संपादकीय@हरेश पंवार -26 अगस्त 2026

साँप के फन में भरा जहर शरीर को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन इंसान के मन में पल रहा ईर्ष्या, कपट, लालच और नफरत का जहर रिश्तों, विश्वास और अंततः मानवता को भीतर से खोखला कर देता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज का दौर विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुविधाओं की दृष्टि से अभूतपूर्व प्रगति का दौर है। हमारे हाथ में दुनिया की जानकारी पहुंच चुकी है, संचार के साधन पहले से कहीं अधिक तेज हो गए हैं और जीवन को सुविधाजनक बनाने वाली असंख्य चीजें हमारे आसपास मौजूद हैं। लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक गंभीर सवाल भी खड़ा है—क्या हमारी मानवीय संवेदनाएं भी उतनी ही विकसित हुई हैं? दुर्भाग्य से इसका उत्तर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है।

इसीलिए वर्तमान समय को केवल आधुनिक युग कहना पर्याप्त नहीं लगता। यह कहीं-कहीं ‘छलयुग’ का रूप लेता दिखाई देता है, जहां चेहरे पर मुस्कान और मन में स्वार्थ एक साथ पलते हैं। रिश्तों में अपनापन दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे लाभ-हानि का हिसाब चलता रहता है। मित्रता में विश्वास की जगह प्रतिस्पर्धा, सामाजिक संबंधों में सहयोग की जगह स्वार्थ और सार्वजनिक जीवन में सेवा की जगह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा कई बार हावी होती दिखाई देती है।

साँप का जहर और मनुष्य के मन का जहर—दोनों में एक बुनियादी अंतर है। साँप का विष उसके प्राकृतिक अस्तित्व का हिस्सा है। वह सामान्यतः अपने बचाव या शिकार के लिए हमला करता है। उसके व्यवहार में एक स्वाभाविक चेतावनी भी होती है। फुफकार सुनाई दे तो सामने वाला सावधान हो सकता है। लेकिन मनुष्य के भीतर का विष दिखाई नहीं देता। वह अक्सर मधुर शब्दों, विनम्र व्यवहार और झूठी आत्मीयता के पीछे छिपा रहता है।

यही कारण है कि ईर्ष्या, कपट, लालच और नफरत का विष अधिक खतरनाक है। इसका कोई बाहरी रंग नहीं होता, कोई गंध नहीं होती और कोई स्पष्ट चेतावनी भी नहीं होती। यह धीरे-धीरे रिश्तों में अविश्वास पैदा करता है। पहले दो लोगों के बीच दूरी बनती है, फिर परिवार प्रभावित होता है और अंततः इसका असर पूरे सामाजिक वातावरण पर पड़ता है।

ईर्ष्या मनुष्य को दूसरे की सफलता में प्रसन्न होने से रोकती है। वह चाहता है कि दूसरा व्यक्ति आगे न बढ़े, भले ही उसे पीछे खींचने के लिए स्वयं भी नुकसान उठाना पड़े। कपट व्यक्ति को सामने कुछ और और पीछे कुछ और बनने के लिए प्रेरित करता है। लालच आवश्यकता की सीमा समाप्त कर देता है और नफरत दूसरे मनुष्य को इंसान के रूप में देखने की क्षमता तक छीन लेती है।

आज सामाजिक जीवन में एक और चिंताजनक प्रवृत्ति दिखाई देती है—प्रतिष्ठा का प्रदर्शन और चरित्र का क्षरण। सोशल मीडिया के दौर में व्यक्ति अपने जीवन का चमकदार हिस्सा दुनिया को दिखा सकता है, लेकिन उसके मन की वास्तविक स्थिति छिपी रह सकती है। ऐसे वातावरण में दिखावा बढ़ता है और आत्ममंथन कम होता जाता है। हम दूसरों के जीवन का मूल्यांकन तो बहुत जल्दी कर लेते हैं, लेकिन अपने भीतर झांकने से बचते हैं।

विडंबना यह है कि हम बच्चों को सफल होने की शिक्षा तो देते हैं, लेकिन हमेशा अच्छा इंसान बनने की शिक्षा नहीं दे पाते। हम उन्हें प्रतियोगिता में आगे निकलने के लिए प्रेरित करते हैं, पर यह नहीं बताते कि किसी दूसरे को गिराकर मिली सफलता वास्तव में कितनी खोखली होती है। हम उन्हें धन कमाने का महत्व समझाते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि धन से सुविधाएं खरीदी जा सकती हैं, विश्वास और सम्मान नहीं।

मन का यह विष केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब ईर्ष्या और नफरत सामूहिक रूप लेती है तो समाज में विभाजन पैदा होता है। जब लालच व्यवस्था में प्रवेश करता है तो भ्रष्टाचार जन्म लेता है। जब कपट सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनता है तो विश्वास का संकट पैदा होता है। और जब नफरत सामान्य व्यवहार बन जाती है तो संवेदनशीलता धीरे-धीरे मरने लगती है।

इसलिए आज आवश्यकता किसी बाहरी शत्रु से लड़ने से पहले अपने भीतर के विष को पहचानने की है। हमें यह पूछना होगा कि क्या हम किसी की सफलता से सचमुच खुश होते हैं? क्या हम सामने और पीछे एक जैसा व्यवहार करते हैं? क्या हमारी इच्छाओं की कोई सीमा है? क्या हम मतभेद के बावजूद दूसरे व्यक्ति का सम्मान कर सकते हैं?

मनुष्य होने की सबसे बड़ी पहचान उसकी बुद्धि या संपत्ति नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता और विवेक है। यदि हमारे पास ज्ञान है लेकिन करुणा नहीं, संपत्ति है लेकिन संतोष नहीं, पद है लेकिन विनम्रता नहीं और संबंध हैं लेकिन विश्वास नहीं, तो हमारी प्रगति अधूरी है।

साँप के जहर का उपचार चिकित्सा विज्ञान खोज चुका है। लेकिन मनुष्य के मन में पैदा होने वाले जहर का उपचार किसी अस्पताल में नहीं मिलता। उसका उपचार संस्कार, आत्मचिंतन, प्रेम, क्षमा, संतोष और मानवीय संवेदनाओं में छिपा है।

आज आवश्यकता है कि हम दूसरों के भीतर ‘आस्तीन का साँप’ तलाशने से पहले अपने मन को देखें। कहीं हमारे भीतर ही ईर्ष्या, अहंकार, लालच या नफरत का कोई विष तो नहीं पल रहा? क्योंकि समाज को जहरीला बनाने वाला प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी अपने भीतर से ही उस विष को जन्म देता है।

साँप का विष एक जीवन समाप्त कर सकता है, लेकिन मनुष्य के मन का विष पीढ़ियों के बीच विश्वास समाप्त कर सकता है। इसलिए असली लड़ाई साँपों से नहीं, मनुष्य के भीतर पल रहे विष से है। और इस लड़ाई की शुरुआत किसी और से नहीं, स्वयं से करनी होगी।


भीम प्रज्ञा अलर्ट

“समय इंसान की परिस्थितियां बदल सकता है, लेकिन इंसान का चरित्र ही तय करता है कि बदली हुई परिस्थितियों में वह कितना ऊंचा उठेगा।”