[6/20, 02:00] Adv. Haresh Panwar: संपादकीय
*घर से गायब हुई आटा चक्की, बढ़ते रोगों की दस्तक*
*सहज योग की विरासत खोकर कृत्रिम फिटनेस की तलाश में भटकता समाज*
विश्व योग दिवस के अवसर पर जब देशभर में योग शिविरों, पार्कों, स्टेडियमों और फिटनेस सेंटरों में स्वास्थ्य जागरूकता के कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, तब यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि क्या कभी योग हमारे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा नहीं था? क्या हमारे पूर्वज बिना योग प्रशिक्षकों और फिटनेस सेंटरों के स्वस्थ और सुदृढ़ नहीं थे? यदि हम अपने ग्रामीण जीवन की ओर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि योग कभी किसी विशेष दिवस का आयोजन नहीं था, बल्कि वह हमारी दिनचर्या में सहज रूप से समाहित था। दुर्भाग्यवश आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने अपने घरों से उस सहज योग को ही विदा कर दिया, जिसका सबसे बड़ा प्रतीक हाथ की आटा चक्की थी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारतीय ग्रामीण समाज में हाथ की आटा चक्की केवल अनाज पीसने का उपकरण नहीं थी। वह परिवार के पोषण, स्वास्थ्य और श्रम संस्कृति की आधारशिला थी। सुबह सूर्योदय से पहले जब गांवों में पक्षियों का कलरव भी शुरू नहीं होता था, तब घर-घर से चक्कियों की घर्र-घर्र की मधुर ध्वनि सुनाई देती थी। यह ध्वनि केवल आटे की पिसाई की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, अनुशासन और श्रम के संगीत की ध्वनि थी।
परिवार की महिलाएं प्रतिदिन हाथ से चक्की चलाकर पूरे परिवार के लिए आटा तैयार करती थीं। इस प्रक्रिया में उनके हाथ, कंधे, कमर, पेट, पीठ और पैरों की स्वाभाविक कसरत हो जाती थी। आज जिस सम्पूर्ण शरीर व्यायाम के लिए लोग जिम और योग केंद्रों का सहारा लेते हैं, वह कार्य उस समय सहज रूप से घर की चक्की के माध्यम से संपन्न हो जाता था। शायद उस समय की महिलाएं स्वयं भी नहीं जानती थीं कि वे प्रतिदिन कितने प्रभावी योगाभ्यास का हिस्सा बन रही हैं।
महान संत कबीरदास ने भी चक्की के महत्व को समझते हुए कहा था—
“चलती चाकी देख कर दिया कबीरा रोय,
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।”
चक्की केवल दार्शनिक प्रतीक नहीं थी, बल्कि जीवन और स्वास्थ्य का आधार भी थी।
आज चिकित्सा विज्ञान और फिटनेस विशेषज्ञ गर्भवती महिलाओं को नियमित व्यायाम, हल्का श्रम और शरीर को सक्रिय रखने की सलाह देते हैं। किंतु हमारे गांवों की महिलाएं बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के यह सब स्वाभाविक रूप से करती थीं। हाथ की चक्की चलाने, पानी भरने, पशुओं की देखभाल और अन्य घरेलू कार्यों से उनका शरीर निरंतर सक्रिय रहता था। यही कारण था कि उनका शारीरिक स्वास्थ्य अधिक मजबूत होता था और प्रसव भी अधिकांशतः प्राकृतिक रूप से संपन्न हो जाते थे।
इसके विपरीत आज स्थिति चिंताजनक होती जा रही है। आधुनिक सुविधाओं ने श्रम को समाप्त कर दिया है। आटा चक्की की जगह फ्लोर मिल ने ले ली, कुओं की जगह मोटर और टंकियों ने, और हाथ के श्रम की जगह मशीनों ने। परिणामस्वरूप शरीर निष्क्रिय होता गया और रोग सक्रिय होते गए। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कमर दर्द, जोड़ों का दर्द और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।
विडंबना यह है कि जिन कार्यों को कभी हम सामान्य घरेलू जिम्मेदारी मानते थे, आज उन्हीं की नकल योग और फिटनेस एक्सरसाइज के रूप में कर रहे हैं। फिटनेस सेंटरों में लोग घंटों मेहनत कर वही शारीरिक गतिविधियां दोहराते हैं जो कभी घर के कामों से स्वतः हो जाती थीं। हम घर में श्रम समाप्त कर बाहर व्यायाम खोज रहे हैं।
यह केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का भी प्रश्न है। हाथ की आटा चक्की भारतीय गृहस्थ जीवन की अन्नपूर्णा थी। वह परिवार को भोजन भी देती थी और स्वास्थ्य भी। लेकिन हमने सुविधा के नाम पर उसे घर के किसी कोने, कबाड़खाने या संग्रहालय की वस्तु बना दिया। आज नई पीढ़ी शायद यह भी नहीं जानती कि हाथ की चक्की कैसी होती थी और उससे आटा कैसे पीसा जाता था।
निश्चित रूप से समय के साथ तकनीक का विकास आवश्यक है और मशीनों का विरोध नहीं किया जा सकता। किंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम अपने जीवन में कुछ ऐसे कार्यों को पुनः स्थान दें जो शरीर को सक्रिय रखें। यदि हाथ की चक्की वापस नहीं आ सकती तो कम से कम हम श्रम की संस्कृति को वापस ला सकते हैं। पैदल चलना, घरेलू कार्यों में भागीदारी, बागवानी, नियमित शारीरिक श्रम और प्राकृतिक जीवनशैली अपनाकर हम उस खोए हुए सहज योग को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
विश्व योग दिवस के अवसर पर हमें केवल योगासन करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें यह भी समझना होगा कि योग केवल चटाई पर बैठकर किए जाने वाले आसनों का नाम नहीं है। योग जीवन की वह समग्र पद्धति है जो शरीर, मन और श्रम को एक सूत्र में बांधती है। हमारे पूर्वजों ने इसे जीवन में उतारा था, हमने इसे केवल आयोजनों तक सीमित कर दिया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करें। हाथ की आटा चक्की भले ही वापस न लौटे, लेकिन उससे मिलने वाले स्वास्थ्य और श्रम के संस्कार अवश्य लौट सकते हैं। यदि हम ऐसा नहीं कर पाए, तो आने वाले समय में अस्पतालों की कतारें लंबी होती जाएंगी और योग केंद्रों की संख्या बढ़ती जाएगी, लेकिन स्वास्थ्य फिर भी अधूरा ही रहेगा।
वास्तव में, घर से आटा चक्की का जाना केवल एक उपकरण का गायब होना नहीं था, बल्कि सहज योग, श्रम संस्कृति और स्वस्थ जीवनशैली की एक महत्वपूर्ण विरासत का घर से विदा होना था।यह आलेख ग्रामीण संस्कृति, योग, स्वास्थ्य और सामाजिक परिवर्तन पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करता है तथा संपादकीय पृष्ठ के लिए उपयुक्त है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“समय बदलने का इंतजार मत कीजिए, स्वयं को इतना मजबूत बनाइए कि समय को भी आपके अनुसार बदलना पड़े।”
