भीम प्रज्ञा @संपादकीय
भारत में शिक्षा को हमेशा राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत नींव माना गया है। एक गरीब मजदूर से लेकर मध्यम वर्गीय परिवार तक अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत करता है। कोई खेत गिरवी रखता है, कोई कर्ज लेता है, तो कोई अपनी जरूरतों को मारकर बच्चों के सपनों को पंख देने का प्रयास करता है। विशेषकर मेडिकल जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। दिन-रात किताबों के बीच संघर्ष करते हुए वे अपने भीतर एक डॉक्टर बनने का सपना संजोते हैं। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही पेपर लीक होने की खबरें सामने आती हैं, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि लाखों विद्यार्थियों और अभिभावकों का विश्वास भी टूट जाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। नीट परीक्षा को लेकर जिस प्रकार पेपर आउट और धांधली के आरोप सामने आए हैं, उसने पूरे देश को झकझोर दिया है। जिन अभिभावकों ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए लाखों रुपए कोचिंग, हॉस्टल और पढ़ाई पर खर्च किए, आज उनके चेहरे चिंता और निराशा से भरे हुए दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि देश की सबसे बड़ी परीक्षा एजेंसियों में शामिल संस्थाएँ भी निष्पक्षता बनाए रखने में असफल हो रही हैं, तो फिर आम नागरिक किस पर भरोसा करे?
आज स्थिति यह बन चुकी है कि शायद ही कोई भर्ती या प्रतियोगी परीक्षा ऐसी बची हो, जिस पर पेपर लीक या नकल माफियाओं का साया ना हो। शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, पटवारी परीक्षा, रीट परीक्षा और अब मेडिकल प्रवेश परीक्षा—हर जगह मेहनत और ईमानदारी कटघरे में खड़ी दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि आखिर पेपर छपने से पहले ही बाजार में कैसे पहुंच जाते हैं? क्या यह केवल कुछ लोगों की गलती है? नहीं, यह पूरे सिस्टम में फैल चुके भ्रष्टाचार की भयावह तस्वीर है। देश एक ओर “विश्व गुरु” बनने का दावा करता है, लेकिन दूसरी ओर शिक्षा में नकल और पेपर आउट का कारोबार फल-फूल रहा है। यह विडंबना ही है कि जिस शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्र का भविष्य गढ़ना था, वही व्यवस्था आज खुद शर्मसार होती दिखाई दे रही है। यदि डॉक्टर बनने की परीक्षा ही संदिग्ध हो जाए, तो सोचिए भविष्य में चिकित्सा व्यवस्था का क्या होगा? जो विद्यार्थी मेहनत के बजाय पैसे और धांधली के दम पर डॉक्टर बनेंगे, वे समाज की जिंदगी के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ कर सकते हैं।
आज शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार—तीनों क्षेत्र गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। शिक्षा में भ्रष्टाचार, चिकित्सा में व्यवसायीकरण और रोजगार में धांधली ने युवाओं के भीतर असुरक्षा और अविश्वास का वातावरण पैदा कर दिया है। स्कूलों और कॉलेजों में प्रोफेशनल कोर्स के नाम पर भारी फीस वसूली जा रही है। प्रैक्टिकल और आंतरिक अंकों के नाम पर हजारों रुपए ऐंठे जाते हैं। पढ़ाई कम और दिखावा ज्यादा हो रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है, लेकिन अंकों का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है।
आज ऐसे परिणाम सामने आते हैं, जहाँ विद्यार्थी ठीक से भाषा तक नहीं लिख पाता, लेकिन उसके अंक 95 से 100 प्रतिशत तक पहुँच जाते हैं। कभी ऐसा समय था जब शिक्षक परीक्षा परिणाम को “सोने के भाव” तौलते थे। विद्यार्थी मेहनत करके अंक अर्जित करता था। लेकिन आज कई जगह अंक “थोक के भाव” बंटते दिखाई दे रहे हैं। मार्कशीट चमक रही है, लेकिन ज्ञान कमजोर होता जा रहा है। यह शिक्षा का विकास नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता का पतन है। सबसे ज्यादा मानसिक पीड़ा उस ईमानदार और मेहनती विद्यार्थी को होती है, जो वर्षों तक संघर्ष करता है और फिर देखता है कि कोई दूसरा व्यक्ति पैसे और सिफारिश के दम पर सफलता हासिल कर लेता है। ऐसी घटनाएँ युवाओं के मन में निराशा और व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती हैं। धीरे-धीरे यह भावना समाज को अंदर से खोखला करती जाती है। जब ईमानदारी हारती दिखाई देती है, तब मेहनत करने वाले युवाओं का मनोबल टूटना स्वाभाविक है।
सरकार और संबंधित एजेंसियों को अब केवल बयान देने से आगे बढ़ना होगा। परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। पेपर लीक करने वालों के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे अपराधों को केवल कानूनी गलती नहीं, बल्कि “राष्ट्र के भविष्य के साथ विश्वासघात” माना जाना चाहिए। परीक्षा केंद्रों से लेकर पेपर प्रिंटिंग और वितरण तक हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। इसके साथ ही अभिभावकों और समाज को भी समझना होगा कि बच्चों पर केवल अंक लाने का दबाव ना डालें। उन्हें ईमानदारी, नैतिकता और धैर्य का महत्व समझाना भी जरूरी है। क्योंकि सफलता का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह परिश्रम और सत्यनिष्ठा से प्राप्त हो।अंततः यह समझना होगा कि पेपर लीक केवल एक खबर नहीं है, बल्कि लाखों सपनों की हत्या है। यदि शिक्षा व्यवस्था में ईमानदारी और पारदर्शिता स्थापित नहीं हुई, तो देश की प्रतिभा धीरे-धीरे व्यवस्था से भरोसा खो देगी। और जिस राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था बीमार हो जाए, उसका भविष्य कभी स्वस्थ नहीं रह सकता।
