भीम प्रज्ञा संपादकीय
खेत में खड़ा किसान जब बीज बोता है, तो वह केवल अनाज नहीं, बल्कि अपने सपनों को भी धरती में रोपता है। वह मौसम की मार सहता है, दिन-रात मेहनत करता है, तब जाकर उसकी फसल तैयार होती है। लेकिन विडंबना देखिए—जिस किसान ने धरती से अन्न पैदा किया, वही किसान अपनी उपज को बेचने के लिए कागज़ों के जाल में फंस जाता है। सवाल यह है कि किसान की इस दुविधा को आखिर कौन समझे? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हाल ही में जारी किए गए नियमों ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। अब किसान को अपनी फसल मंडी में बेचने के लिए जमाबंदी का ऑनलाइन रिकॉर्ड, गिरदावरी रिपोर्ट और कई प्रकार के प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने होंगे। यदि पटवारी और मंडी की रिपोर्ट में जरा सा भी अंतर पाया गया, तो किसान की फसल खरीदने से इंकार किया जा सकता है। यह व्यवस्था कागज़ों में भले ही पारदर्शिता लाने का प्रयास लगे, लेकिन जमीनी हकीकत में यह किसानों के लिए एक नया संकट बनकर सामने आ रही है।
सबसे अधिक परेशानी बटाईदार, सीमांत और लघु किसानों को हो रही है। जो किसान अपनी जमीन पर नहीं, बल्कि बटाई पर खेती करते हैं, उन्हें ₹500 के स्टांप पेपर पर शपथ पत्र देना अनिवार्य कर दिया गया है। यह केवल एक कागज़ नहीं, बल्कि एक आर्थिक बोझ है। ₹500 का स्टांप,₹150 टेक्स चार्ज, ₹100 की लिखाई, ₹100 का नोटरी और शहर जाने-आने का खर्च—कुल मिलाकर यह प्रक्रिया लगभग ₹1000 तक पहुंच जाती है। अब सवाल उठता है कि एक छोटा किसान, जिसकी आमदनी पहले ही सीमित है, वह यह अतिरिक्त खर्च कैसे वहन करेगा?
स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हुए हों। कई किसानों के पास आधा या एक बीघा जमीन ही है, और वह भी कई हिस्सों में विभाजित है। ऐसे में हर हिस्से के लिए सहमति और शपथ पत्र जुटाना एक बड़ी चुनौती बन जाती है। तकनीकी रूप से सही दिखने वाला यह नियम व्यवहारिक रूप से किसानों को मंडी तक पहुंचने से रोक रहा है।
किसान के लिए यह केवल कागज़ी प्रक्रिया नहीं, बल्कि समय और ऊर्जा की बर्बादी भी है। जब वह खेत में काम करने के बजाय ई-मित्र केंद्रों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है, तो उसकी उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। एक तरफ वह प्राकृतिक आपदाओं—तेज गर्मी, कड़ाके की ठंड, बरसात और सूखे—से जूझ रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी नियमों की जटिलता उसे और कमजोर कर रही है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ये नियम उन लोगों द्वारा बनाए जाते हैं, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां तैयार करते हैं। उन्हें खेत की मिट्टी की खुशबू का अनुभव नहीं होता, न ही किसान के पसीने की कीमत का एहसास। कागज़ों में बनाई गई नीतियां जमीनी हकीकत से अक्सर दूर होती हैं, और उसका खामियाजा किसान को भुगतना पड़ता है।
किसान चाहे तो अपनी उपज सीधे बाजार में बेच सकता है, लेकिन नगदी फसलों के लिए उसे मंडी पर निर्भर रहना पड़ता है। यदि मंडी तक पहुंचने के लिए इतनी जटिल प्रक्रियाएं होंगी, तो किसान या तो बिचौलियों के हाथों शोषित होगा या फिर अपनी फसल का सही मूल्य नहीं प्राप्त कर पाएगा। यह स्थिति न केवल किसान के लिए, बल्कि पूरे कृषि तंत्र के लिए चिंताजनक है।
इस समस्या का समाधान जटिलता बढ़ाने में नहीं, बल्कि सरलता लाने में है। सरकार को चाहिए कि वह किसान पर भरोसा करे और स्वयं के शपथ पत्र के आधार पर फसल बेचने की अनुमति दे। तकनीकी सत्यापन की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाया जाए, ताकि किसान बिना अतिरिक्त खर्च और परेशानी के अपनी उपज बेच सके। डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य सुविधा प्रदान करना होना चाहिए, न कि बाधा उत्पन्न करना।
साथ ही, छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष प्रावधान किए जाने चाहिए। उनके लिए स्टांप शुल्क में छूट या पूरी तरह से समाप्त करने का प्रावधान किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर सत्यापन की व्यवस्था को मजबूत किया जाए, ताकि किसान को शहरों के चक्कर न लगाने पड़ें।
किसान केवल एक उत्पादक नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। यदि वही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता रहेगा, तो यह व्यवस्था की विफलता का संकेत है। हमें यह समझना होगा कि कानून का उद्देश्य सुविधा देना है, न कि कठिनाई पैदा करना।
अंततः, यह समय है कि सरकार और समाज दोनों किसान की वेदना को समझें। नियमों को इतना सरल बनाया जाए कि किसान अपने अधिकारों से वंचित न रहे, बल्कि सम्मान के साथ अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त कर सके।
क्योंकि जब किसान खुशहाल होगा, तभी देश समृद्ध होगा।
