भीम प्रज्ञा अलर्ट जो सवाल पूछने की हिम्मत रखता है, वही बदलाव की पहली ईंट रखता है; चुप्पी अक्सर सुविधा होती है, लेकिन इतिहास हमेशा साहस को याद रखता है।
संपादकीय@हरेश पंवार
शिक्षा पर ताला, नीतियों की चाबी और बच्चों का भविष्य
आज की शिक्षा व्यवस्था को देखकर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ताले अब स्कूलों के दरवाजों पर नहीं, बल्कि नीतियों में लगने लगे हैं। कागजों में सुधार, फाइलों में आदेश और जमीन पर अराजकता—यही आज की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है। शिक्षा के मंदिरों में पढ़ाई से अधिक प्रयोग हो रहे हैं और प्रयोगशाला बना दिया गया है उन बच्चों के भविष्य को, जिनका कोई कसूर नहीं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
इन दिनों स्कूलों में प्रैक्टिकल परीक्षाएं चल रही हैं। कई विषयों का सिलेबस अभी अधूरा है, लेकिन तभी अचानक तबादलों की सूची जारी कर दी जाती है। जिन शिक्षकों ने पूरे साल बच्चों को पढ़ाया, जिनसे छात्र भावनात्मक और शैक्षणिक रूप से जुड़े, उन्हें आनन-फानन में स्कूल से विदा कर दिया जाता है। सवाल यह है कि जिन विषय अध्यापकों का पाठ्यक्रम अधूरा है, उन बच्चों का क्या होगा? क्या तबादला नीति बच्चों के भविष्य से ज्यादा जरूरी हो गई है?
यही कारण है कि कई स्थानों पर बच्चों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा। कहीं स्कूलों के बाहर तालाबंदी हुई, कहीं नारे लगे। यह कोई अनुशासनहीनता नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ बच्चों का मौन विद्रोह है। जब शिक्षा व्यवस्था बच्चों को नहीं सुनती, तो बच्चे व्यवस्था को आईना दिखाने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
दूसरी ओर मौसम का बहाना बनाकर छुट्टियों की झड़ी लग जाती है। थोड़ी ठंड, थोड़ी गर्मी, थोड़ी बारिश—और आदेश जारी, “कल सभी विद्यालय बंद रहेंगे।” सवाल यह नहीं कि बच्चों की सुरक्षा जरूरी नहीं, सवाल यह है कि क्या पूरे प्रदेश में मौसम एक जैसा होता है? भारत विविधताओं का देश है, जहां एक ही जिले के अलग-अलग ब्लॉकों का मौसम अलग होता है। फिर एक ही आदेश से सभी स्कूलों में छुट्टी घोषित करना कितनी व्यवहारिक सोच है?
क्या हम बच्चों को इतना कमजोर और आलसी बना रहे हैं कि वे परिस्थितियों से संघर्ष करना ही भूल जाएं? जीवन में चुनौतियों से जूझे बिना क्या कोई मजबूत नागरिक बन सकता है? स्कूल केवल किताबें पढ़ने की जगह नहीं होते, बल्कि जीवन से लड़ने की तैयारी की पाठशाला होते हैं। लेकिन यहां तो बच्चों को रिमोट कंट्रोल की तरह चलाया जा रहा है—आज छुट्टी, कल छुट्टी, परसों आदेश।
एक और गंभीर सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक आखिर शिक्षक हैं या सरकारी एजेंसी? इस सत्र में शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा समय चुनावी कामों में लगाया गया—एसआईआर, वोटर लिस्ट निरीक्षण, बूथ लेवल ड्यूटी। जब थोड़ा सा पढ़ाने का समय आया, तो कभी छुट्टी, कभी तबादला। क्या शिक्षा अब प्राथमिकता नहीं रही, बल्कि केवल एक सहायक विभाग बनकर रह गई है?
विडंबना यह है कि यदि कोई शिक्षक व्यवस्था पर सवाल उठा दे, बच्चों की पीड़ा को आवाज दे दे, तो उसे तुरंत दंड का पात्र बना दिया जाता है। सितंबर तक बच्चों को पाठ्य पुस्तकें नहीं मिलीं। एक शिक्षक ने सोशल मीडिया पर यह सवाल उठाया, तो उसे सजा भुगतनी पड़ी। यानी समस्या उठाना अपराध है, चुप रहना सेवा है। यह कौन सा लोकतंत्र है, जहां बच्चों की किताबों से ज्यादा महत्वपूर्ण अधिकारियों की चुप्पी है?
जहां संसाधन नहीं हैं, वहां शिक्षक नहीं। और जहां संसाधन हैं, वहां अकारण तबादले। शिक्षा में राजनीतिकरण इतना हावी हो चुका है कि नीति बच्चों के हित में नहीं, बल्कि आंकड़ों और आदेशों के हित में बन रही है। शिक्षा व्यवस्था को चलाने वाले उच्च अधिकारी शायद यह भूल गए हैं कि स्कूल फाइलों से नहीं, कक्षाओं से चलते हैं।
आज जरूरत है इस बात की कि शिक्षा को प्रयोगशाला नहीं, प्राथमिकता बनाया जाए। तबादले सत्र समाप्ति के बाद हों, मौसम आधारित निर्णय स्थानीय स्तर पर लिए जाएं और शिक्षकों को पढ़ाने दिया जाए, डराने नहीं। बच्चों का भविष्य किसी नीति की भूल का शिकार न बने।
अगर यही हाल रहा तो आने वाली पीढ़ी किताबें नहीं, आदेश पढ़ेगी; सवाल नहीं, केवल सहन करना सीखेगी। शिक्षा पर ताला लगाने की यह नीति अगर नहीं रुकी, तो आने वाले समय में ताले स्कूलों पर नहीं, बल्कि समाज की सोच पर लगेंगे। और तब हम पूछते रह जाएंगे—गलती किसकी थी?
भीम प्रज्ञा अलर्ट
जो सवाल पूछने की हिम्मत रखता है, वही बदलाव की पहली ईंट रखता है;
चुप्पी अक्सर सुविधा होती है, लेकिन इतिहास हमेशा साहस को याद रखता है।
