संपादकीय@हरेश पंवार
कभी कहा जाता था कि इस देश की सबसे बड़ी चुनौती गरीबी है, लेकिन अब लगता है कि असली चुनौती गरीबी नहीं, बल्कि गरीब बनने की होड़ है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जिसे देखो वही अपने आपको “आर्थिक रूप से कमजोर” सिद्ध करने की जुगत में लगा है। विडंबना देखिए—जिस गरीबी से लोग कभी भागते थे, आज उसी को खरीदने के लिए जेब ढीली कर रहे हैं। 5 से 15 हजार रुपये खर्च कर “बीपीएल” बनने का यह नया ट्रेंड केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता के गहरे पतन का आईना है। अब गरीबी कोई मजबूरी नहीं रही, बल्कि एक सुनहरा अवसर बन चुकी है—सरकारी योजनाओं का टिकट, सस्ती सुविधाओं का पासपोर्ट और बिना मेहनत के लाभ उठाने का लाइसेंस। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह दृश्य किसी व्यंग्य रचना का हिस्सा लगता, अगर यह हकीकत न होता। जिन लोगों के पास पक्के मकान हैं, गाड़ियां हैं, स्थायी आय के स्रोत हैं, वे भी खुद को गरीब साबित करने के लिए पूरी ऊर्जा लगा रहे हैं। मानो “गरीब” होना आज का सबसे बड़ा सामाजिक सम्मान बन गया हो। असली गरीब, जो दिन-रात संघर्ष करता है, वह आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, जबकि तथाकथित “संपन्न गरीब” आराम से योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं। यह एक ऐसी उल्टी गंगा है, जिसमें ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर संसाधनों का प्रवाह हो रहा है—गरीब के हिस्से का हक अमीर की झोली में जा रहा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे खेल को लोग गलत भी नहीं मानते। तर्क दिया जाता है—“सरकार दे रही है, तो लेने में क्या बुराई है?” यही सोच इस बीमारी की जड़ है। जब नैतिकता की जगह अवसरवाद ले लेता है, तो फिर समाज केवल कानून से नहीं, बल्कि चालाकियों से चलने लगता है। अब ईमानदारी मूर्खता मानी जाती है और जुगाड़ को प्रतिभा का दर्जा मिल चुका है। यही कारण है कि आज हर व्यक्ति सिस्टम को मात देने में अपनी सफलता देखता है, भले ही इसके लिए उसे किसी जरूरतमंद का हक ही क्यों न छीनना पड़े।
इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बिना उचित जांच के कार्ड बन जाना, गलत पते पर लाभ मिलना और पात्रता की अनदेखी—ये सब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कहीं न कहीं मिलीभगत की ओर इशारा करते हैं। अगर गरीबी का निर्धारण केवल कागजों पर होगा, तो सच्चाई हमेशा हाशिए पर ही रहेगी। कागजों में गरीब बनना आसान है, लेकिन वास्तविक जीवन में अभाव झेलना उतना ही कठिन। दुर्भाग्य यह है कि सिस्टम कागजों को देखता है, इंसान को नहीं।
सबसे बड़ा नुकसान उस वर्ग को हो रहा है, जिसके नाम पर यह पूरा ढांचा खड़ा किया गया था। असली गरीब आज भी वही है—संघर्षरत, उपेक्षित और हाशिए पर। उसके हिस्से की सुविधाएं कोई और ले जा रहा है, और वह केवल आंकड़ों में “लाभार्थी” बनकर रह गया है। यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का भी प्रतीक है। जब समाज में पात्र और अपात्र के बीच की रेखा मिटने लगे, तो व्यवस्था का भरोसा भी टूटने लगता है।
आज का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि इस देश में “ईमानदार गरीब” सबसे ज्यादा पीड़ित है। वह न तो जुगाड़ जानता है, न रिश्वत देने की क्षमता रखता है, और न ही गलत तरीके अपनाने की इच्छा। परिणामस्वरूप, वह हर योजना से वंचित रह जाता है। दूसरी ओर, जो व्यक्ति संसाधनों से भरपूर है, वह खुद को “गरीब” घोषित कर लाभ ले रहा है। यह एक ऐसी विडंबना है, जहां सच्चाई हार रही है और दिखावा जीत रहा है।
समस्या का समाधान केवल सख्त कानूनों में नहीं, बल्कि सोच के बदलाव में है। जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि वे किसी और के अधिकार का हनन कर रहे हैं, तब तक कोई भी सुधार अधूरा रहेगा। प्रशासन को पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी, तकनीक का बेहतर उपयोग करना होगा और दोषियों पर कठोर कार्रवाई करनी होगी। लेकिन इससे भी अधिक जरूरी है कि समाज अपनी नैतिक जिम्मेदारी को पहचाने।
अंत में, एक कड़वा लेकिन सटीक कटाक्ष—आज अगर कोई पूछे कि “आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?” तो शायद जवाब होगा, “हमने अमीर होते हुए भी खुद को गरीब साबित कर दिया।” यही हमारे समय का सबसे बड़ा सच है। हम गरीबी मिटाने की बात करते हैं, लेकिन असल में गरीबी को बांटने और बेचने में लगे हैं। अगर यही स्थिति रही, तो वह दिन दूर नहीं जब “गरीबी” केवल एक कागजी पहचान बनकर रह जाएगी और असली गरीब हमेशा की तरह सिस्टम के बाहर खड़ा रहेगा।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“जब समाज में सुविधा पाने के लिए लोग सच से ज्यादा ‘प्रमाणपत्र’ पर भरोसा करने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या गरीबी नहीं, बल्कि सोच की
