हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद चुनाव पर असमंजस, विकास सूचकांक ने खोली गांवों की जमीनी हकीकत
हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद चुनाव पर असमंजस, विकास सूचकांक ने खोली गांवों की जमीनी हकीकत
महिला-बाल विकास में पिछड़ी पंचायतें, पानी और मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे ग्रामीण
भीम प्रज्ञा न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट
राजस्थान में पंचायत चुनावों को लेकर जारी असमंजस के बीच गांवों की सरकारों की हालत को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। एक ओर हाईकोर्ट ने 31 जुलाई तक पंचायत चुनाव करवाने के निर्देश दिए हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार ने विभिन्न प्रशासनिक और कानूनी कारणों का हवाला देते हुए इस समय चुनाव करवाना उचित नहीं माना है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
इसी बीच पंचायतीराज मंत्रालय द्वारा जारी पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स 2.0 ने राजस्थान के ग्रामीण विकास की वास्तविक तस्वीर सामने रख दी है। रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश की अधिकांश पंचायतें सामाजिक न्याय और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में तो अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन महिला सशक्तिकरण, बाल विकास, जल प्रबंधन और आधारभूत सुविधाओं के मामले में स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
सिर्फ 8 पंचायतें ही सभी मानकों पर खरी
पंचायत विकास सूचकांक के अनुसार राजस्थान की हजारों पंचायतों में से केवल 8 पंचायतें ही सभी 9 विकास मानकों पर संतोषजनक प्रदर्शन कर सकीं। प्रदेश की 5389 पंचायतें सी श्रेणी में और 203 पंचायतें डी श्रेणी में दर्ज की गई हैं, जो ग्रामीण विकास की कमजोर स्थिति को दर्शाती हैं।
महिला अनुकूल पंचायतों में 73.5 प्रतिशत पंचायतें अभी भी “एस्पायरेंट” श्रेणी में हैं, जबकि बाल अनुकूल पंचायतों की स्थिति भी उत्साहजनक नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायतों में चुना हुआ नेतृत्व नहीं होने से योजनाओं का प्रभावी संचालन प्रभावित हो रहा है।
गांवों की प्यास, टूटी सड़कें और अधूरी योजनाएं
प्रदेश के अनेक गांव आज भी पेयजल संकट, खराब सड़कों, बेरोजगारी और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बिना चुनी हुई पंचायतों के विकास कार्यों में जवाबदेही कमजोर हो गई है। कई जगह प्रशासकों के भरोसे पंचायतें चल रही हैं, जिससे स्थानीय समस्याओं का समय पर समाधान नहीं हो पा रहा।
ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का कहना है कि गांव की सरकार चुने बिना “आत्मनिर्भर पंचायत” का सपना अधूरा है। किसानों, महिलाओं और युवाओं को उम्मीद थी कि समय पर चुनाव होंगे और गांवों को नया नेतृत्व मिलेगा, लेकिन लगातार बढ़ती देरी ने लोगों में निराशा पैदा कर दी है।
प्रधानमंत्री ने कहा था— मजबूत पंचायतें ही मजबूत भारत का आधार
24 अप्रैल को पंचायतीराज दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि “ग्राम पंचायतें मजबूत, आत्मनिर्भर और आधुनिक बनें, तभी पंचायतीराज का सपना साकार होगा।” लेकिन जमीनी हालात इस दावे के उलट दिखाई दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायत विकास सूचकांक केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की वास्तविक चुनौतियों का आईना है। पंचायतों को मजबूत करने के लिए समय पर चुनाव, पारदर्शी प्रशासन और स्थानीय भागीदारी बेहद जरूरी है।
इन पंचायतों ने पेश की मिसाल
हालांकि कुछ पंचायतों ने बेहतर कार्य कर प्रदेश में उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं।
स्वच्छता और हरियाली में फतेहपुर की हिरना पंचायत को A+ ग्रेड मिला।
गरीबी मुक्त एवं आजीविका में टोडाभीम की भीमपुर पंचायत अव्वल रही।
बाल विकास योजनाओं में खंडेला की दादिया पंचायत ने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
जल प्रबंधन में बेगूं की सुवानिया पंचायत और आधारभूत ढांचे में डूंगला की सेमालिया पंचायत को उच्च अंक मिले।
महिला सशक्तिकरण में सोजत की भैसाना पंचायत को A ग्रेड प्राप्त हुआ।
ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने की जरूरत
सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीण बुद्धिजीवियों का कहना है कि पंचायतें लोकतंत्र की पहली सीढ़ी हैं। यदि गांव की सरकार समय पर नहीं चुनी जाएगी तो विकास योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी। पंचायत चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि गांवों के विकास, जवाबदेही और सामाजिक भागीदारी का आधार हैं।
राजस्थान के ग्रामीण अब यही सवाल पूछ रहे हैं—
“जब गांवों की समस्याएं बढ़ रही हैं, तब गांव की सरकार कब चुनी जाएगी?”
