संपादकीय@ हरेश पंवार @23 अगस्तत 2026

एक बुजुर्ग से किसी युवक ने पूछा—“आज के समय में सबसे बड़ी ताकत क्या है—धन, पद, प्रसिद्धि या प्रभाव?” बुजुर्ग ने कुछ क्षण मौन रहने के बाद कहा—“इन सबकी अपनी कीमत है, लेकिन इनसे भी बड़ी ताकत यह समझना है कि कहां बोलना है, कहां रुकना है और कहां किसी दूसरे की सीमा का सम्मान करना है।” युवक ने पूछा—“क्या सीमा में रहना कमजोरी नहीं?” बुजुर्ग मुस्कुराए और बोले—“नहीं, सीमा पहचानना ही असली ताकत है। नदी जब अपने किनारों की मर्यादा में बहती है तो जीवन देती है, लेकिन जब किनारे तोड़ देती है तो वही नदी विनाश का कारण बन जाती है।” यह छोटा-सा प्रसंग आज के बदलते सामाजिक परिवेश में मर्यादा के महत्व को समझने के लिए पर्याप्त है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज मनुष्य चर्चित होना चाहता है। किसी भी तरह उसकी पहचान बने, लोग उसके बारे में बात करें, सोशल मीडिया पर उसका नाम दिखाई दे और समाज में उसकी चर्चा हो—यह चाहत लगातार बढ़ती जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि चर्चा किस कीमत पर? क्या किसी की भावनाओं को चोट पहुंचाकर, किसी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप करके, मर्यादा की सीमा तोड़कर या विवाद पैदा करके मिली प्रसिद्धि वास्तव में उपलब्धि कही जा सकती है? निश्चित रूप से नहीं। कुछ समय की चर्चा व्यक्ति को प्रसिद्ध तो बना सकती है, लेकिन दिलों में स्थायी जगह केवल वही व्यक्ति बना पाता है, जो अपने आचरण में संयम, व्यवहार में विनम्रता और संबंधों में मर्यादा बनाए रखता है।

मर्यादा केवल कोई लिखित नियम नहीं है। यह मनुष्य के भीतर मौजूद वह अदृश्य अनुशासन है, जो उसे यह बताता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। किसी के सामने क्या कहना है, किस बात पर मौन रहना है, किसके निजी जीवन में कितना हस्तक्षेप करना है, असहमति के समय भाषा की सीमा कितनी होनी चाहिए और अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान कैसे करना है—इन सबका विवेक ही मर्यादा है।

रिश्तों की दुनिया में मर्यादा का महत्व और भी बढ़ जाता है। प्रेम का अर्थ सामने वाले पर अधिकार जमाना नहीं है। मित्रता का अर्थ यह नहीं कि मित्र की निजी जिंदगी में बिना अनुमति प्रवेश कर लिया जाए। परिवार का रिश्ता यह अधिकार नहीं देता कि हम हर निर्णय दूसरे पर थोप दें। अपनापन अपनी जगह है, लेकिन हर व्यक्ति को अपने विचार, अपनी पसंद और अपने निजी जीवन के लिए कुछ स्थान चाहिए। जब प्रेम के नाम पर सीमाएं टूटने लगती हैं, तो वही प्रेम धीरे-धीरे घुटन में बदल जाता है और अपनापन अधिकार के बोझ जैसा महसूस होने लगता है।

आज सोशल मीडिया ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। किसी की निजी तस्वीर सार्वजनिक कर देना, निजी बातचीत को बिना अनुमति साझा करना, किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी पर सार्वजनिक टिप्पणी करना, लगातार संदेश भेजकर जवाब देने के लिए दबाव बनाना या किसी की असहमति को उसकी कमजोरी समझना—ये सब व्यवहार आधुनिक जीवन में मर्यादा की सीमाओं के उल्लंघन के उदाहरण हैं। तकनीक ने हमें संवाद का अधिकार दिया है, लेकिन किसी के निजी जीवन में अनधिकृत प्रवेश का अधिकार नहीं दिया।

भारतीय संस्कृति में मर्यादा का विचार अत्यंत गहरा रहा है। भगवान श्रीराम को ही ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है। इसका मूल संदेश यही है कि शक्ति, सामर्थ्य और अधिकार होने के बावजूद उनका उपयोग संयम और कर्तव्य की सीमाओं में रहकर किया जाए। इसी संदर्भ में ‘लक्ष्मण रेखा’ आज हमारी भाषा में मर्यादा और सीमा का प्रतीक बन चुकी है। हालांकि यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि लोकप्रिय रूप में प्रचलित लक्ष्मण रेखा का वर्णन वाल्मीकि रामायण के सीताहरण प्रसंग में नहीं मिलता; यह प्रसंग बाद की रामकथा परंपराओं में अधिक प्रसिद्ध हुआ। लेकिन लोकमानस में इसका प्रतीकात्मक अर्थ आज भी अत्यंत प्रभावशाली है—हर व्यक्ति और हर संबंध की एक सीमा होती है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।

मर्यादा का अर्थ डरना नहीं है। मर्यादा का अर्थ अपनी स्वतंत्रता का विवेकपूर्ण उपयोग करना है। जिस व्यक्ति को अपनी बात मनवाने के लिए अपमानजनक भाषा का सहारा लेना पड़े, उसकी बात की शक्ति कमजोर है। जो व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए दूसरों को नीचा दिखाता है, वह वास्तव में अपनी ही असुरक्षा उजागर करता है। वास्तविक ऊंचाई वह नहीं जिसमें व्यक्ति दूसरों को छोटा कर स्वयं को बड़ा साबित करे, बल्कि वह है जिसमें व्यक्ति स्वयं आगे बढ़ते हुए दूसरों के सम्मान को भी सुरक्षित रखे।

राजनीति में मर्यादा हो तो लोकतंत्र मजबूत होता है। पत्रकारिता में मर्यादा हो तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विश्वसनीय बनती है। प्रशासन में मर्यादा हो तो अधिकार सेवा का माध्यम बनते हैं। न्याय व्यवस्था में मर्यादा हो तो संस्थाओं के प्रति विश्वास बढ़ता है। सामाजिक जीवन में मर्यादा हो तो मतभेद दुश्मनी में नहीं बदलते। इसलिए मर्यादा केवल व्यक्तिगत चरित्र का विषय नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी आवश्यकता है।

रिश्तों में छोटी-छोटी बातों से बड़ी दूरियां पैदा होती हैं। कई बार समस्या शब्दों से अधिक उस तरीके में होती है, जिस तरीके से शब्द कहे जाते हैं। सच बोलना आवश्यक है, लेकिन सच के नाम पर किसी का अपमान करना आवश्यक नहीं। असहमति रखना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन असहमति के नाम पर व्यक्ति की गरिमा को चोट पहुंचाना उचित नहीं। आलोचना हो सकती है, लेकिन आलोचना और अपमान के बीच की सीमा समझना भी जरूरी है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को केवल सफलता की दौड़ में आगे निकलने की शिक्षा न दें, बल्कि उन्हें यह भी सिखाएं कि सफलता के रास्ते में किसी की गरिमा न कुचली जाए। उन्हें यह समझना होगा कि हर जीत सम्मानजनक नहीं होती और हर हार अपमानजनक नहीं होती। कभी-कभी मर्यादा बचाने के लिए पीछे हटना ही सबसे बड़ी जीत होती है।

दुनिया में डर से मिला सम्मान परिस्थितियां बदलते ही समाप्त हो जाता है। स्वार्थ से मिला साथ स्वार्थ खत्म होते ही टूट जाता है। धन से खरीदी गई प्रतिष्ठा धन समाप्त होते ही कमजोर पड़ सकती है। लेकिन अच्छे व्यवहार, संयम और मर्यादा से कमाया गया सम्मान लंबे समय तक कायम रहता है।

इसलिए जीवन में हर कदम पर यह प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए—“क्या मैं जो कर रहा हूं, उससे केवल मेरी इच्छा पूरी हो रही है या किसी दूसरे की गरिमा भी सुरक्षित रह रही है?” यदि इस प्रश्न का उत्तर ईमानदारी से खोज लिया जाए तो जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं मिल सकता है।

मर्यादा कोई दीवार नहीं, बल्कि वह सीमा है जो रिश्तों को सुरक्षित रखती है। यह स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता को सभ्य और सार्थक बनाने वाली शक्ति है। इसलिए मर्यादा लांघकर कुछ समय के लिए चर्चित हो जाना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। वास्तविक उपलब्धि तो तब है, जब व्यक्ति अपनी मर्यादा में रहते हुए लोगों के दिल में ऐसी जगह बना ले, जहां उसके जाने के बाद भी उसके संस्कारों की खुशबू बनी रहे।

क्योंकि चर्चा समय के साथ खत्म हो जाती है, लेकिन मर्यादा से कमाया सम्मान पीढ़ियों तक याद रहता है।


*भीम प्रज्ञा अलर्ट*

“परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुसार नहीं बदलतीं, लेकिन परिस्थितियों के बीच हमारा दृष्टिकोण और निर्णय अवश्य हमारे हाथ में होते हैं। इसलिए हर कठिन समय को शिकायत का कारण नहीं, बल्कि स्वयं को मजबूत और बेहतर बनाने का अवसर समझिए।”