झोला पुस्तकालय के जन्मदाता बुद्धशरण हंस
भीम प्रज्ञा सर्च स्टोरी@डाॅ. रूपचंद गौतम
वरिष्ठ पत्रकार मोहनदास नैमिशराय एक बार कह रहे थे बुद्धशरण हंस आइएएस हैं पर उनका रहन-सहन उस तरह का नहीं जैसे कि एक आइएएस का होता है। बात तो नैमिशराय जी की सही थी। मैं भी उनके निवास स्थान पर गया था। पहनावे से लेकर रहन-सहन तक एकदम सदा था। वैचारिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘हंस’ जी एक प्रशासनिक अधिकारी के साथ-साथ एक कुशल संपादक, लेखक और दाशर्निक भी थे। यही स्थिति डाॅ. धर्मवीर की बड़े ही नजदीकी से मैंने महसूस की थी। ये दोनों आईएएस दलित समाज के अन्य आइएएस व्यक्तियों की तरह नहीं थे। ये दिखावा में तनीक भी विश्वास नहीं करते थे। इनका विश्वास बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर के मिशन में था। झोला पुस्तकालय का विचार देने वाले बुद्धशरण हंस पहले दलित थे।
बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर को आत्मसात करके दलित समाज के गिने-चुने लोगों ने किताबें लिखनी प्रारंभ की, तो कुछ ने अपने घरों मेें किताबें रखनी प्रारंभ की पर जिले से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पुस्तकाल का निर्माण नहीं कर सके। आज देश में ऐसा पुस्तकालय नहीं है जहां अनुसूचित जाति वर्ग के समाचार पत्र-पत्रिकाएँ एवं पुस्तकों को शोधार्थी एक जगह बैठकर पढ़ सके। यह सच है कि पुस्तकालय खोलने के लिए मकान चाहिए, अलमीरा चाहिए, फर्निचर चाहिए। इतना न होने के कारण बुद्धशरण हंस जी ने झोला पुस्तकालय प्रारंभ किया। हंस जी का कहना था कि एक झोले में दस किताब रख लो और आगे लोगों को पढ़ाओ। दस के बाद फिर दस और दे दो। पुरानी दस लेकर आगे दे दो। इस तरह झोला पुस्तकालय पटना में एक आइएएस अधिकारी द्वारा प्रारंभ हुआ। ऐसा काम न किसी प्रोफेसर ने किया और न ही किसी आइपीएस ने। अधिकारी नेताओं की चरण बंदना करने में मस्त रहे और नेता अपने आलाकमान के गुण-गान में। दलित समाज के अधिकांश नेता बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर का नाम जरूर लेते रहे पर ऐसा काम किसी ने नहीं किया जो बुद्धशरण हंस जी ने किया। हंस जी का कहना था कि पुस्तकालय का अभाव, झोला पुस्तकालय। इसके बाद बक्सा पुस्तकालय। अलमीरा पुस्तकालय, फिर होल पुस्तकालय होगा। होल पुस्तकालय स्थापित करने से पहले ही हंस जी हम सब से विदा हो गए पर जिम्मेदारी जरूर देकर गए देखते हैं कितने लोग हंस जी के विचार को आगे ले जाएंगे?
बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर ने अपने जीवन में समाज को जागृत करने के लिए एक नहीं पूरे पाँच समाचार-पत्र एवं पत्रिकाएँ प्रकाशित की थी। उन्होंने पीपुल्स एजुकेशन सोसायटी बनाकर कई महाविद्यालय स्थापित किए। आइएएस, आइपीएस, पीसीएस, डाॅक्टर, वकील, इंजीनियर एवं प्रोफेसर आदि ने विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय की तो बात ही छोड़िए एक भी ऐसा समाचार पत्र एवं पत्रिका भी प्रकाशित नहीं की, जिसका राष्ट्रीय स्तर पर नाम लिया जा सके। शोध संस्थान के लिए भी ऐसे अधिकारी, समाज सेवी, नेता कोई प्रयास नहीं कर सके। हंस जी जैसे आइएएस नहीं बन सके। हंस जी अपनी बात को तर्क के साथ कहते थे। उनकी भाषा किसी को चुभती नहीं थी। अपने स्तर पर ‘अम्बेडकर मिशन पत्रिका’ जब से प्रारंभ की वह आज भी पाठकों के हाथों में बखूबी पढ़ी जा सकती है। जितने हंस जी भाषा से मजबूत थे उतने ही चरित्र से भी।
बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर के विचार को दरकिनार करते हैं आइएएस, आइपीएस ने ऐसा वर्ग बना लिया जिसमें गरीब आदमी झांक भी नहीं सकता। सूट-बूट और अच्छे कोठी-बंगले में रहने लगे। भोज का मृत्यु से कोई संबन्ध नहीं है। किसी का बेटा मर गया तो वह कई दिनों तक कुछ नहीं खाता। धीरे धीरे वह चाय पीने लगता है। इसके विपरीत भोज है। मरने का मतलब आर्थिक सम्पन्नता चले जाना। कमाने लायक है तो वह चला गया। पेशनर है तो वह चला गया। कुछ नहीं तो सलाहा देने वाला चला गया। शोक बढ़ गया। खाना प्रसन्ता का प्रतीक हैं। जब भी कोई खाता है तो प्रसन्न होकर ही खाता है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए खाता है। अच्छे मेल-मिलाप के लिए खाता है। किसी के घर जाते हैं तो बात से पहले कुछ खा ले। खाने का सम्बंध सुख से है। मृत्यु के बाद दुःख से है। मृत्युु भोज का विचार ब्राह्मण के दिमाग की उपज हीै। हमें आर्थिक दंड देने के लिए मृत्युभोज ब्राह्मण का एक षडयंत्र है। मौत के समय आदमी बहुत कमजोर हो जाता है। मृतक भोज सामाजिक अपराध है।
हमने शैक्षिक संस्थानों की तरह ध्यान नहीं दिया। अपने-अपने क्षेत्र के लोग शैक्षिक संस्थान खोलते तो हमारे समाज की शिक्षा मजबूत होती। बेरोजगारी कम होती। बाबा साहेब डाॅ. अम्बेडकर के साथ हंस जी के विचार सफल होता। बहुजन समाज के पढ़े-लिखे युवा कांवड़ लेने व हिंदू कर्मकांडों में लिप्त होने लगे। पुजारी दस बजे के बाद मंदिर का ताला लगा देता है। शमशान घाट का ताला लगा देता है। यदि इन्होेंने यह सोचा होता कि भगवान अपनी रक्षा खुद नहीं कर सकता तो हमारी क्या करेगा? सच कहा जाए तो हंस जी पत्रिका के माध्यम से वर्तमान को सदैव लोगों को सचेत करते रहे। जैसे-जैसे हंस जी को पढ़ेंगे वैसे-वैसे उनके विचार हमें झकझोरते रहेंगे।
