[6/10, 05:25] Adv. Haresh Panwar: संपादकीय
*“चिमटा खेती” या आस्था का कारोबार—धर्म के नाम पर पनपता दिखावा और सवालों के घेरे में समाज*
धर्म मानव जीवन की आत्मा है, जो व्यक्ति को नैतिकता, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। लेकिन जब इसी धर्म को साधन बनाकर स्वार्थ, प्रदर्शन और आडंबर का व्यापार शुरू हो जाए, तो वह समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। आज के समय में एक ऐसा ही नया विमर्श उभर रहा है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से “चिमटा खेती” कहा जा सकता है—जहाँ आस्था के नाम पर चमत्कार, दिखावा और चंदा-संस्कृति का संगठित कारोबार फल-फूल रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
समाज में यह देखने को मिल रहा है कि कुछ तत्व धर्म और आध्यात्म के चोले में स्वयं को प्रस्तुत कर जनता की भावनाओं से खेल रहे हैं। साधु-संत और धार्मिक छवि के पीछे कई बार ऐसे चेहरे सामने आते हैं जिनका अतीत प्रश्नों से घिरा होता है। अपराध, अवैध गतिविधियाँ और आर्थिक अनियमितताओं से जुड़ी पृष्ठभूमि रखने वाले कुछ लोग अचानक आध्यात्मिक मार्ग पर “परिवर्तन” का दावा करते हुए समाज में श्रद्धा का केंद्र बनने का प्रयास करते हैं। यह परिवर्तन यदि वास्तविक हो तो स्वागत योग्य है, लेकिन यदि इसके पीछे केवल एक नया “आर्थिक मॉडल” हो, तो यह चिंताजनक बन जाता है।
आज कई स्थानों पर धर्मस्थलों, आश्रमों और गौशालाओं के नाम पर विशाल आर्थिक नेटवर्क खड़ा होता दिखाई देता है। चंदा, दान और श्रद्धा के नाम पर बड़ी धनराशि एकत्र की जाती है। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब यह धन पारदर्शिता के अभाव में व्यक्तिगत विलासिता और दिखावटी जीवनशैली में बदलता दिखाई देता है। आलीशान भवन, लग्जरी वाहन, महंगे आभूषण और सोशल मीडिया पर चमत्कारों का प्रचार—ये सब मिलकर आस्था को व्यापार में बदलने का संकेत देते हैं।
यह भी देखा जा रहा है कि कई बार धार्मिक आयोजनों में चमत्कार, यज्ञ और तांत्रिक क्रियाओं को ऐसे प्रस्तुत किया जाता है जैसे वे ही जीवन की सभी समस्याओं का अंतिम समाधान हों। कहीं लाल मिर्च जलाकर, कहीं हवन के नाम पर अजीब प्रदर्शन करके श्रद्धालुओं को आकर्षित किया जाता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या धर्म का उद्देश्य भय और अंधविश्वास फैलाना है या व्यक्ति को आत्मविश्वास और विवेक प्रदान करना?
दूसरी ओर, आम नागरिक जो दिन-रात मेहनत करके अपनी आजीविका चलाता है, वह भी कई बार भावनात्मक रूप से इन आडंबरों का हिस्सा बन जाता है। वह अपने सीमित संसाधनों से दान करता है, यह सोचकर कि इससे उसका जीवन सुधरेगा या कोई चमत्कार होगा। लेकिन जब वही धन अनावश्यक भव्यता में परिवर्तित होता दिखता है, तो समाज में असंतोष और अविश्वास की भावना जन्म लेती है।
यह स्थिति केवल धार्मिक संस्थाओं पर ही सवाल नहीं उठाती, बल्कि समाज की सोच पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। आखिर क्यों लोग परिश्रम और शिक्षा पर भरोसा करने के बजाय चमत्कारों की ओर आकर्षित होते हैं? क्यों मेहनत की कमाई की तुलना में “तुरंत लाभ” देने वाले दावों पर अधिक विश्वास किया जाता है?
सत्य यह है कि धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को भय से मुक्त करना है, न कि उसे भय और भ्रम में उलझाना। धर्म वह शक्ति है जो व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है, न कि उसे बाहरी आडंबरों पर निर्भर बनाती है। जब धर्म साधना से हटकर प्रदर्शन बन जाता है, तब वह अपनी मूल आत्मा खो देता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज विवेकशील बने। श्रद्धा और अंधविश्वास के बीच अंतर को समझे। किसी भी धार्मिक गतिविधि को बिना प्रश्न किए स्वीकार करने के बजाय उसके उद्देश्य और पारदर्शिता पर भी विचार करे। साथ ही, धार्मिक संस्थाओं में वित्तीय और नैतिक पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि आस्था का दुरुपयोग रोका जा सके।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप सेवा, सत्य और सरलता में निहित है। यदि “चिमटा खेती” जैसे प्रतीकात्मक आडंबर धर्म के नाम पर पनपते रहेंगे, तो यह न केवल आस्था को कमजोर करेंगे बल्कि समाज की सोच को भी दूषित करेंगे। समय आ गया है कि धर्म को व्यापार नहीं, बल्कि जीवन का नैतिक मार्गदर्शन माना जाए।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
जब आस्था विवेक से अलग हो जाती है, तब धर्म मार्गदर्शन नहीं रह जाता, बल्कि भ्रम का माध्यम बन जाता है। सच्ची श्रद्धा वही है जो मनुष्य को सोचने, समझने और सत्य के करीब ले जाए, न कि उसे अंधविश्वास की ओर धकेले।
