भीम प्रज्ञा विशेष रिपोर्ट।
उत्तराखंड की हिंदी पत्रकारिता पर खोजबीन करते-करते उत्तराखंड के जाने-माने आदिवासी एडवोकेट राजेन्द्र कुटियाल से हल्द्वानी में जाकर साक्षी गौतम मिलीं। कुटियाल जी एक सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं ही पर उत्तराखंड विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुकें हैं। ये उत्तराखंड के आदिवासियों की जानकारी रखने के कारण इनसे बातचीत करना उचित समझा। कुटियाल जी का कहना है उत्तराखंड के आदिवासियों की ‘अमटीकर’, ‘गढ़ वैराट’, ‘छिला-दिगा’ पत्रा-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। अन्य राज्यों के आदिवासियों की तरह उत्तराखंड के आदिवासियों की कोई बड़ी पत्रिका नहीं हैउत्तराखंड में कौन-कौन-से आदिवासी निवास करते हैं?थारू, बुक्सा, भोटिया, जोनसारी, राजी नाम से उत्तराखंड में मुख्य रूप से आदिवासी निवास करते हैं। यहाँ सबसे साधन सम्पन्न भोटिया एवं जोनसारी आदिवासी है। साधन सम्पन्न का मुख्य कारण यह है कि ये पहले से ही व्यापारी रहे हैं। अपने विकास का आधार प्रारंभ से ही शिक्षा को मानते रहे हैं। राजी नामक आदिवासी साधन हीन होने के कारण शिक्षा से दूर रहे। इसलिए ये आर्थिक रूप से दयनीय है।उत्तराखंड को देवभूमि कहने का औचित्य क्या है?उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में मनुवादियों ने प्रचारित किया है। हम लोग इसे देवभूमि नहीं बोलते। इतिहास की पुस्तकों को पढ़ने से पता चलता है कि यहाँ नागवंशियों का शासन था।उसकी वजह से यहाँ कई स्थानों के नाम आज भी नाग के रूप में प्रचलित हैं। जैसे बैरीनाग। यहाँ नागजातियों के मंदिर भी हैं। बौद्ध विहारों का सनातनीकरण कर दिया गया है। सनातनी देवी-देवताओं को प्रचारित करने के लिए यहाँ के सनातनी उत्तराखंड को देवभूमि कहने लगे हैं। नंदराम बौद्ध की पुस्तक को पढ़ने से और स्पष्ट हो जाएगा।
उत्तराखंड में कौन कौन-से आदिवासी अधिक साधन सम्पन्न है और कौन-से कमजोर है?भोट क्षेत्रा के होने के कारण हमें भोटिया जनजाति के रूप में बोला जाता है। देखा जाए तो भोटिया जनजाति शौका/रं/रौंग्पा कहलवाना अधिक पसंद करते हैं। भोटिया मूल रूप से व्यापारी होते हैं। भोटिया जनजाति के लोग भारत, तिब्बत और नेपाल देश को टैक्स देते थे। चाइना ने तिब्बत पर कब्जा किया। ये आदिवासी तिब्बत एवं नेपाल से व्यापार करते थे। वर्ष 1962 में भारत चीन युद्ध होने के कारण भोटिया जनजाति का व्यापार खत्म हो गया। शिक्षा पर भोटिया जनजाति का फोकस शुरू से ही था। महिलाएँ हों, चाहे पुरुष सभी व्यापार करते थे। व्यापार के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है। वर्ष 1962 में भारत चीन युद्ध होने के कारण भोटिया आदिवासियों का व्यापार खत्म हो गया। वर्ष 1967 में उत्तराखंड की भोटिया आदिवासी को आरक्षण का लाभ मिलना शुरू हुआ। शिक्षा होने के कारण आदिवासी सरकारी सेवाओं में जाने लगे। आज आदिवासियों में सबसे अच्छी स्थिति भोटिया एवं जोनसारी आदिवासी की है। राजी नामक आदिवासी सबसे कमजोर हैं। इंसानियत के हकों से कोसों दूर हैं।क्या उत्तराखंड में आदिवासियों से संबंधित कोई स्कूल/काॅलेज/शोध संस्थान एवं विश्वविद्यालय है?
उत्तराखंड में एक रं कम्युनिटी नाम से स्कूल है। यह रं कल्याण संस्था द्वारा संचालित है। यह छोटे बच्चों का है जो धारचूला एवं जोनसारी में भी है। बडे़ स्तर पर उत्तराखंड के आदिवासियों का अभी तक कोई मेडिकल/इंजीनियरिंग काॅलेज नहीं है। डाॅ. आर. एस. टोलिया प्रशासनिक अकादमी, नैनीताल। यह संस्थान आई.ए.एस. एवं पी.सी.एस. की टेªनिंग के लिए प्रसिद्ध है। इस संस्थान में उत्तराखंड के सभी अधिकारियों की टेªनिंग एवं शोध कार्य होते हैं। गंगोत्तरी गब्र्याल गल्स इंटर काॅलेज, धारचूला, पिथौरागढ़ एवं बोक्सा जनजाति इंटर काॅलेज देहरादून, थारू इंटर काॅलेज, खटीमा, उधम सिंह नगर में संचालित हैं। विशेष बात यह है कि यहाँ के आदिवासी महापुरुषों के नाम पर कोई विश्वविद्यालय नहीं है।
उत्तराखंड के आदिवासियों की मुख्य रूप से क्या-क्या समम्याएँ है?उत्तराखंड के आदिवासी विशेष रूप से दुर्गम क्षेत्रों में निवास करते हैं, वहाँ अच्छी सड़क की व्यवस्था नहीं है। इसे हिमालय का तराई क्षेत्रा भी कहते हैं। अब यहाँ कुछ टूरिज्म विकसित होने लगा है। यहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याएँ है। स्वास्थ्य के चलते ही लोग पलायन कर रहे है। सुविधाएँ मिलने में अभी समय लगेगा। सवर्ण जातियों द्वारा यहाँ के आदिवासियों की जमींनों का कब्जा किया जा रहा है।उत्तराखंड में पत्रा-पत्रिकाएँ, स्मारिकाएँ कौन-कौन-से आदिवासियों द्वारा प्रकाशित होती हैं?
उत्तराखंड से ‘अमटीकर’ नामक स्मारिका तथा रिंलैबा नाम से पत्रिका हल्द्वानी और देहरादून से प्रकाशित होती है। ‘गढ़ वैराट’ साप्ताहिक समाचार पत्रा तथा ‘गढ़ बैराट’ दैनिक ई-पेपर देहरादून से प्रकाशित होता है। भोटिया जनजाति से ‘रिंगलैबा’ पत्रिका तथा ‘जोहार समाचार’ भोटिया जनजाति द्वारा प्रकाशित होता है। ‘जनजातियों की आवाज़’ नाम से भी एक पत्रिका उत्तराखंड से प्रकाशित होती रही है। खुशाल सिंह के संपादन में ‘नयी छिला-दिगा’ त्रौमासिक पत्रिका जोहार साँस्कृतिक संगठन, 118, शांति विहार, निम्बूवाला, कौलागढ़, देहरादून, उत्तराखंड से वर्ष 2006 से प्रकाशित हो रही है। कुल मिलाकर उत्तराखंड के आदिवासियों की ‘अमटीकर’, ‘गढ़ वैराट’, ‘छिला-दिगा’ पत्रा-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हैं। अन्य राज्यों के आदिवासियों की तरह उत्तराखंड के आदिवासियों की कोई बड़ी पत्रिका नहीं है।उत्तराखंड के आदिवासियों का कोई सामाजिक संगठन है और उसके क्या-क्या कार्य है?
हाँ है। बाॅक्सा जनजाति कल्याण समिति, राजी जनजाति को छोड़कर उपरोक्त उत्तराखंड की चारों जनजातियों ने शिक्षा को महत्त्व दिया है। ये सरकारी सेवाओं में भी जाने लगे हैं। जो परेशानी आती हैं उनका निदान करने के लिए रं कल्याण संस्था काम करती है। इसका कार्यालय देहरादून में है। राजनीतिक स्तर पर उत्तराखंड के आदिवासियों का कोई संगठन नहीं है। स्वास्थ्य सुविधाओं का भी यहाँ की जनजातियों के लिए अभाव है। उत्तराखंड वैचारिकी मंच भी है। यह मंच भी उत्तराखंड की जनजातियों की मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है।
