संपादकीय@ हरेश पंवार _10 सितंबर 2026

लोकतंत्र केवल शासन व्यवस्था का नाम नहीं है, यह नागरिक और सत्ता के बीच विश्वास का वह सेतु है, जिस पर देश की पूरी राजनीतिक व्यवस्था टिकी होती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में चुनाव उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पर्व हैं, जिसमें सामान्य नागरिक भी सत्ता के निर्माण में अपनी भूमिका निभाता है। पांच वर्ष बाद आने वाला चुनाव केवल प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला नहीं करता, बल्कि यह तय करता है कि आने वाले वर्षों में हमारे गांव, शहर, वार्ड, पंचायत, विधानसभा और देश की दिशा क्या होगी। इसलिए चुनाव को केवल जीत-हार की प्रतिस्पर्धा मानना लोकतंत्र के व्यापक अर्थ को छोटा कर देना है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

चुनावी मौसम आते ही वातावरण में एक अलग तरह की ऊर्जा दिखाई देती है। कहीं बैठकों का दौर चलता है, कहीं जनसंपर्क अभियान गति पकड़ता है, कहीं कार्यकर्ताओं की टोलियां मतदाताओं के बीच पहुंचती हैं तो कहीं प्रत्याशी अपने विचार, वादे और विकास की योजनाएं लेकर जनता के सामने आते हैं। राजनीतिक आकांक्षा रखना कोई अपराध नहीं है। हर नागरिक को चुनाव लड़ने, अपना विचार रखने और लोकतांत्रिक तरीके से जनता का विश्वास प्राप्त करने का अधिकार है। कोई व्यक्ति वर्षों से किसी राजनीतिक संगठन में काम करता है, टिकट की उम्मीद करता है और टिकट न मिलने पर स्वतंत्र रूप से मैदान में उतरता है तो यह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन अधिकारों के साथ कर्तव्य जुड़े होते हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार प्रत्याशी को लोकतांत्रिक मर्यादा से मुक्त नहीं करता।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि चुनाव कौन जीतेगा, बल्कि यह है कि चुनाव किस वातावरण में होगा। क्या मतदाता बिना किसी भय, दबाव और प्रलोभन के अपने विवेक से मतदान करेगा? क्या प्रत्याशी अपने विचार और योजनाओं के आधार पर जनता का समर्थन मांगेगा? क्या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा विचारों की होगी या व्यक्तिगत शक्ति प्रदर्शन की? लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा इन्हीं सवालों से होती है।

निर्वाचन आयोग की आदर्श आचार संहिता भी राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों से यही अपेक्षा करती है कि वे मतदाताओं को रिश्वत देने, डराने-धमकाने अथवा किसी प्रकार से प्रभावित करने जैसी गतिविधियों से दूर रहें। आयोग शराब बांटने और परोसने पर भी चुनावी अवधि में विशेष प्रतिबंधों का उल्लेख करता है। इतना ही नहीं, किसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान के लिए शराब, नशीले पदार्थ या भोजन का प्रस्ताव स्वीकार करना भी रिश्वत की श्रेणी में आ सकता है।

दुर्भाग्य से चुनावी प्रतिस्पर्धा में कई बार शक्ति प्रदर्शन, दबंगई, धनबल और बाहुबल जैसी प्रवृत्तियां प्रवेश करने लगती हैं। कुछ लोग यह समझने लगते हैं कि अधिक भीड़, अधिक वाहन, अधिक शोर और अधिक खर्च ही चुनावी ताकत का प्रमाण है। जबकि लोकतंत्र में वास्तविक शक्ति न तो भीड़ में है, न शोर में और न ही धन के प्रदर्शन में। वास्तविक शक्ति मतदाता के विवेक और प्रत्याशी के चरित्र में है। जिस प्रत्याशी को अपने काम, विचार और जनविश्वास पर भरोसा है, उसे मतदाता के निर्णय का सम्मान करने में संकोच नहीं होना चाहिए।

मतदाता भी इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया का केवल दर्शक नहीं है। वह इस पूरे पर्व का सबसे महत्वपूर्ण सहभागी है। उसका एक वोट किसी व्यक्ति को पांच वर्षों के लिए सार्वजनिक जिम्मेदारी सौंप सकता है। इसलिए वोट किसी एहसान का बदला नहीं, किसी डर का परिणाम नहीं और किसी क्षणिक प्रलोभन की कीमत नहीं होना चाहिए। एक बोतल, एक दावत, कुछ रुपये या किसी व्यक्ति का दबाव पांच वर्ष के विकास, सड़क, पानी, सफाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक सुविधाओं का विकल्प नहीं हो सकता।

यहां प्रत्याशियों से भी एक गंभीर अपेक्षा है। मतदाता को अपने पक्ष में समझाइए, लेकिन उसकी स्वतंत्रता मत छीनिए। अपने वादे बताइए, लेकिन झूठे सपने मत बेचिए। अपने इरादे बताइए, लेकिन विरोधी को अपमानित करके अपनी श्रेष्ठता साबित करने की कोशिश मत कीजिए। चुनाव में प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए, शत्रुता नहीं। मतभेद होने चाहिए, मनभेद नहीं। जीतने के बाद भी वही समाज साथ रहना है, जिसके बीच चुनाव के समय हम अपने समर्थक और विरोधी खड़े करते हैं।

विशेष रूप से स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में इस बात का महत्व और बढ़ जाता है। यहां प्रत्याशी और मतदाता एक-दूसरे से सीधे जुड़े होते हैं। चुनाव समाप्त होने के बाद भी उन्हें उसी मोहल्ले, उसी गांव और उसी शहर में एक-दूसरे के साथ रहना है। इसलिए चुनावी कटुता इतनी गहरी नहीं होनी चाहिए कि परिणाम आने के बाद सामाजिक रिश्ते टूट जाएं। चुनाव पांच वर्ष की जिम्मेदारी चुनने का माध्यम है, पांच पीढ़ियों की दुश्मनी पैदा करने का नहीं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव को उत्सव की तरह मनाया जाए, लेकिन उत्सव की मर्यादा भी कायम रखी जाए। लोकतंत्र का पर्व ढोल-नगाड़ों, जुलूसों और नारों से जरूर जीवंत हो सकता है, लेकिन उसकी आत्मा शांतिपूर्ण मतदान और स्वतंत्र मताधिकार में है। मतदाता का उत्साह तभी सार्थक है जब उसके पीछे जागरूकता हो और प्रत्याशी की सक्रियता तभी सार्थक है जब उसके पीछे जनसेवा की भावना हो।

चुनाव में हारने वाला व्यक्ति लोकतंत्र में पराजित नागरिक नहीं होता और जीतने वाला व्यक्ति जनता का मालिक नहीं बन जाता। जीतने वाले को जिम्मेदारी मिलती है और हारने वाले को जनादेश स्वीकार कर लोकतांत्रिक भूमिका निभाने का अवसर मिलता है। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। मतदाता के निर्णय को सम्मान देना लोकतांत्रिक संस्कार का सबसे बड़ा प्रमाण है।

यदि कहीं मतदाताओं को रिश्वत, शराब, मुफ्त उपहार या धमकी के माध्यम से प्रभावित करने का प्रयास हो तो नागरिकों के पास चुनावी शिकायत दर्ज कराने के साधन भी उपलब्ध हैं। निर्वाचन आयोग का cVIGIL प्लेटफॉर्म रिश्वत, मुफ्त उपहार और शराब वितरण जैसी आदर्श आचार संहिता की शिकायतों को दर्ज करने के लिए नागरिकों को सुविधा देता है।

अब समय है कि हम चुनाव को केवल उम्मीदवारों का उत्सव नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों का पर्व बनाएं। प्रत्याशी विचार लेकर आए, मतदाता विवेक लेकर मतदान करे; प्रत्याशी विकास का रोडमैप रखे और मतदाता उसके पिछले काम तथा भविष्य की क्षमता को परखे। न दबाव हो, न प्रलोभन; न दादागिरी हो, न दुश्मनी—बस विचारों की प्रतिस्पर्धा हो और जनविश्वास का निर्णय हो।

क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में नहीं कि कौन सबसे अधिक शोर कर सकता है, बल्कि इस बात में है कि कौन जनता का विश्वास जीत सकता है और जनता कितनी स्वतंत्रता, समझदारी और जिम्मेदारी से अपना प्रतिनिधि चुन सकती है।

आइए, इस चुनावी पर्व को उत्साह से मनाएं, लेकिन उसकी पवित्रता भी बचाएं। मतदान करें, अवश्य करें, निर्भय होकर करें और अपने विवेक से करें। क्योंकि एक जागरूक मतदाता केवल अपना प्रतिनिधि नहीं चुनता, वह अपने शहर, गांव और आने वाली पीढ़ियों की दिशा भी तय करता है।