संपादकीय@ हरेश पंवार- 11 सितंबर 2026
जीवन की राह कभी भी पूरी तरह सपाट नहीं होती। कहीं रास्ता कठिन होता है, कहीं परिस्थितियां प्रतिकूल होती हैं और कहीं मंजिल सामने दिखाई देने के बावजूद कदम डगमगाने लगते हैं। लेकिन इतिहास बार-बार यही प्रमाणित करता है कि कठिन परिस्थितियां इंसान की क्षमता का अंत नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक परीक्षा होती हैं। जिस व्यक्ति के इरादे मजबूत हों, जिसके भीतर आत्मविश्वास जीवित हो और जिसके हौसले परिस्थितियों के सामने झुकना न जानते हों, उसके लिए बाधाएं रास्ता रोकने वाली दीवार नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की सीढ़ियां बन जाती हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज जब चुनावी रण अपने चरम पर है, यह बात केवल जीवन के संघर्षों पर लागू नहीं होती, बल्कि चुनाव मैदान में उतरे प्रत्येक प्रत्याशी और उसके समर्थक के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। चुनाव लड़ना स्वयं में साहस का काम है। कोई व्यक्ति अपना समय, श्रम, संसाधन और प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर जनता के बीच जाता है तो उसके भीतर जीत की आकांक्षा होना स्वाभाविक है। हर प्रत्याशी चाहता है कि मतदाता उसके पक्ष में मतदान करे, उसकी मेहनत रंग लाए और परिणाम उसके पक्ष में आए। लेकिन चुनाव का मैदान केवल जीत का मैदान नहीं, बल्कि धैर्य, संयम, व्यवहार और चरित्र की भी परीक्षा है।
चुनाव के दौरान उत्साह आवश्यक है, जुनून आवश्यक है और जीतने का जज्बा भी आवश्यक है, लेकिन इस जज्बे को विवेक से अलग कर देना खतरनाक हो सकता है। आत्मविश्वास और अहंकार के बीच बहुत महीन अंतर होता है। आत्मविश्वास कहता है—“मैं अपनी पूरी ताकत लगाऊंगा और जनता का विश्वास जीतने का प्रयास करूंगा।” अहंकार कहता है—“जीतना मेरा अधिकार है।” लोकतंत्र में पहला भाव स्वीकार्य है, दूसरा नहीं। क्योंकि अंतिम निर्णय प्रत्याशी नहीं, मतदाता करता है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और शिक्षा के बल पर मनुष्य अपनी दिशा बदल सकता है। उन्हें बचपन से ही गंभीर सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने शिक्षा का मार्ग नहीं छोड़ा और आगे चलकर उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा सामाजिक न्याय के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिनाई यदि रास्ते में आए तो उससे हार मानना जरूरी नहीं; कई बार वही कठिनाई व्यक्ति को उस ऊंचाई तक पहुंचाती है जहां सामान्य परिस्थितियां उसे कभी नहीं पहुंचा पातीं।
इसी प्रकार डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन भी संघर्ष से उपलब्धि तक की प्रेरक यात्रा है। उन्होंने वैज्ञानिक के रूप में भारत के अंतरिक्ष और रक्षा कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में देश के राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक विवरण के अनुसार उनका जीवन विज्ञान, राष्ट्रनिर्माण और युवाओं में सपने तथा कर्म की ऊर्जा जगाने के प्रयासों से जुड़ा रहा। उनके विचारों का सार यही था कि सोच को कर्म से जोड़ा जाए और विपरीत परिस्थितियों को अवसर में बदला जाए।
लेकिन चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति के लिए हौसला रखने का अर्थ यह नहीं कि वह परिणाम की चिंता किए बिना किसी भी सीमा को पार कर जाए। जीत की चाह होनी चाहिए, लेकिन जीत के लिए मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए। विरोधी प्रत्याशी आपका प्रतिस्पर्धी है, शत्रु नहीं। मतभेद हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तिगत अपमान नहीं। राजनीतिक संघर्ष हो सकता है, लेकिन सामाजिक संबंधों को नष्ट करना आवश्यक नहीं। आज जिस व्यक्ति के विरुद्ध आप चुनाव लड़ रहे हैं, कल वही आपके गांव, वार्ड या शहर में आपके साथ खड़ा हो सकता है। चुनाव समाप्त हो जाएगा, लेकिन समाज बना रहेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्याशी अपने भीतर हार के भय को जगह न दे। हार का भय व्यक्ति को असंयमित कर सकता है। उसे लग सकता है कि किसी भी कीमत पर जीत जरूरी है। यहीं से दबाव, प्रलोभन, आरोप-प्रत्यारोप और अनैतिक हथकंडों का रास्ता खुलता है। जबकि सच्चा आत्मविश्वास कहता है—मैं पूरी ईमानदारी से प्रयास करूंगा, अपने विचार जनता के सामने रखूंगा, मतदाता को समझाऊंगा और फिर उसके निर्णय को स्वीकार करूंगा।
क्या हार में, क्या जीत में—किंचित भयभीत मत होइए। चुनाव का परिणाम किसी व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का अंतिम मूल्यांकन नहीं होता। जीत जिम्मेदारी देती है और हार अनुभव देती है। जीतने वाला यदि अहंकार में डूब जाए तो जीत भी उसकी कमजोरी बन सकती है और हारने वाला यदि सीख लेकर आगे बढ़े तो हार उसके भविष्य की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
प्रत्याशी को चाहिए कि वह अपने समर्थकों के उत्साह को सकारात्मक दिशा दे। भीड़ को उकसाने के बजाय संगठन को मजबूत करे, विरोधी के खिलाफ नफरत फैलाने के बजाय अपने पक्ष की अच्छाइयां बताए और मतदाता पर दबाव बनाने के बजाय उसके विवेक को संबोधित करे। लोकतंत्र में सबसे प्रभावशाली प्रचार वह है जिसमें प्रत्याशी कहता है—“मेरे काम को देखिए, मेरे विचारों को परखिए और फिर अपने विवेक से निर्णय कीजिए।”
आज चुनाव मैदान में खड़े प्रत्येक प्रत्याशी के लिए यही समय है कि वह स्वयं से पूछे—क्या मैं केवल जीतने आया हूं या जनता का विश्वास जीतने आया हूं? दोनों में अंतर है। जीत पांच वर्ष की सत्ता दे सकती है, लेकिन विश्वास लंबे समय की सामाजिक स्वीकार्यता देता है।
इसलिए अपने इरादों को फौलादी रखिए, मेहनत में कमी मत रखिए, हौसलों को बुलंद रखिए, लेकिन कदमों को मर्यादा की सीमा के भीतर रखिए। जनता के बीच जाइए, अपनी बात रखिए, आलोचना सुनिए, विरोध को सहिए और अंतिम क्षण तक सकारात्मक ऊर्जा के साथ मैदान में डटे रहिए। परिणाम आने के बाद भी लोकतांत्रिक गरिमा बनाए रखिए।
क्योंकि असली विजेता केवल वह नहीं होता जिसके नाम के सामने सबसे अधिक मत लिखे जाते हैं। असली विजेता वह भी है जो संघर्ष के दौरान अपना चरित्र बचाए रखता है, प्रतिस्पर्धा में अपनी मर्यादा नहीं खोता और परिणाम चाहे जो हो, लोकतंत्र के निर्णय को सम्मान के साथ स्वीकार करता है।
आज चुनावी रण में उतरने वालों के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—हौसला इतना ऊंचा रखिए कि कठिनाई छोटी लगे, आत्मविश्वास इतना मजबूत रखिए कि भय पास न आए और चरित्र इतना मजबूत रखिए कि जीत मिले तो सिर न चढ़े और हार मिले तो सिर न झुके। यही संघर्ष की सच्ची विजय है और यही लोकतंत्र की वास्तविक सुंदरता भी।
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इरादे फौलादी हों तो चुनौती छोटी पड़ जाती है
“जीत का जुनून रखिए, हार का भय नहीं; क्योंकि मजबूत इरादों वाला व्यक्ति परिणाम से नहीं, अपने प्रयास और मर्यादा से अपनी पहचान बनाता है।”



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