संपादकीय@Haresh Panwar
किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के सपनों, संघर्षों और विश्वास पर टिका होता है। जब वही युवा अपने भविष्य को लेकर आशंकित होकर सड़कों पर उतरने लगे, तब यह केवल एक आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि उन नागरिकों में निहित होती है जो अपने अधिकारों, अवसरों और न्याय के लिए आवाज उठाने का साहस रखते हैं। इसलिए जब देशभर के विद्यार्थी परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो उनकी आवाज को केवल विरोध के रूप में नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधार के एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। मैं यहां बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
दिल्ली का जंतर-मंतर वर्षों से लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का प्रतीक रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और जनसंगठन यहां अपनी मांगों को लेकर एकत्रित होते रहे हैं। हाल के दिनों में भी विभिन्न छात्र संगठनों द्वारा परीक्षा प्रणाली में कथित अनियमितताओं, पेपर लीक की घटनाओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन किए गए। इन आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि देश का युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा, बल्कि वह निष्पक्ष अवसर और पारदर्शी व्यवस्था की मांग कर रहा है।
दरअसल, किसी भी प्रतियोगी परीक्षा के पीछे केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होता, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीदें, वर्षों का परिश्रम और अनगिनत त्याग जुड़े होते हैं। एक विद्यार्थी दिन-रात मेहनत करता है, परिवार आर्थिक कठिनाइयों का सामना करता है और माता-पिता अपने सपनों को बच्चों के भविष्य में निवेश करते हैं। ऐसी स्थिति में यदि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं, तो उसका प्रभाव केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी पीढ़ी के विश्वास को प्रभावित करता है।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यहां असहमति को स्थान दिया गया है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। जब नागरिक सवाल पूछते हैं तो लोकतंत्र मजबूत होता है और जब सत्ता उन सवालों का जवाब देती है तो जनता का विश्वास बढ़ता है। लेकिन यदि संवाद की जगह टकराव ले ले, तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है।
इतिहास बताता है कि युवा आंदोलनों ने कई बार समाज और व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाने का काम किया है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सामाजिक न्याय, शिक्षा सुधार और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तक, युवाओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। इसलिए किसी भी छात्र आंदोलन को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना उचित नहीं होगा। युवा वर्ग की चिंताओं को समझना और उनके समाधान के लिए ठोस कदम उठाना समय की आवश्यकता है।
आज शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि सामाजिक और आर्थिक प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है। ऐसे में यदि भर्ती परीक्षाओं में विलंब, पेपर लीक, अनियमितताएं या पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं, तो उनका सीधा असर युवाओं के मनोबल पर पड़ता है। बार-बार परीक्षा रद्द होने या परिणामों में विवाद उत्पन्न होने से विद्यार्थियों का मानसिक तनाव बढ़ता है। कई बार वर्षों की तैयारी करने वाले युवाओं के सामने भविष्य को लेकर गंभीर संकट खड़ा हो जाता है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आंदोलन लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहें और सरकार भी संवाद का रास्ता अपनाए। लोकतंत्र में किसी भी समस्या का स्थायी समाधान बातचीत और विश्वास से ही निकल सकता है। यदि छात्रों की मांगों में तथ्य हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यदि व्यवस्था में कहीं कमजोरी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए। यदि किसी स्तर पर जवाबदेही तय करनी है तो वह भी पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक बहसों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। सरकार, विपक्ष, शिक्षा विशेषज्ञ, छात्र प्रतिनिधि और सामाजिक संगठन मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करें जिसमें परीक्षा की पवित्रता और भर्ती प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे। क्योंकि निष्पक्ष परीक्षा ही निष्पक्ष अवसरों का आधार बनती है और निष्पक्ष अवसर ही सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी गारंटी हैं।
राष्ट्र का भविष्य केवल बड़े-बड़े विकास कार्यों या आर्थिक आंकड़ों से सुरक्षित नहीं होता। राष्ट्र तब मजबूत होता है जब उसकी युवा पीढ़ी व्यवस्था पर भरोसा करती है। यदि युवा का विश्वास टूटता है तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी होती है। इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत युवाओं की आवाज को सुनने, उनकी आशंकाओं को समझने और शिक्षा तथा रोजगार व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल शासन करना नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं को समझना और उन्हें सम्मान देना भी है। जब युवा प्रश्न पूछते हैं तो व्यवस्था को नाराज नहीं होना चाहिए, बल्कि आत्ममंथन करना चाहिए। क्योंकि प्रश्न पूछने वाला युवा समस्या नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की संभावना होता है। और जो राष्ट्र अपने युवाओं की आवाज सुनता है, वही राष्ट्र आने वाले समय में सबसे अधिक मजबूत और समृद्ध बनता है।
भीम प्रज्ञा अलर्ट
“जीवन में सफलता पाने के लिए केवल अवसरों का इंतजार मत कीजिए, बल्कि अपने परिश्रम, धैर्य और सकारात्मक सोच से अवसरों का निर्माण करना सीखिए। क्योंकि भाग्य दरवाजा तभी खोलता है, जब कर्म दस्तक देता है।”
