जय भीम का नारा सबसे पहले किसने दिया ?
जय भीम का नारा क्या है और इसकी शुरुआत कैसे हुई ?
जय भीम का नारा देने वाले बाबू हरदास एलएन कौन थे ?
जय भीम संघर्ष, क्रांति, एकता, सामाजिक न्याय, समानता और आत्मसम्मानका प्रतीक –
भीम प्रज्ञा विशेष रिपोर्ट।
डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुयायियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला नारा जय भीम एक अभिवादन है। जिसका अर्थ ‘भीम की जय’ या डॉ. भीमराव अंबेडकर जिंदाबाद है। जो सामाजिक न्याय, समानता और आत्मसम्मान का प्रतीक है। यह बहुजन समाज को एकजुट करता है। यह नारा डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों और संघर्ष को दर्शाता है। जो दलितों, आदिवासियों और समाज के वंचित वर्गों को सशक्त बनाता है। यह नारा शिक्षा व अधिकारों के लिए प्रेरित करता है। ‘जय भीम’ का नारा सबसे पहले आंबेडकर आंदोलन के कार्यकर्ता बाबू हरदास एलएन लक्ष्मण नागराले ने 6 जनवरी 1935 में दिया था । बाबू हरदास सेंट्रल प्रोविंस-बरार परिषद के विधायक थे और बाबा साहेब डॉ भीमराव आंबेडकर के विचारों का पालन करने वाले एक प्रतिबद्ध कार्यकर्ता थे। चावदार झील के सत्याग्रह के कारण डॉ. आंबेडकर का नाम हर घर में पहुंच चुका था। इसके बाद महाराष्ट्र में डॉ. आंबेडकर ने जिन दलित नेताओं को आगे बढ़ाया। बाबू हरदास उनमें से एक थे। रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक दलित मूवमेंट इन इंडिया एण्ड इट्स लीडर्स में दर्ज है कि बाबू हरदास ने सबसे पहले ‘जय भीम’ का नारा दिया था।
गुंडागर्दी करने वाले असामाजिक लोगों को नियंत्रण में लाने और समानता के विचारों को हर गाँव में फैलाने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर ने समता सैनिक दल की स्थापना की थी। बाबू हरदास समता सैनिक दल के सचिव थे।
जय भीम का नारा अस्तित्व में कैसे आया
दलित पैंथर के सह-संस्थापक जेवी पवार ने उस दौरान कहा था कि बाबू हरदास ने कमाठी और नागपुर क्षेत्र से कार्यकर्ताओं का एक संगठन बनाया था। उन्होंने इस बल के स्वयंसेवकों को नमस्कार, राम राम, या जौहर मायाबाप की जगह ‘जय भीम’ कह कर एक-दूसरे का अभिवादन करने और जवाब देने के लिए सभी लोगों को प्रेरित किया । उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि जय भीम के जवाब में ‘बाल भीम’ कहा जाना चाहिए। जैसे मुसलमान ‘सलाम वालेकुम’ का जवाब देते समय ‘वलेकुम सलाम’ कहते हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर को सीधे जय भीम नाम से संबोधित किया
डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवनकाल में ही ‘जय भीम’ का अभिवादन शुरू हो गया था । आंदोलन के कार्यकर्ता एक-दूसरे को जय भीम कहने लगे। महाराष्ट्र के पूर्व न्यायाधीश सुरेश घोरपोड़े के मुताबिक एक कार्यकर्ता ने आंबेडकर को सीधे ‘जय भीम’ कहकर संबोधित किया था। सुरेश घोरपड़े सत्र न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और विदर्भ में दलित आंदोलन के विद्वान थे । उन्होंने बाबू हरदास के अनेक कार्यों पर लिखा और उन पर व्याख्यान दिया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा पूरे महाराष्ट्र में दलितों के उत्थान के लिए शुरू किए गए आंदोलन में कई युवाओं ने भाग लिया। उनमें से बाबू हरदास एलएन थे।
‘जय भीम’ क्यों कहा जाता है ?
बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर का नाम भीमराव रामजी आंबेडकर था। उनके नाम को संक्षिप्त रूप में लिखने की प्रथा शुरू में महाराष्ट्र में आम थी और धीरे-धीरे इसे पूरे भारत में जय भीम कहा जाने लगा। ‘जय भीम का नारा भले ही बाबू हरदास ने दिया था लेकिन यह सभी दलितों के लिए किसी जीत से कम नहीं है। उन्होंने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के आत्मसम्मान को जगाया, उन्हें मनुष्य के रूप में जीने का अधिकार और मार्ग दिया।
जय भीम बनी पहचान
जय भीम का नारा एक पहचान बन गया है। जय भीम सिर्फ अभिवादन नहीं है, यह एक समग्र पहचान बन गया है। इस पहचान के विभिन्न स्तर हैं। जय भीम संघर्ष का प्रतीक बना, यह एक सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ एक राजनीतिक पहचान भी बन गया है। मेरे अनुसार मुझे लगता है कि यह क्रांति की समग्र पहचान बन चुका है। इसके साथ ही जय भीम आंदोलन का भी प्रतीक बन गया है। यदि आप सूर्या की फिल्म देखते हैं, तो आप देखेंगे कि ‘जय भीम’ शब्द का प्रयोग सीधे तौर पर नहीं किया गया है बल्कि जय भीम को क्रांति के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। जय भीम’ कहना सिर्फ नमस्कार, नमस्ते की तरह नहीं है। यह आसान नहीं है बल्कि इसका मतलब है कि वह आंबेडकरवादी विचारधारा के करीब है। यह शब्द बताता है कि जहां भी लड़ने की ज़रूरत होगी मैं लड़ने के लिए तैयार हूं। जब लोग डॉ. भीमराव आंबेडकर को ‘जय भीम’ कहकर संबोधित करते थे, तो वे मुस्कुरा देते थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसे स्वीकार किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर की मृत्यु के बाद यह नारा दलितों के लिए संघर्ष, क्रांति और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन गया, जिसे राजनीतिक रैलियों और आंदोलनों में बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाने लगा।
जय भीम का नारा एक समुदाय विशेष का नहीं ?
जय भीम का नारा हिंदी भाषी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश सहित पूरे देश में आसानी से सुना जा सकता है। डॉ. आंबेडकर के विचार पंजाब में भी फैले हुए थे । इस जगह न केवल नारे गाए जाते हैं बल्कि लाखों लोग ने जय भीम-जय भीम, बोलो जय भीम के नारे लगाते देखे जा सकते है। 24 जून 2024 को भारत की संसद में आज़ाद समाज पार्टी,कांग्रेस,समाजवादी पार्टी और अन्य विभिन्न राजनीतिक दलों के लगभग दो दर्जन सांसदों ,दलित, ओबीसी, मुस्लिम और आदिवासी ने ‘जय भीम’ के नारे के साथ शपथ ग्रहण समारोह का समापन किया।
आजाद समाज पार्टी (कांशी राम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वर्तमान में नगीना, उत्तर प्रदेश से लोक सभा सांसद युवा दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने संगठन का नाम ‘भीम आर्मी’ रखा तथा संसद में निडर और निर्भीक होकर जय भीम के नारे लगाते देखें जाते है। जब दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुआ तो मुस्लिम समुदाय के प्रदर्शनकारियों ने डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीरें लहराईं । जो यह संकेत देती है कि ‘जय भीम’ का नारा किसी एक समुदाय और भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है।
जय भीम का नारा देने वाले बाबू हरदास एलएन कौन थे ?
डॉ. बी.आर. अंबेडकर के कट्टर अनुयायी,दलितों के बीच जय भीम का अभिवादन करने की प्रथा के प्रवर्तक, स्वतंत्र श्रमिक दल के महासचिव, भारतीय दलित नेता, राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक, 1937 में नागपुर कामठी निर्वाचन क्षेत्र से चुने जाने वाले पहले विधान सभा सदस्य बाबू हरदास का जन्म 6 जनवरी 1904 को कामठी में एक महार परिवार में हुआ था। इनके पिता लक्ष्मणराव नागरे, रेलवे विभाग में क्लर्क थे। इन्होंने नागपुर के पटवर्धन हाई स्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई की। बाबू हरदास किशोरावस्था से ही सामाजिक कार्यों में रुचि रखते थे। 1920 में सामाजिक आंदोलन में शामिल हो गए। इन्होंने नागपुर के पटवर्धन हाई स्कूल से मैट्रिक तक की पढ़ाई की। उन्हें ‘जय भीम प्रवर्तक’ के नाम से जाना जाता है। आंबेडकर से प्रेरित होकर बाबू हरदास ने 1924 में कमाठी में संत चोखमेला छात्रावास की स्थापना की। उन्होंने इसने ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों को आवास प्रदान किया। उन्होंने मेहनत मज़दूरी करने वाले छात्रों के लिए रात्रिकालीन स्कूल भी शुरू किये और अंग्रेजी पढ़ाना भी शुरू कर दिया था । 1925 में बीड़ी वर्कर्स यूनियन की स्थापना की। बीड़ी निर्माता और ठेकेदार मज़दूरों का शोषण कर रहे थे, तब इन्होंने कहा था कि जिसका जो हक है वो पैसा उन्हें दो। उस समय के सामाजिक रीति-रिवाजों के अनुरूप 1920 में 16 वर्ष की आयु में इनका विवाह साहूबाई के साथ हो गया था। 17 वर्ष की आयु में बाबू हरदास ने दलितों में सामाजिक जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से नागपुर से वितरित होने वाली महारथा नामक एक साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना की। इन्होंने 1922 में महार समाज संगठन की स्थापना करके महार समुदाय को संगठित करने का प्रयास किया। इन्होंने दलितों पर अत्याचारों से बचाने के लिए असंगठित महार युवाओं को एकजुट करने हेतु एक स्वयंसेवी समूह, महार समाज पाठक का भी गठन किया। दलित महिलाओं को दैनिक कार्यों का प्रशिक्षण देने के लिए एक महिला आश्रम खोला। इसके अलावा, बीड़ी श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिए इन्होंने सहकारी आधार पर बीड़ी का काम शुरू किया। जो उस क्षेत्र में बहुत सफल रहा।
तर्कहीन,अंधविश्वास,पाखण्ड वाद, ढोंग करने वाली रीति-रिवाजों के विरोधी
बाबू हरदास तर्कहीन और अंधविश्वासी रीति-रिवाजों के प्रबल विरोधी थे। वे दलित वर्गों के बीच उप-जातिगत भेदभाव के घोर विरोधी थे। इन्होंने महार समुदाय के 14वीं शताब्दी के संत चोखामेला की पुण्यतिथि पर वार्षिक सामुदायिक भोज का आयोजन किया, जो इन भेदभावों को दूर करता था।
शिक्षा के प्रबल समर्थक
बाबू हरदास दलितों की शिक्षा के प्रबल समर्थक भी थे। इन्होंने स्वयं मैट्रिकुलेशन पूरा किया था, जो उस समय दलितों के लिए एक दुर्लभ बात थी। इन्होंने महार समुदाय के आग्रह पर 1927 में कामठी में रात्रि विद्यालय शुरू किए। उनके विद्यालय में एक समय में 86 लड़के और 22 लड़कियां पढ़ रही थीं। इन्होंने लगभग उसी समय कामठी में एक संत चोखामेला पुस्तकालय भी शुरू किया। हरदास एक विपुल लेखक भी थे और इन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का उपयोग मुख्य रूप से दलित वर्गों में सामाजिक जागरूकता पैदा करने के लिए किया। इन्होंने समाज में व्याप्त बुराइयों के विरुद्ध लोगों में जागरूकता पैदा करने के लिए 1924 में ‘मंडल महात्मे’ नामक पुस्तक लिखी । इन्होंने इस पुस्तक की निःशुल्क प्रतियाँ लोगों में वितरित कीं। इस पुस्तक का लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा और उस क्षेत्र के दलित लोगों ने हिंदू देवी-देवताओं पर आधारित नाटक देखना और उनका आनंद लेना बंद कर दिया। इन्होंने ‘ वीर बालक ‘ नामक नाटक भी लिखा और लोगों में जागरूकता की एक नई लहर पैदा करने के लिए इसका मंचन किया। इन्होंने ‘सॉन्ग्स ऑफ द मार्केट’ और ‘सॉन्ग्स ऑफ द हीथ’ लिखा और प्रकाशित किया । इनके लेख अंबेडकर द्वारा संपादित साप्ताहिक जनता में भी प्रकाशित हुए ।
डॉ. भीमराव आंबेडकर से पहली मुलाकात
बाबू हरदास की डॉ. भीमराव आंबेडकर से पहली मुलाकात 1928 में हुई। हालाँकि इन्होंने अपनी सामाजिक गतिविधियाँ बहुत पहले शुरू कर दी थीं। लेकिन इस मुलाकात से उनके राजनीतिक करियर को गति मिली। उसी वर्ष डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने उनसे साइमन आयोग के सामने गवाही देने का अनुरोध किया। बाद में 1930-31 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के संबंध में जब अछूतों के वास्तविक नेतृत्व का प्रश्न उठा तो हरदास ने यूनाइटेड किंगडम के तत्कालीन प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड को एक टेलीग्राम भेजा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर अछूतों के वास्तविक नेता हैं, न कि महात्मा गांधी । इन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में भी इस बारे में एक राय बनाई और विभिन्न अछूत नेताओं द्वारा मैकडोनाल्ड को कुल 32 टेलीग्राम भेजे। डॉ.बी.आर. अंबेडकर की तरह हरदास भी विधानसभाओं में दलित वर्गों की अधिक भागीदारी चाहते थे। इन्होंने मध्य प्रांतों और बरार के राज्यपाल से विधान परिषद, जिला स्थानीय बोर्डों और नगरपालिकाओं में दलित वर्गों के सदस्यों को मनोनीत करने की अपील की। वे 8 अगस्त 1930 को नागपुर में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की अध्यक्षता में आयोजित दलित वर्गों के सम्मेलन के मुख्य आयोजकों में से एक थे। इस सम्मेलन में दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। इसी सम्मेलन में अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ की स्थापना हुई और हरदास को संघ का संयुक्त सचिव चुना गया। अखिल भारतीय दलित वर्गों का दूसरा सम्मेलन 7 मई 1932 को कामठी में आयोजित हुआ और हरदास इसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष थे। इस बैठक में उन्हें संघ के राष्ट्रीय निकाय का सचिव चुना गया। 1936 में स्वतंत्र श्रमिक दल (आईएलपी) की सीपी और बरार शाखा के सचिव बने। इन्होंने 1937 में नागपुर-कामठी निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1938 में उन्हें आईएलपी की सीपी और बरार शाखा के अध्यक्ष के रूप में भी मनोनीत किया गया। 1939 में वे तपेदिक से बीमार पड़ गए और 12 जनवरी 1939 को उनका निधन हो गया।बाबू हरदास ने अपनी मृत्यु के बाद भी दलित वर्गों पर महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ा। जैसे कोई धूमकेतु प्रकट होता है, पूरे आकाश में प्रकाश लाता है और फिर पल भर में गायब हो जाता है, वैसे ही हरदास के साथ हुआ। उनके द्वारा गढ़ा गया अभिवादन वाक्यांश ‘जय भीम’ भारत में दलितों के बीच अभिवादन का एक सामान्य शब्द बन गया है। यह भारत में दलितों की एक प्रमुख और राष्ट्रीय स्तर की पार्टी, बहुजन समाज पार्टी का एक औपचारिक अभिवादन वाक्यांश भी है । फ़िल्म निर्माता धनंजय गलानी ने बोले इंडिया में जय भीम नामक एक फिल्म बनाई जिसमें बाबू हरदास के जीवन और कार्यों को दर्शाया गया है।
लेखक – मदन मोहन भास्कर
हिंडौन सिटी, करौली, राजस्थान
मो. 9783900300


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