राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय लंबी अहीर की प्रधानाचार्य सुशीला कुल्हार पर ग्रामीणों का आरोप—“जिस आयोजन से किया परहेज, उसी के लिए मिला सम्मान”

भीम प्रज्ञा न्यूज़ झुंझुनू।

राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय लंबी अहीर की प्रधानाचार्य सुशीला कुल्हार का नाम जिला स्तर की सम्मान सूची में शामिल होने के बाद क्षेत्र में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ग्रामीणों, अभिभावकों और खेल प्रेमियों ने इस चयन पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे सम्मान की आत्मा के विपरीत बताया है।
ग्रामीणों का आरोप है कि शिक्षा विभाग की जिला स्तरीय हॉकी प्रतियोगिता के आयोजन को लेकर जब विद्यालय को जिम्मेदारी दी गई, तब प्रधानाचार्य सुशीला कुल्हार ने आयोजन से बचने के लिए बहाने खोजे और सहयोग करने के बजाय जिला शिक्षा अधिकारी को पत्र लिखकर प्रतियोगिता कराने में असमर्थता जता दी।

“छत टपकती है, पेड़ के नीचे पढ़ाते हैं”—पत्र बना विवाद की जड़

सूत्रों के अनुसार, प्रधानाचार्य द्वारा लिखे गए पत्र में विद्यालय की जर्जर स्थिति का हवाला दिया गया। पत्र में उल्लेख किया गया कि विद्यालय के कमरों की छत टपक रही है और ऐसी परिस्थिति में बच्चों को पेड़ों के नीचे बैठाकर पढ़ाया जा रहा है, इसलिए प्रतियोगिता कराना संभव नहीं है।
ग्रामीणों का कहना है कि यही पत्र बाद में प्रतियोगिता को अन्यत्र स्थानांतरित करने का आधार बनाया।

हॉकी प्रतियोगिता से किनारा करने वाली प्रधानाचार्य का जिला सम्मान सूची में नाम, उठे सवाल

ग्रामीणों का दावा—उत्साह था, व्यवस्था भी संभव थी

ग्रामीणों और खेल प्रेमियों का कहना है कि लंबी अहीर गांव में हॉकी प्रतियोगिता को लेकर जबरदस्त उत्साह था। उन्होंने शिक्षा विभाग के अधिकारियों से प्रतियोगिता यहीं कराने का आग्रह भी किया था और सहयोग का भरोसा दिलाया था। तब जाकर प्रतियोगिता आयोजित हुई। बावजूद इसके, प्रधानाचार्य द्वारा नकारात्मक रिपोर्ट देकर आयोजन को दिग्भ्रमित किया गया।

“जिस काम से पल्ला झाड़ा, उसी पर सम्मान?”

पत्र में उल्लेख किया गया कि विद्यालय के कमरों की छत टपक रही है और ऐसी परिस्थिति में बच्चों को पेड़ों के नीचे बैठाकर पढ़ाया जा रहा है, इसलिए प्रतियोगिता कराना संभव नहीं है

अब जब वही प्रधानाचार्य जिला स्तर की सम्मान सूची में शामिल की गई हैं, तो ग्रामीणों में नाराजगी है। लोगों का कहना है कि जिस अधिकारी ने प्रतियोगिता आयोजन में सहयोग नहीं किया, बल्कि बाधाएं गिनाईं, उसे सम्मानित करना ईमानदार कार्यसंस्कृति के बजाय चापलूसी को बढ़ावा देना है।
ग्रामीणों ने इसे “सच्चे सम्मान का अपमान” बताते हुए शिक्षा विभाग से चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।

मांग—सम्मान सूची की हो समीक्षा

क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि जिला सम्मान सूची में नाम शामिल करने से पहले संबंधित अधिकारी के कार्यों की निष्पक्ष समीक्षा की जाए, ताकि वास्तव में योगदान देने वाले शिक्षक और संस्थान ही सम्मानित हों। फिलहाल यह मामला शिक्षा विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है और ग्रामीणों की नजर अब विभागीय प्रतिक्रिया पर टिकी है।