भीम प्रज्ञा अलर्ट परंपराएं तभी तक पवित्र रहती हैं, जब तक वे संस्कार सिखाएं जिन परंपराओं में नशा, दिखावा और दबाव घुस जाए, वे भविष्य नहीं—भ्रम पैदा करती हैं।
संपादकीय@Haresh Panwar 24 jan.2026
छठी की रात और संस्कारों की लिखावट
भारतीय समाज में संतान का जन्म केवल परिवार का निजी उत्सव नहीं रहा, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक उत्तरदायित्व का विषय रहा है। विशेषकर नवजात शिशु के जन्म के छठे दिन मनाई जाने वाली छठी परंपरा लोक-आस्था, प्रतीक और संस्कारों का अद्भुत समन्वय रही है। यह परंपरा इस विश्वास पर आधारित रही कि उसी रात कोई अदृश्य दैवीय शक्ति—जिसे कहीं बेमाता, कहीं विधाता या संस्कार-लेखनी देवी कहा गया—शिशु के जीवन का लेखा-जोखा लिखने आती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
इसी विश्वास के कारण छठी को साधारण उत्सव नहीं, बल्कि अत्यंत पवित्र और संयमित रात्रि माना गया। कच्चे घरों के दरवाजों और पक्के मकानों की रंग-रोगन वाली दीवारों पर गोबर के लेप से परंपरागत आकृतियाँ उकेरी जाती थीं। उन आकृतियों के ऊपर रंग-बिरंगे कपड़ों की कतरनें सजाई जातीं, बीच-बीच में शीशे के छोटे-छोटे टुकड़े चिपकाए जाते, समुद्र या नदियों से निकली कौड़ियाँ (कोढ़ी) लगाई जातीं और बुहारी (बबुह) की सींकें प्रतीक रूप में टांगी जाती थीं। यह सब केवल सजावट नहीं था, बल्कि बुरी शक्तियों से रक्षा, सकारात्मक ऊर्जा के आवाहन और जीवन में संतुलन के प्रतीक माने जाते थे।
घर के आंगन में नीम के पत्ते, मिंगनों से जलाई गई धूनी, दीप-धूप और भजन-सत्संग का वातावरण होता था। पूरी रात जागरण होता—पर वह जागरण आत्मसंयम, भक्ति और संवाद का होता था। उस रात घर में शब्दों की मर्यादा होती थी, व्यवहार में संयम होता था और वातावरण में एक अदृश्य पवित्रता व्याप्त रहती थी।
लेकिन आज जब हम वर्तमान परिदृश्य पर दृष्टि डालते हैं, तो यही छठी परंपरा एक भयावह और चिंताजनक रूप में हमारे सामने खड़ी दिखाई देती है। श्रद्धा की जगह शोर ने ले ली है, भजन की जगह ताश-पत्ती ने, और जागरण की जगह जुआ, शराब, गाली-गलौज और धुएँ से भरा अंधेरा छा गया है। जिस रात को संस्कारों की लिखावट मानी जाती है, वही रात आज असंस्कारों के खुले प्रदर्शन की रात बनती जा रही है।
विडंबना यह है कि इस आयोजन में वही लोग सबसे अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं, जिनका स्वयं का जीवन अनुशासन, श्रम और नैतिकता से दूर होता है। समझदार और कामकाजी व्यक्ति या तो सामाजिक दबाव में मौन रहते हैं या दूरी बना लेते हैं, जबकि पूरी रात निठल्लों की मंडली ताश की गड्डियों, शराब की बोतलों और गांजे-भांग की चिलम के इर्द-गिर्द जमा रहती है। साधु-संतों के भेष में कुछ बाबाजी भी इस विकृत वातावरण को मान्यता देते दिखाई देते हैं।
लोक-आस्था के अनुसार, जब बेमाता शिशु के भविष्य का लेख लिखने आती है, तब यदि घर-आंगन में यही दृश्य उपस्थित हो—तो क्या यह कल्पना करना कठिन है कि वह देवी सब कुछ देखकर केवल एक शब्द लिख दे—“तथास्तु”?
यहीं से मूल प्रश्न जन्म लेता है। क्या हम सचमुच अपने बच्चों के उज्ज्वल, संस्कारित और जिम्मेदार भविष्य की कामना करते हैं, या परंपरा के नाम पर अपनी सामाजिक विकृतियों को वैध ठहराना चाहते हैं? जिस समाज में बच्चे के जन्म के साथ ही कुसंस्कारों का बीजारोपण कर दिया जाए, वहाँ से चरित्रवान नागरिक, संवेदनशील प्रशासक और जिम्मेदार नेतृत्व कैसे विकसित होगा?
आज हम मंचों पर संस्कार, नैतिकता और आदर्शों की बातें करते हैं, लेकिन व्यवहार में हमारे सबसे पवित्र संस्कार-उत्सव नशे और दिखावे के केंद्र बन चुके हैं। छठी जैसे आयोजन अब कई क्षेत्रों में “कंपलसरी” शराब-पार्टी का रूप ले चुके हैं। यदि जुआ-शराब की व्यवस्था न हो, तो सामाजिक असंतोष और रिश्तों में खलल की धमकी दी जाती है। यह सामाजिक दबाव ही वह मौन अपराध है, जिसने गलत को परंपरा और सही को असहज बना दिया है।
यह केवल नैतिक या धार्मिक चिंता का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक भविष्य का प्रश्न है। संस्कार भाषणों से नहीं, वातावरण से बनते हैं। यदि नवजात शिशु के जीवन का पहला सामूहिक अनुभव नशे, शोर और असंयम से जुड़ा होगा, तो उससे संयम, सेवा और संवेदनशीलता की अपेक्षा करना आत्मवंचना ही होगी।
इस तिलस्मी विडंबना को तोड़ने के लिए साहसिक आत्ममंथन आवश्यक है। छठी परंपरा को बचाने का अर्थ है उसके मूल उद्देश्य को पुनर्जीवित करना—सादगी, भजन, सामूहिक प्रार्थना और सकारात्मक संवाद। “नहीं” कहना भी संस्कार है, यह बात समाज को फिर से स्वीकार करनी होगी।
ग्राम पंचायतों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक गुरुओं और परिवार के वरिष्ठजनों को मिलकर इस विषय पर खुली चर्चा करनी चाहिए। मीडिया और अख़बारों की भूमिका भी केवल घटनाएँ दर्ज करने तक सीमित न रहे, बल्कि चेतना जागृत करने की हो।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि देवी आती है या नहीं। प्रश्न यह है कि हम अपने बच्चों के लिए किस तरह का समाज रच रहे हैं। यदि हम सचमुच चाहते हैं कि हमारी संतानें संस्कारित, सक्षम और स्वाभिमानी नागरिक बनें, तो इसकी शुरुआत उसी छठी की रात से करनी होगी—जहाँ गोबर-लेप की आकृतियाँ केवल दीवारों पर नहीं, बल्कि हमारे आचरण में भी दिखाई दें। तभी छठी की रात से समाज की सुबह उजली हो सकेगी।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
परंपराएं तभी तक पवित्र रहती हैं, जब तक वे संस्कार सिखाएं
जिन परंपराओं में नशा, दिखावा और दबाव घुस जाए,
वे भविष्य नहीं—भ्रम पैदा करती हैं।

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