संपादकीय@Haresh Panwar
कक्षा से परे ज्ञान की यात्रा: उपस्थिति नहीं, समझ को बनाइए शिक्षा की कसौटी
शिक्षा यदि केवल घंटी बजने पर कक्षा में बैठ जाने का नाम होती, तो ज्ञान का विस्तार चार दीवारों से आगे कभी जा ही नहीं सकता था। विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों की कल्पना इसलिए नहीं की गई थी कि वे युवाओं को अनुशासन की पंक्तियों में खड़ा कर दें, बल्कि इसलिए कि वे उन्हें सोचने, प्रश्न करने और समाज को नए दृष्टिकोण देने योग्य नागरिक बना सकें। फिर भी विडंबना यह है कि आज उच्च शिक्षा का बड़ा हिस्सा “अनिवार्य उपस्थिति” जैसे नियमों में उलझकर अपने मूल उद्देश्य से भटकता नजर आता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
कई शैक्षणिक संस्थानों में यह मान लिया गया है कि यदि छात्र कक्षा में मौजूद है, तो वह सीख भी रहा है; और यदि वह अनुपस्थित है, तो वह शिक्षा से विमुख है। यह धारणा जितनी सरल दिखती है, उतनी ही भ्रामक भी है। सीखना एक मानसिक और बौद्धिक प्रक्रिया है, जिसका सीधा संबंध केवल शारीरिक उपस्थिति से नहीं होता। कोई छात्र कक्षा में बैठकर भी निष्क्रिय रह सकता है, और कोई पुस्तकालय, प्रयोगशाला, फील्डवर्क या डिजिटल मंचों के माध्यम से कहीं अधिक गहराई से सीख सकता है।
आधुनिक समय में ज्ञान के स्रोत बहुआयामी हो चुके हैं। ऑनलाइन पाठ्यक्रम, शोध लेख, संवाद मंच, प्रोजेक्ट-आधारित अध्ययन और सामुदायिक अनुभव—ये सब शिक्षा के वैकल्पिक लेकिन प्रभावी रूप हैं। ऐसे में यदि विश्वविद्यालय केवल कक्षा में उपस्थिति को ही सीखने का प्रमाण मानें, तो वे ज्ञान की इस व्यापक दुनिया को नकार देते हैं। यह शिक्षा को जीवंत प्रक्रिया की बजाय एक यांत्रिक उपस्थिति रजिस्टर में बदल देता है।
अनिवार्य उपस्थिति का कठोर ढांचा सामाजिक असमानताओं को भी उजागर करता है। हर छात्र एक जैसी परिस्थितियों में नहीं जीता। कोई आर्थिक मजबूरी में काम करता है, कोई पारिवारिक जिम्मेदारियों से घिरा है, कोई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। इन विविधताओं को नजरअंदाज कर जब एक ही नियम सब पर थोप दिया जाता है, तो शिक्षा समान अवसर का माध्यम नहीं रह जाती, बल्कि चयन और बहिष्कार का औजार बन जाती है। ऐसे में प्रतिभाशाली लेकिन परिस्थितियों से जूझ रहे छात्र पीछे छूट जाते हैं।
शिक्षा का नैतिक पक्ष भी यहां महत्वपूर्ण है। जब संस्थान छात्रों को केवल नियम-पालक के रूप में देखने लगते हैं, तो उनकी स्वायत्तता और गरिमा पर आघात होता है। उच्च शिक्षा के छात्र बच्चे नहीं होते; वे वयस्क होते हैं, जिनसे आत्म-अनुशासन और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। यदि उन पर हर कदम पर निगरानी और दंड का भय लादा जाए, तो स्वतंत्र सोच कैसे विकसित होगी? भय से उपजा अनुशासन समाज को आज्ञाकारी तो बना सकता है, लेकिन सृजनशील और विवेकशील नहीं।
इतिहास गवाह है कि शिक्षा तब सबसे प्रभावी रही है जब वह संवाद और सहभागिता पर आधारित रही है। शिक्षक और छात्र का संबंध आदेश देने वाले और पालन करने वाले का नहीं, बल्कि सहयात्री का होना चाहिए। जब कक्षा विचारों के आदान-प्रदान का मंच बनती है, तब उपस्थिति स्वाभाविक हो जाती है, उसे थोपने की आवश्यकता नहीं पड़ती। समस्या उपस्थिति की नहीं, बल्कि उस शिक्षण पद्धति की है जो छात्रों को कक्षा में आने के लिए प्रेरित नहीं कर पा रही।
आज वैश्विक स्तर पर उच्च शिक्षा छात्र-केंद्रित और लचीले मॉडल की ओर बढ़ रही है। मूल्यांकन का आधार केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि समझ, विश्लेषण क्षमता, रचनात्मकता और सामाजिक संवेदनशीलता बन रही है। भारत में भी यदि हमें ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण करना है, तो हमें अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा। उपस्थिति को सीखने का सहायक माध्यम माना जा सकता है, लेकिन उसे अंतिम लक्ष्य बना देना शिक्षा की आत्मा को सीमित कर देता है।
इस संदर्भ में न्यायिक हस्तक्षेपों और शिक्षाविदों की चिंताओं को केवल नियमों की ढील के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा की परिभाषा पर पुनर्विचार के अवसर के रूप में देखना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि छात्र कक्षा में कितने दिन बैठे, बल्कि यह है कि उसने क्या समझा, कैसे सोचा और समाज के लिए क्या दृष्टि विकसित की।
अंततः शिक्षा का उद्देश्य प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि चेतना जगाना है। यदि विश्वविद्यालय केवल उपस्थिति की गिनती में उलझे रहेंगे, तो वे अनुशासित कर्मचारी तो बना सकते हैं, लेकिन जागरूक नागरिक नहीं। कक्षा की दीवारों से बाहर भी ज्ञान का संसार फैला है—जरूरत है उसे स्वीकारने की, समझने की और शिक्षा को मानवता, संवाद और स्वतंत्र चिंतन का माध्यम बनाने की।

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