6/16, 21:33] Adv. Haresh Panwar: संपादकीय
भारतीय संस्कृति में जल को केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन, धर्म और पुण्य का प्रतीक माना गया है। हमारे शास्त्रों में अन्नदान से भी श्रेष्ठ जलदान को बताया गया है। प्यासे को पानी पिलाना केवल सेवा नहीं, बल्कि मानवता का सबसे पवित्र कर्तव्य माना जाता रहा है। यही कारण था कि कभी गांवों, कस्बों और नगरों की पहचान केवल भवनों और बाजारों से नहीं, बल्कि रास्तों पर बनी प्याऊओं, कुओं, बावड़ियों और जलसेवा की परंपरा से होती थी। लेकिन आज समय ने ऐसी करवट ली है कि पानी पिलाना धर्म नहीं, बल्कि एक लाभकारी व्यापार बनता जा रहा है। प्याऊ गायब हो रही हैं और उनकी जगह पानी की बोतलों तथा पुड़ियों ने ले ली है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
एक समय था जब गर्मियों की शुरुआत होते ही समाजसेवी, व्यापारी, धर्मप्रेमी परिवार और विभिन्न संस्थाएं राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाते थे। बड़े-बड़े मिट्टी के घड़ों में शीतल जल भरा जाता था। कहीं गुड़ और सौंफ का शरबत मिलता था तो कहीं छाछ और ठंडा पानी। बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, चौक-चौराहों और बाजारों में बैठा कोई बुजुर्ग अथवा सेवाभावी व्यक्ति आने-जाने वालों को बड़े प्रेम से पानी पिलाता था। उस समय पानी केवल शरीर की प्यास नहीं बुझाता था, बल्कि समाज में अपनत्व और मानवीय संवेदनाओं की प्यास भी शांत करता था।
राजस्थान सहित देश के अनेक हिस्सों में आज भी बुजुर्गों की स्मृतियों में वह दृश्य जीवित है जब गर्मियों की छुट्टियों में बच्चे प्याऊ पर सेवा करते थे। बस रुकती थी और बच्चे हाथों में रामसागर, लोटा या गिलास लेकर यात्रियों को पानी पिलाने दौड़ पड़ते थे। उस सेवा में न कोई लाभ था, न प्रचार और न ही किसी प्रकार का प्रदर्शन। वहां केवल मानवता थी, संस्कार थे और दूसरों के लिए कुछ करने का आनंद था।
लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। बाजारवाद ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है और पानी भी इससे अछूता नहीं रहा। अब घरों से लेकर समारोहों तक, हर जगह बोतलबंद पानी और पानी की पुड़ियों का चलन बढ़ गया है। विवाह, सम्मेलन, राजनीतिक सभाएं, धार्मिक आयोजन और सामाजिक कार्यक्रम—हर जगह पानी एक उत्पाद बन चुका है। लोग अब मटके के पानी की जगह प्लास्टिक की बोतल पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। यह विश्वास कितना सही है, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन इससे हमारी पारंपरिक जल संस्कृति को अवश्य गहरी चोट पहुंची है।
विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में बोतलबंद पानी ने समाज को अधिक सुरक्षित बनाया है या फिर उसने हमारी सामूहिक सेवा भावना को कमजोर कर दिया है? आज लोग हजारों रुपये खर्च कर पानी की बोतलें खरीद लेते हैं, लेकिन सार्वजनिक प्याऊ लगाने में रुचि कम दिखाई देती है। धर्म और सेवा की भावना का स्थान धीरे-धीरे व्यवसायिक सोच ने ले लिया है। परिणाम यह हुआ कि जो पानी कभी दुआएं कमाने का माध्यम था, वही आज मुनाफा कमाने का साधन बन गया है।
इस परिवर्तन का एक सांस्कृतिक पक्ष भी है। मटके का पानी केवल शीतलता नहीं देता था, वह प्रकृति के साथ हमारे संबंधों का प्रतीक था। मिट्टी के घड़े, कुएं, बावड़ियां, परिंदे और प्याऊ—ये सभी भारतीय जीवनशैली का हिस्सा थे। आज इनकी जगह प्लास्टिक की बोतलों ने ले ली है। इससे केवल संस्कृति का ह्रास नहीं हुआ, बल्कि पर्यावरण पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा है। लाखों टन प्लास्टिक कचरा जल स्रोतों और धरती को प्रदूषित कर रहा है।
एक और चिंता का विषय यह है कि पानी का बढ़ता व्यवसाय समाज में असमानता को भी बढ़ा रहा है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति तो बोतलबंद पानी खरीद सकता है, लेकिन गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति के लिए सार्वजनिक जलसुविधाएं पहले जैसी उपलब्ध नहीं रहीं। कभी गांव और शहरों में हर राहगीर के लिए पानी सहज उपलब्ध होता था, लेकिन अब कई स्थानों पर पानी भी खरीदना पड़ता है। यह स्थिति उस संस्कृति के विपरीत है जिसने सदियों तक “अतिथि देवो भवः” और “जल ही जीवन है” का संदेश दिया।
आज आवश्यकता केवल प्याऊ की भौतिक पुनर्स्थापना की नहीं है, बल्कि उस सेवा भावना को पुनर्जीवित करने की है जिसने हमारी सभ्यता को महान बनाया। विद्यालयों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और युवा पीढ़ी को जलदान की इस परंपरा से जोड़ने की जरूरत है। पक्षियों के लिए परिंदे, राहगीरों के लिए प्याऊ और सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का अभियान है।
समाज को यह समझना होगा कि विकास का अर्थ केवल आधुनिक सुविधाओं को अपनाना नहीं है, बल्कि अपनी मानवीय संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को भी बचाए रखना है। यदि पानी पूरी तरह व्यापार की वस्तु बन गया और जलदान की परंपरा समाप्त हो गई, तो हम केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं खोएंगे, बल्कि अपनी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी खो देंगे।
अंततः, यह प्रश्न केवल पानी का नहीं, बल्कि संस्कारों का है। जिस समाज में प्यासे को पानी पिलाना पुण्य माना जाता था, वहां यदि पानी भी व्यापार बन जाए तो यह केवल आर्थिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतावनी है। समय आ गया है कि हम फिर से प्याऊ की परंपरा को जीवित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि भारतीय संस्कृति में पानी केवल पीने की वस्तु नहीं, बल्कि मानवता का सबसे पवित्र प्रसाद है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“जीवन में सबसे बड़ी जीत दूसरों को हराने से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, आलस्य और नकारात्मक सोच को हराने से मिलती है। जो व्यक्ति स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसके लिए हर कठिनाई सफलता की सीढ़ी बन जाती है।”
