भीम प्रज्ञा @संपादकीय
राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों में संचालित सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाएं, बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन की एक महत्वपूर्ण आधारशिला मानी जाती हैं। इन योजनाओं का मूल उद्देश्य यही है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके वृद्धजनों को आर्थिक संबल मिल सके, जिससे वे आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकें। लेकिन क्या वास्तव में यह उद्देश्य पूर्ण हो पा रहा है? या फिर नियमों की जटिलता और सामाजिक संवेदनहीनता के कारण कई बुजुर्ग इस अधिकार से वंचित हो रहे हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज यह एक कड़वा सत्य बन चुका है कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन की पात्रता तय करने में “परिवार में सरकारी नौकरी” जैसी शर्तें, उन बुजुर्गों के लिए अभिशाप बनती जा रही हैं, जिनकी संतानें भले ही नौकरी में हों, लेकिन वे अपने माता-पिता के साथ नहीं रहतीं, न ही उनके जीवन की जिम्मेदारी निभाती हैं।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि एक ओर सरकार बुजुर्गों के लिए पेंशन की गारंटी देती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं के अपने बच्चे—जो सरकारी या अर्धसरकारी नौकरी में हैं—उनके इस अधिकार के रास्ते में बाधा बन जाते हैं।
ग्रामीण भारत की एक सच्चाई यह भी है कि कई युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। वे शहरों में अपने परिवार के साथ सुख-सुविधाओं से भरा जीवन जी रहे हैं, लेकिन उनके बुजुर्ग माता-पिता गांव में ही रहकर संघर्षपूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं। खेत-खलिहान, पशुधन और सीमित संसाधनों के बीच जीवन यापन कर रहे ये बुजुर्ग, न तो अपने बच्चों से कुछ मांगते हैं और न ही अपनी पीड़ा को खुलकर व्यक्त कर पाते हैं।
ऐसे में यदि उनकी सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी इस आधार पर रोक दी जाए कि “उनके बेटे या बेटी नौकरी में हैं”, तो यह न केवल एक प्रशासनिक त्रुटि है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं पर भी गहरा आघात है।
इस समस्या का सबसे दर्दनाक पहलू तब सामने आता है, जब कुछ मामलों में स्वयं संतानें ही अपनी नौकरी या वेतन पर संभावित “रिकवरी” के डर से अपने माता-पिता की पेंशन रुकवा देती हैं। यह केवल एक आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि रिश्तों की बुनियाद को कमजोर करने वाला कदम है।
हमें यह समझना होगा कि बुजुर्गों की पेंशन कोई “खैरात” नहीं, बल्कि उनका अधिकार है—उनके जीवनभर के श्रम, त्याग और संघर्ष का एक छोटा सा सम्मान। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को पाल-पोसकर इस मुकाम तक पहुंचाया, क्या उनके बुढ़ापे में उनसे इतना भी हक छीन लिया जाना चाहिए?
यहां समाज के पढ़े-लिखे और जागरूक वर्ग की भूमिका भी कटघरे में खड़ी होती है। यदि शिक्षित और सक्षम लोग ही अपने माता-पिता के अधिकारों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं, तो समाज में नैतिक मूल्यों की रक्षा कौन करेगा?
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि सरकार इस विषय पर गंभीरता से विचार करे। पेंशन की पात्रता तय करते समय केवल “परिवार में सरकारी नौकरी” को आधार बनाना, वास्तविक स्थिति की अनदेखी करना है। यदि कोई बुजुर्ग अपने बच्चों से अलग रह रहा है, उनके राशन कार्ड में शामिल नहीं है, और अपनी आजीविका स्वयं या सीमित साधनों से चला रहा है, तो उसे पेंशन से वंचित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
समाधान केवल नीति में बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक चेतना के जागरण में भी निहित है।
आज आवश्यकता है कि एक जन-जागरण अभियान चलाया जाए—जिसमें यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया जाए कि यदि किसी कारणवश बुजुर्ग की पेंशन उनके बच्चों के खाते में आ रही है, तो वह राशि तत्काल उन्हें सौंपना एक नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है।
बुजुर्गों के हाथ में जब वह छोटी सी राशि आती है, तो वह केवल पैसे नहीं होते—वह उनका आत्मसम्मान, उनका आत्मविश्वास और उनकी स्वतंत्रता का प्रतीक होता है। वे उस धन से अपनी छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करते हैं, अपने पोते-पोतियों को सगुन देते हैं और अपने अस्तित्व को सार्थक महसूस करते हैं।
अंततः, यह केवल पेंशन का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की आत्मा का प्रश्न है।
यदि हम अपने ही माता-पिता के अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते, तो हम किसी भी सामाजिक न्याय की बात करने का नैतिक अधिकार खो देते हैं।
आज जरूरत है—नीति में सुधार की, सोच में बदलाव की और संवेदना के पुनर्जागरण की।
ताकि कोई भी बुजुर्ग अपने ही जीवन के संध्या काल में यह महसूस न करे कि वह अपने ही घर में उपेक्षित और अधिकारविहीन हो चुका है। यही सच्चे अर्थों में एक संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज की पहचान होगी।
