संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार Date 12.01.2026
सफलता की सीढ़ियां और पीछे खींचने वाले हाथ
जीवन वास्तव में एक निरंतर चलने वाली यात्रा है, जिसमें हर कदम हमें नए अनुभव, नई सीख और नई चुनौतियाँ देता है। इस यात्रा का सबसे बड़ा और कड़वा सत्य यह है कि जैसे-जैसे इंसान सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता है, वैसे-वैसे उसे पीछे खींचने वालों की संख्या भी बढ़ती जाती है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय मनोविज्ञान का वह पहलू है, जिसे हर सफल व्यक्ति ने कभी न कभी महसूस किया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जब कोई व्यक्ति साधारण जीवन जी रहा होता है, तब तक उसे न तो कोई खास रोकता है और न ही उस पर विशेष नजर रखी जाती है। लेकिन जैसे ही वही व्यक्ति मेहनत, ईमानदारी और लगन के बल पर आगे बढ़ने लगता है, उसकी सफलता कुछ लोगों को असहज करने लगती है। यही असहजता धीरे-धीरे ईर्ष्या में बदल जाती है। ईर्ष्या वह आग है, जो पहले मन को जलाती है और फिर शब्दों, अफवाहों और षड्यंत्रों के रूप में बाहर आती है।
पीछे खींचने वाले लोग कई रूपों में सामने आते हैं। कुछ सीधे-सीधे आलोचना करते हैं, कुछ पीठ पीछे नकारात्मक बातें फैलाते हैं, तो कुछ सलाह के आवरण में भ्रम पैदा करते हैं। वे कहते हैं—“इतना मत उड़ो”, “ज्यादा आगे गए तो गिर जाओगे”, “ये तुम्हारे बस की बात नहीं है।” इन शब्दों में छिपी चिंता कम और असुरक्षा अधिक होती है। दरअसल, आपकी उड़ान उन्हें अपनी जमीन छोटी लगने लगती है।
यह भी सत्य है कि हर आलोचक गलत नहीं होता, लेकिन हर आलोचना को दिल पर लेना भी समझदारी नहीं है। सफल व्यक्ति वही होता है जो उपयोगी आलोचना और निरर्थक नकारात्मकता के बीच अंतर करना जानता है। जो बात हमें सुधारने का अवसर दे, उसे स्वीकार करना चाहिए, लेकिन जो केवल हतोत्साहित करने के लिए कही जाए, उसे अनदेखा करना ही बेहतर है।
इतिहास गवाह है कि दुनिया के हर महान व्यक्ति को अपने समय में विरोध, अपमान और अविश्वास का सामना करना पड़ा। चाहे वह वैज्ञानिक हों, समाज सुधारक हों, कलाकार हों या उद्यमी—सभी ने पीछे खींचने वाले हाथों को महसूस किया है। लेकिन उन्होंने उन हाथों को अपनी टांग बनने दिया, जंजीर नहीं। उन्होंने आलोचना को ईंधन बनाया और आगे बढ़ते गए।
सफलता की राह आसान नहीं होती। यह रास्ता कांटों से भरा होता है, जहाँ हर कदम पर परीक्षा होती है—धैर्य की, आत्मविश्वास की और संकल्प की। जो व्यक्ति इन परीक्षाओं में डगमगा जाता है, वह अक्सर भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाता है। लेकिन जो इन चुनौतियों को स्वीकार कर आगे बढ़ता है, वही इतिहास रचता है।
पीछे खींचने वाले लोग वास्तव में हमारे जीवन के आईने होते हैं। वे अनजाने में यह संकेत देते हैं कि हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं। यदि आप किसी को असहज कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि आपकी प्रगति दिख रही है। शांत पानी में लहरें नहीं उठतीं, लहरें वहीं उठती हैं जहाँ गहराई और गति होती है।
आज के दौर में सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है। यहां सफलता से ज्यादा चर्चा असफलता की होती है, और आगे बढ़ने वाले से ज्यादा पीछे खींचने वालों की भीड़ होती है। ट्रोलिंग, नकारात्मक टिप्पणियाँ और चरित्र हनन अब आम बात हो गई है। ऐसे समय में मानसिक मजबूती सबसे बड़ा हथियार है। खुद पर विश्वास और अपने लक्ष्य के प्रति निष्ठा ही हमें इस शोर से बचा सकती है।
यह जरूरी है कि हम अपने आसपास ऐसे लोगों को चुनें, जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दें। सकारात्मक संगति सफलता की ऊर्जा को बढ़ाती है, जबकि नकारात्मक संगति उसे धीरे-धीरे खत्म कर देती है। इसलिए जीवन में कभी-कभी रिश्तों की छंटनी भी आवश्यक हो जाती है—उन लोगों से दूरी बनाना, जो हमारी प्रगति से खुश नहीं होते।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि सफलता व्यक्तिगत यात्रा है। इसमें तालियाँ भी मिलेंगी और ताने भी। फर्क सिर्फ इतना है कि हम किसे सुनते हैं और किसे अनसुना करते हैं। जैसा कि कहा गया है—
“तू अपनी खूबियाँ ढूंढ, कमियाँ निकालने के लिए लोग हैं,
अगर रखना ही है कदम तो आगे रख, पीछे खींचने के लिए लोग हैं।”
सफलता का वास्तविक आनंद तभी है, जब हम तमाम विरोधों, ईर्ष्या और बाधाओं के बावजूद अपने रास्ते पर अडिग रहें। पीछे खींचने वाले हमेशा रहेंगे, लेकिन मंज़िल उन्हीं को मिलती है, जो रुकते नहीं, झुकते नहीं और हारते नहीं। यही जीवन का सार है और यही सफलता का सबसे बड़ा मंत्र।
