतर होता है, उतनी ही रोशनी बाहर फैलती है। जो व्यक्ति स्वयं को सुधारता है, जो अपने विचारों को श्रेष्ठ करता है, जो अपने कर्मों को मानवीय मूल्यों से जोड़ता है — वही व्यक्ति समाज को ऊँचाई देता है, प्रेरणा देता है और दूसरों के जीवन में आशा की किरण बनता है।
पहले के जमाने में लोगों के पास इतना साधन नहीं था, इतनी तकनीक नहीं थी, फिर भी मानवता जीवित थी। किसी के घर दुख आया तो पूरा गांव साथ खड़ा हो जाता था। घरों के दरवाजे बंद नहीं होते थे, दिलों के द्वार भी खुले रहते थे। आज भौतिक उन्नति जरूर हुई है, पर इंसानी भावनाओं में कहीं दूरी आ गई है। तब लोगों का परिचय जाति या कुल से नहीं, बल्कि उनके मानवता-पूर्ण व्यवहार से होता था। यही कारण है कि सामाजिक एकता मजबूत थी, रिश्तों में गर्माहट थी और लोगों के बीच भरोसा था।
आज जब दुनिया फिर से अनेक प्रकार की विभाजक रेखाओं में बँटने लगी है — जाति, धर्म, वर्ग, भाषा, क्षेत्र — ऐसे समय में प्राचीन मानव मूल्यों की इस सीख को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है। समाज की प्रगति तब होती है जब हम दूसरों को उनके जन्म से नहीं, उनके कर्म और चरित्र से देखते हैं। परंपराएँ तब छोटी पड़ जाती हैं जब विचार ऊँचे हो जाते हैं। और मनुष्य तब महान बनता है जब वह अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर समानता, भाईचारा, न्याय और मानवता को अपनाता है।
जीवन में कुछ सवाल बहुत बुनियादी होते हैं, जैसे —
क्या मेरी पहचान मेरे पिता के नाम से तय होनी चाहिए?
क्या मेरा मूल्य इस बात से तय हो कि मैं किस जाति में पैदा हुआ?
क्या जन्म से मिला कोई लेबल यह बता सकता है कि मैं कितना महान या कितना मूल्यवान हूँ?
निश्चित ही नहीं।
ये प्रश्न जितने सरल हैं, उतने ही गहरे भी, और इनका उत्तर मानव इतिहास बार—बार देता आया है: मनुष्य की पहचान उसके कर्म हैं, जन्म नहीं।
हम जिस समाज में अच्छे मनुष्य को बड़े पद से ऊपर रखते हैं, जो व्यक्ति की मानवता को जाति से ऊँचा मानता है, जो विचारों को वंश पर भारी समझता है — वही समाज सभ्यता की ओर बढ़ता है। ऐसे समाज में भेदभाव की जगह नहीं होती, अन्याय की गुंजाइश नहीं होती और नफरत का कोई अर्थ नहीं होता।
यदि हम चाहते हैं कि समाज सुंदर बने, न्यायपूर्ण बने, समानतापूर्ण बने, तो हमें यह विश्वास अपने आचरण में उतारना होगा कि हर मनुष्य पहले मनुष्य है, उसके बाद कुछ और।
मनुष्य की असली महानता इस बात में है कि वह अपने से छोटे को कैसा व्यवहार देता है, कमजोरों की पीड़ा को कैसे समझता है, और समाज के लिए क्या योगदान करता है। उसके विचारों की शुद्धता, उसके कर्मों की गरिमा और उसके व्यवहार की विनम्रता ही उसकी सच्ची पहचान है।
आज हमें प्राचीन काल के इस सरल, पर गहरे सत्य को फिर से अपनाने की आवश्यकता है:
“जन्म हमें केवल शरीर देता है, परंतु चरित्र हम खुद बनाते हैं; और उसी चरित्र से हमारी पहचान होती है।”
यदि हम अपने भीतर यह भाव जागृत कर सकें, तो न केवल हम स्वयं महान बनेंगे, बल्कि समाज को भी नई संस्कृति देंगे — मानवता की, समानता की, और न्याय
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“जिस मन में कड़वाहट ठहर जाए, वहां सुख कभी टिक नहीं सकता; और जिस मन में करुणा बस जाए, वहां दुख भी ज्यादा देर रुक नहीं पाता।”
