भीम प्रज्ञा विशेष रिपोर्ट
राजस्थान में आगामी नगर निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। वार्डों के आरक्षण, अध्यक्ष एवं सभापति पदों के आरक्षण और चुनावी समीकरणों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। इसी बीच एक ऐसी भ्रांति तेजी से सामने आ रही है, जिसका कानूनी रूप से स्पष्ट होना जरूरी है। कई जगह यह कहा जा रहा है कि यदि किसी नगर पालिका में अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या पिछड़ा वर्ग (BC/OBC) के लिए आरक्षित है, तो केवल उसी आरक्षित वर्ग के लिए आरक्षित वार्ड से जीतकर आया पार्षद ही अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ सकता है।
यह धारणा कानून की सही व्याख्या नहीं है।
कानून का मूल सिद्धांत स्पष्ट है—वार्ड का आरक्षण और निकाय के अध्यक्ष पद का आरक्षण दो अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। किसी व्यक्ति की अध्यक्ष पद के लिए पात्रता इस बात से तय होती है कि वह उस आरक्षित वर्ग का सदस्य है या नहीं और वह नगर पालिका का निर्वाचित सदस्य है या नहीं; केवल इस आधार पर उसे अयोग्य नहीं किया जा सकता कि वह किसी सामान्य/ओपन वार्ड से निर्वाचित हुआ है।
ओपन वार्ड का अर्थ सामान्य जाति का वार्ड नहीं
सबसे पहले एक बुनियादी भ्रांति दूर करना जरूरी है। General अथवा Open Ward का अर्थ "सिर्फ सामान्य वर्ग के लोगों के लिए वार्ड" नहीं है। ओपन वार्ड का अर्थ है कि उस वार्ड की सीट किसी विशेष SC, ST या BC वर्ग के लिए आरक्षित नहीं है। ऐसे वार्ड में, यदि अन्य कानूनी योग्यताएं पूरी होती हैं, तो विभिन्न वर्गों के व्यक्ति चुनाव लड़ सकते हैं। अर्थात यदि कोई SC व्यक्ति किसी Open Ward से चुनाव लड़ता है और निर्वाचित होकर पार्षद बन जाता है, तो वह अपनी जातिगत पहचान नहीं खो देता। वह SC वर्ग का निर्वाचित पार्षद ही रहता है। इसी प्रकार किसी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति का Open Ward से निर्वाचित होना उस व्यक्ति को अध्यक्ष पद के लिए उसके वर्ग से संबंधित आरक्षण का लाभ लेने से स्वतः वंचित नहीं करता।
राजस्थान के नियम में स्थिति बिल्कुल स्पष्ट
राजस्थान नगरपालिका निर्वाचन नियम, 1994 में 2019 के संशोधन द्वारा Rule 78 को प्रतिस्थापित किया गया। इसके अनुसार नगर पालिका के Chairperson/अध्यक्ष का चुनाव नगर पालिका के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। Rule 78(3) स्पष्ट करता है कि निर्वाचित सदस्य Chairperson चुने जाने के लिए पात्र है, बशर्ते अन्य कानूनी योग्यताएं और अयोग्यताएं लागू न हों।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात Rule 78(5)(a) में आती है।
यदि Chairperson का पद SC, ST अथवा Backward Classes के लिए आरक्षित है तो उम्मीदवार का संबंधित SC/ST/Backward Class का सदस्य होना आवश्यक है। वहीं महिला के लिए आरक्षित पद पर महिला होना और आरक्षित वर्ग की महिला के लिए आरक्षित पद पर संबंधित वर्ग का सदस्य होने के साथ महिला होना आवश्यक है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रावधान में यह नहीं कहा गया कि— "आरक्षित अध्यक्ष पद का उम्मीदवार उसी आरक्षित वर्ग के लिए आरक्षित वार्ड से ही निर्वाचित होना चाहिए।" यही इस पूरे विवाद का निर्णायक बिंदु है। ---
चार आरक्षित वार्ड और ग्यारह ओपन वार्ड—कौन अध्यक्ष बन सकता है? इसे एक काल्पनिक उदाहरण से समझते हैं।
मान लीजिए किसी नगर पालिका में कुल 20 वार्ड हैं। -
4 वार्ड SC के लिए आरक्षित हैं। - 6 वार्ड ओबीसी के लिए तथा - 11 वार्ड Open/Unreserved हैं। - नगर पालिका का अध्यक्ष पद SC के लिए आरक्षित है। अब चार SC आरक्षित वार्डों से SC वर्ग के चार व्यक्ति पार्षद निर्वाचित होते हैं। साथ ही 11 Open Ward में से किसी एक वार्ड से SC वर्ग का कोई व्यक्ति भी चुनाव लड़ता है और पार्षद निर्वाचित हो जाता है। अब क्या वह व्यक्ति अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं लड़ सकता? उत्तर है—केवल इस कारण से उसे अयोग्य नहीं कहा जा सकता। वह निर्वाचित सदस्य है और SC वर्ग का सदस्य है। Rule 78(5)(a) की कसौटी संबंधित वर्ग की सदस्यता है; वार्ड का आरक्षण वहां अतिरिक्त पात्रता के रूप में निर्धारित नहीं किया गया है। इसलिए इस उदाहरण में अध्यक्ष पद के लिए केवल चार आरक्षित वार्डों से निर्वाचित SC सदस्यों को ही पात्र मानना कानून की संकीर्ण और गलत व्याख्या होगी।
--- सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक मुहर इस विषय पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है—
Bihari Lal Rada v. Anil Jain (Tinu) & Others, (2009) यह मामला हरियाणा की नगरपालिका से संबंधित था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने जिस संवैधानिक सिद्धांत की व्याख्या की, वह स्थानीय निकायों में आरक्षण की प्रकृति समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मामले में एक नगर परिषद के अध्यक्ष पद को General Category के लिए रखा गया था। अपीलकर्ता एक Backward Class आरक्षित वार्ड से निर्वाचित हुआ था। सवाल उठा कि क्या आरक्षित वार्ड से निर्वाचित व्यक्ति General Category के लिए निर्धारित अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अध्यक्ष पद किसी विशेष आरक्षित वर्ग के लिए आरक्षित नहीं है, तो सभी निर्वाचित सदस्य—चाहे वे Reserved Ward से आए हों या General Ward से—पात्र हो सकते हैं। इसी निर्णय में न्यायालय ने उलटा सिद्धांत भी स्पष्ट किया कि यदि अध्यक्ष पद SC/ST/Backward Class के लिए आरक्षित है तो उस वर्ग का सदस्य होना पर्याप्त है; यह जरूरी नहीं कि वह उसी आरक्षित वार्ड से निर्वाचित हुआ हो।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निष्कर्ष में साफ कहा कि जब नगरपालिका अध्यक्ष का पद SC, ST या Backward Class के सदस्य द्वारा भरा जाना हो, तो व्यक्ति का उस वर्ग से संबंधित होना पर्याप्त है, चाहे वह General Ward से निर्वाचित हुआ हो या Reserved Ward से। यह आपके द्वारा उठाए गए प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक आधार है। सुप्रीम कोर्ट ने "General Category" की भी परिभाषा समझाई Bihari Lal Rada मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक और महत्वपूर्ण बात कही—नगरपालिका के संदर्भ में "General Category" को कोई अलग जातिगत वर्ग समझना सही नहीं है। अर्थात Open/General सीट का मतलब किसी विशेष जाति के लिए आरक्षित सीट नहीं, बल्कि ऐसी सीट है जिस पर अन्यथा पात्र विभिन्न वर्गों के उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं। इसका सीधा अर्थ है—
Open Ward ≠ General Caste Ward और Reserved Ward ≠ उस वर्ग के व्यक्ति का एकमात्र राजनीतिक रास्ता। संविधान भी यही रास्ता दिखाता है भारतीय संविधान का Article 243T नगरपालिकाओं में SC और ST के लिए सीटों तथा Chairpersons के पदों के आरक्षण की व्यवस्था करता है और राज्य विधानमंडल को कानून द्वारा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने Bihari Lal Rada मामले में Article 243T की इसी संवैधानिक संरचना का विस्तृत विश्लेषण किया। आरक्षण का उद्देश्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, न कि आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को Open Seat से चुनाव लड़ने से रोकना। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी संदर्भ में माना कि आरक्षण का उद्देश्य न्यूनतम प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है; इसका अर्थ यह नहीं कि आरक्षित वर्ग के व्यक्ति Open Seat से निर्वाचित होने पर अयोग्य या अलग श्रेणी के सदस्य हो जाते हैं।
एक और महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत:
V.V. Giri मामला सर्वोच्च न्यायालय का पुराना लेकिन महत्वपूर्ण निर्णय V.V. Giri v. Dippala Suri Dora भी इस सिद्धांत की पृष्ठभूमि समझने में उपयोगी है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को सामान्य/Open अवसर से स्वतः बाहर नहीं किया जा सकता। आरक्षण एक अतिरिक्त संवैधानिक अवसर है; इसका अर्थ यह नहीं कि संबंधित वर्ग के नागरिक सामान्य अवसरों में भाग लेने के अधिकार से वंचित हो जाएं। बाद में Bihari Lal Rada मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी प्रकार के संवैधानिक तर्क का उपयोग करते हुए नगरपालिका अध्यक्ष पद की पात्रता को स्पष्ट किया। राजस्थान में चुनाव की प्रक्रिया भी इस बात को मजबूत करती है 2019 के संशोधित Rule 78 के अनुसार Chairperson का चुनाव नगरपालिका के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया जाता है। अर्थात पहले वार्डों का चुनाव होता है, फिर निर्वाचित सदस्यों में से Chairperson के चुनाव की प्रक्रिया होती है। नियमों में Chairperson पद के लिए अलग नामांकन प्रक्रिया भी निर्धारित है। संशोधित Rule 78 में Chairperson के नामांकन में निर्वाचित सदस्य का proposer होना तथा आरक्षित पद की स्थिति में संबंधित जाति/वर्ग से संबंधित घोषणा एवं प्रमाण-पत्र की व्यवस्था की गई है। यह भी महत्वपूर्ण है कि नियम में उम्मीदवार की जाति/वर्ग संबंधी घोषणा इसलिए मांगी जाती है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि आरक्षित Chairperson पद के लिए वह संबंधित वर्ग का सदस्य है या नहीं। कहीं यह अतिरिक्त शर्त नहीं रखी गई कि वह उसी आरक्षित वार्ड से निर्वाचित हुआ हो।
--- कानून को एक सरल सूत्र में समझिए
नगर निकाय चुनाव की इस पूरी व्यवस्था को पाठक केवल चार शब्दों में याद रख सकते हैं— "वार्ड का आरक्षण अलग, प्रमुख पद का आरक्षण अलग।" वार्ड का आरक्षण यह निर्धारित करता है कि उस वार्ड की सीट किस वर्ग के लिए आरक्षित है। वहीं अध्यक्ष/सभापति पद का आरक्षण यह निर्धारित करता है कि निर्वाचित सदस्यों में से कौन उस पद के लिए पात्र है। इसलिए यदि अध्यक्ष पद SC के लिए आरक्षित है तो मूल प्रश्न होगा— क्या उम्मीदवार SC है? और क्या वह नगर पालिका का निर्वाचित सदस्य है तथा अन्य कानूनी योग्यताएं पूरी करता है? सिर्फ यह प्रश्न कि— "वह किस वार्ड से जीता है?" —अपने आप में उसे आरक्षित अध्यक्ष पद से बाहर करने का आधार नहीं है। महिला आरक्षण में भी यही सिद्धांत यदि Chairperson का पद SC महिला के लिए आरक्षित है तो उम्मीदवार का SC वर्ग से होना और महिला होना दोनों आवश्यक हैं। यदि पद केवल महिला के लिए आरक्षित है तो निर्वाचित महिला सदस्य पात्रता की शर्त पूरी कर सकती है। लेकिन यहां भी केवल इसलिए किसी महिला को अयोग्य नहीं कहा जा सकता कि उसने किसी "महिला आरक्षित वार्ड" के बजाय Open Ward से चुनाव जीता है—
जब तक संबंधित अधिनियम, नियम या उस चुनाव की वैध अधिसूचना कोई विशेष विपरीत शर्त न निर्धारित करती हो। राजस्थान के Rule 78(5)(b) और (c) में महिला तथा आरक्षित वर्ग की महिला के लिए आवश्यक पात्रता स्पष्ट की गई है। भ्रम से बचें, अधिसूचना जरूर देखें हालांकि कानूनी सिद्धांत स्पष्ट है, प्रत्येक नगर पालिका के वास्तविक चुनाव में उस निकाय के लिए जारी आरक्षण अधिसूचना, चुनाव कार्यक्रम और State Election Commission के निर्देश देखना आवश्यक है। क्योंकि किसी विशेष नगर पालिका में Chairperson का पद किस वर्ग के लिए आरक्षित है, यह संबंधित वैधानिक अधिसूचना से निर्धारित होगा। लेकिन एक बार यदि यह निर्धारित हो गया कि— "इस नगर पालिका का Chairperson पद SC के लिए आरक्षित है" तो केवल यह तर्क कि—
"SC उम्मीदवार General/Open Ward से जीता है, इसलिए वह अध्यक्ष नहीं बन सकता"
राजस्थान के वर्तमान Rule 78(5)(a) की भाषा से समर्थित नहीं दिखाई देता। चुनावी चर्चा में तथ्य बनाम भ्रांति नगर निकाय चुनाव लोकतंत्र की सबसे निचली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी है। इसलिए चुनावी कानून की व्याख्या जातिगत धारणाओं या राजनीतिक चर्चाओं के आधार पर नहीं, बल्कि संविधान, अधिनियम, नियम और न्यायालयों के निर्णयों के आधार पर होनी चाहिए। यदि अध्यक्ष पद SC के लिए आरक्षित है और कोई SC व्यक्ति Open/Unreserved Ward से चुनाव जीतकर नगर पालिका का निर्वाचित सदस्य बनता है, तो मात्र उसके Open Ward से जीतने के आधार पर उसे SC आरक्षित अध्यक्ष पद के चुनाव से बाहर नहीं किया जा सकता। इसी तरह— चार SC आरक्षित वार्ड हैं, इसलिए केवल उन्हीं चार वार्डों से जीतने वाले SC पार्षद ही अध्यक्ष बन सकते हैं—यह निष्कर्ष सही नहीं है। यदि 11 Open Wards में से कोई SC व्यक्ति निर्वाचित होकर आता है और अन्य सभी वैधानिक योग्यताएं पूरी करता है, तो उसकी पात्रता को केवल वार्ड की "Open" स्थिति के आधार पर नकारना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र का संदेश स्पष्ट है—आरक्षण प्रतिनिधित्व का अधिकार देता है, लेकिन Open Seat आरक्षित वर्ग के नागरिकों के लिए बंद दरवाजा नहीं है। इसीलिए आगामी राजस्थान नगर निकाय चुनाव में मतदाताओं, प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे "आरक्षित वार्ड" और "आरक्षित निकाय प्रमुख पद" को एक ही चीज मानने की भूल न करें। कानून का सार यही है—वार्ड से जीतने की पात्रता और निकाय प्रमुख बनने की पात्रता की कसौटियां अलग हैं।
विशेष कानूनी आधार:
भारतीय संविधान का Article 243T; राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009; राजस्थान नगरपालिका निर्वाचन नियम, 1994 का संशोधित Rule 78; Bihari Lal Rada v. Anil Jain (Tinu) & Ors., Supreme Court, 13 February 2009; तथा V.V. Giri v. Dippala Suri Dora & Ors., Supreme Court. संपादकीय सावधानी: यह आलेख सामान्य कानूनी जानकारी एवं जन-जागरूकता के उद्देश्य से है। किसी विशिष्ट नगर निकाय में नामांकन/पात्रता पर अंतिम निर्णय के लिए उस निकाय की संबंधित आरक्षण अधिसूचना, निर्वाचन अधिसूचना और सक्षम निर्वाचन अधिकारी के आदेश को भी साथ में देखना आवश्यक होगा।


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