भीम प्रज्ञा संपादकीय
संपादकीय@Haresh Panwar
चेहरे की चमक नहीं, चरित्र की रोशनी अमर होती है
एक बार एक राजा ने अपने राज्य के दो व्यक्तियों को राजसभा में बुलाया। पहला व्यक्ति अत्यंत सुंदर, आकर्षक व्यक्तित्व वाला और आलीशान वस्त्रों में सुसज्जित था। दूसरा साधारण वेशभूषा में, झुर्रियों से भरा चेहरा लिए एक वृद्ध व्यक्ति था। राजा ने दोनों को देखकर उपस्थित लोगों से पूछा—“इन दोनों में अधिक सुंदर कौन है?” अधिकांश लोगों ने पहले व्यक्ति की ओर इशारा किया। तब राजा ने दोनों को एक-एक सप्ताह के लिए जनता के बीच भेजा। एक सप्ताह बाद परिणाम चौंकाने वाले थे। सुंदर व्यक्ति के अहंकार, कठोर व्यवहार और स्वार्थ ने लोगों के मन में उसके प्रति घृणा भर दी, जबकि वृद्ध व्यक्ति की विनम्रता, सेवा भावना और मधुर व्यवहार ने उसे जन-जन का प्रिय बना दिया। तब राजा ने कहा—“चेहरा आंखों को प्रभावित करता है, लेकिन चरित्र आत्मा को जीत लेता है।”
यह प्रसंग आज के समाज के लिए एक गहरा संदेश छोड़ता है। हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ बाहरी सौंदर्य का बाजार पहले से कहीं अधिक बड़ा हो चुका है। सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह हमें यही सिखाया जा रहा है कि सुंदर दिखना ही सफलता और सम्मान की कुंजी है। लोग अपने चेहरे की चमक बनाए रखने के लिए हजारों रुपये खर्च करने को तैयार हैं, लेकिन अपने चरित्र को चमकाने के लिए कुछ क्षण भी आत्मचिंतन में नहीं बिताना चाहते। यह विडंबना ही है कि हम शरीर को सजाने में जितना समय लगाते हैं, उतना समय अपने विचारों और व्यवहार को सुंदर बनाने में नहीं लगाते। यहां मैं बोलूंगा तो फिर करोगे कि बोलता है।
प्रकृति का यह अटल नियम है कि जो दिखाई देता है, वह एक दिन बदल जाता है। ऋतुएँ बदलती हैं, वृक्षों के पत्ते बदलते हैं, नदियों का प्रवाह बदलता है और मानव शरीर भी परिवर्तन के इसी नियम के अधीन है। आज जो युवा है, वह कल वृद्ध होगा। आज जिस चेहरे पर आकर्षण है, उसी चेहरे पर कल उम्र की लकीरें दिखाई देंगी। शारीरिक सौंदर्य समय का अतिथि है, जो बिना बताए एक दिन विदा हो जाता है। इसलिए केवल रूप-रंग पर गर्व करना रेत के घरौंदे पर महल बनाने जैसा है।
इसके विपरीत, चरित्र और हृदय की सुंदरता कभी बूढ़ी नहीं होती। दयालुता की कोई उम्र नहीं होती, ईमानदारी कभी झुर्रियों से नहीं भरती और सेवा भावना कभी अपनी चमक नहीं खोती। महात्मा गांधी का व्यक्तित्व किसी फिल्मी नायक जैसा आकर्षक नहीं था, लेकिन उनके चरित्र का तेज आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा है। डॉ. भीमराव आंबेडकर की महानता उनके चेहरे में नहीं, बल्कि उनके विचारों, संघर्ष और मानवता के प्रति समर्पण में थी। इतिहास ने कभी सुंदर चेहरों को याद नहीं रखा, लेकिन महान चरित्र वाले लोगों को सदियों तक सम्मान दिया है।
आज समाज में रिश्तों के टूटने का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमने मनुष्य का मूल्यांकन उसके बाहरी स्वरूप, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा से करना शुरू कर दिया है। विवाह हो, मित्रता हो या सामाजिक संबंध—हम अक्सर व्यक्ति के व्यक्तित्व की बजाय उसके प्रदर्शन से प्रभावित हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, हम कई बार अच्छे इंसानों को खो देते हैं और केवल आकर्षण के भ्रम में जीते रहते हैं।
यह भी सत्य है कि बाहरी सौंदर्य देखने वाले की आँखों को कुछ क्षणों के लिए आकर्षित कर सकता है, लेकिन आंतरिक सौंदर्य जीवन भर के लिए सम्मान अर्जित करता है। जिस व्यक्ति का हृदय पवित्र होता है, उसके पास बैठकर ही मानसिक शांति का अनुभव होता है। ऐसे लोग समाज की अमूल्य धरोहर होते हैं। वे अपने व्यवहार से लोगों के जीवन में उजाला भरते हैं। उनका व्यक्तित्व किसी इत्र की तरह होता है, जिसकी सुगंध उनके जाने के बाद भी लोगों की स्मृतियों में बनी रहती है।
दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक जीवनशैली ने हमें बाहरी सौंदर्य के प्रति इतना आकर्षित कर दिया है कि हम आत्मा की सुंदरता को भूलते जा रहे हैं। सोशल मीडिया के फिल्टर चेहरे को सुंदर बना सकते हैं, लेकिन वे किसी के चरित्र को सुंदर नहीं बना सकते। महंगे वस्त्र व्यक्ति को सभ्य दिखा सकते हैं, लेकिन उसके संस्कारों का निर्माण नहीं कर सकते। बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ व्यक्ति को विद्वान बना सकती हैं, लेकिन उसे संवेदनशील और मानवतावादी नहीं बना सकतीं।
वास्तविक सौंदर्य उस व्यक्ति में होता है जो दूसरों के दुःख को समझता है, जो किसी जरूरतमंद की सहायता के लिए आगे बढ़ता है, जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता और जो परिस्थितियाँ विपरीत होने पर भी अपनी नैतिकता को नहीं छोड़ता। ऐसे लोग भले ही साधारण दिखाई दें, लेकिन समाज उन्हें असाधारण मानता है।
जीवन का अंतिम सत्य यही है कि जब मनुष्य इस संसार से विदा होता है, तब उसकी सुंदरता, उसकी संपत्ति और उसका वैभव उसके साथ नहीं जाते। लोग उसके चेहरे को नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और कर्मों को याद रखते हैं। किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं होती कि लोग उसे देखकर प्रभावित हों, बल्कि यह होती है कि लोग उसे याद करके प्रेरित हों।
इसलिए समय रहते हमें अपने बच्चों को यह सिखाने की आवश्यकता है कि चेहरे की सुंदरता नहीं, बल्कि चरित्र की श्रेष्ठता जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है। अपने व्यक्तित्व को सजाने से पहले अपने विचारों को सुंदर बनाइए। अपने शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ अपने हृदय को भी करुणा, प्रेम और सेवा के संस्कारों से भरिए।
क्योंकि सच तो यही है कि उम्र चेहरे की चमक को छीन सकती है, लेकिन एक नेक इंसान की पहचान को कभी नहीं मिटा सकती। चरित्र की रोशनी ही वह दीपक है, जो मृत्यु के बाद भी पीढ़ियों तक प्रकाश देता रहता है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“चेहरे की सुंदरता समय के साथ ढल जाती है, लेकिन चरित्र की सुंदरता जीवन भर सम्मान दिलाती है। मनुष्य का वास्तविक श्रृंगार उसके विचार, व्यवहार और संवेदनाएं हैं, जिन्हें समय कभी वृद्ध नहीं कर सकता।”
