संपादकीय@8 सितंबर 2026
मनुष्य ने विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुविधाओं के क्षेत्र में जितनी तेजी से प्रगति की है, उतनी ही तेजी से कहीं न कहीं वह अपने रिश्तों की संवेदनशीलता खोता जा रहा है। आज हमारे पास सुख-सुविधाओं के साधन बढ़े हैं, लेकिन परिवार में बैठकर सुख-दुःख बांटने का समय कम हुआ है। इसी बदलती जीवनशैली और बढ़ते स्वार्थ से जन्म ले रही —“तेरा-मेरा” की संकीर्ण सोच। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह सोच देखने में भले ही सामान्य लगे, लेकिन धीरे-धीरे यह परिवार की जड़ों को खोखला कर देती है। “यह मेरा है, वह तुम्हारा है”, “इसमें मेरा कितना हिस्सा है?”, “मैंने तुम्हारे लिए इतना किया, तुमने मेरे लिए क्या किया?” जैसे सवाल जब रिश्तों पर हावी होने लगते हैं, तब प्रेम, त्याग और अपनापन पीछे छूटने लगता है।
सबसे दुखद स्थिति तब पैदा होती है, जब यह मानसिकता भाई-भाई के बीच प्रवेश करती है। बचपन में एक ही थाली में खाना खाने वाले, एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े रहने वाले भाई बड़े होने के बाद जमीन, मकान, दुकान, व्यापार और पैसों के बंटवारे को लेकर एक-दूसरे के विरोधी बन जाते हैं। कभी-कभी विवाद संपत्ति का नहीं, बल्कि हिस्से की मानसिकता का होता है। व्यक्ति यह भूल जाता है कि जिस भाई के साथ उसने बचपन की अनगिनत यादें साझा की हैं, उसके साथ रिश्ते की कीमत किसी जमीन के टुकड़े से कहीं अधिक है।
विडंबना यह है कि संपत्ति बांटते समय परिवार अक्सर दीवारें खड़ी कर लेता है, लेकिन रिश्तों के बंटवारे के बाद उन दीवारों को गिराना आसान नहीं होता। अदालतों में वर्षों तक चलने वाले पारिवारिक विवादों के पीछे केवल कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि अहंकार, अविश्वास और “मुझे कम क्यों मिला?” जैसी भावनाएं भी बड़ी भूमिका निभाती हैं।
तेरा-मेरा की यह बीमारी केवल भाई-भाई तक सीमित नहीं है। इसका सबसे पीड़ादायक असर वृद्ध माता-पिता पर पड़ता है। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को पालने, पढ़ाने और उनके भविष्य को संवारने में लगा दी, वही माता-पिता बुढ़ापे में कभी-कभी बच्चों के बीच जिम्मेदारी का विषय बन जाते हैं।
“माता-पिता तुम्हारे साथ रहें”, “उनकी दवा का खर्च तुम उठाओ”, “मैंने तो पहले ही बहुत कर दिया”, “इनकी जिम्मेदारी सिर्फ मेरी क्यों?”—ऐसे सवाल जब घर में उठने लगते हैं, तो वृद्ध माता-पिता का मन भीतर से टूट जाता है।
जिस मां ने कभी यह नहीं पूछा कि उसके बच्चे ने कितना खाया और कितना नहीं, वही मां बुढ़ापे में अपने ही बच्चों के घर में अपने अस्तित्व का हिसाब देने को मजबूर हो जाती है। जिस पिता ने बच्चों की जरूरतों के लिए अपनी इच्छाओं का त्याग किया, वही पिता कभी-कभी अपनी दवाइयों के खर्च के लिए भी संकोच करने लगता है।
यह केवल पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का संकट है।
हमें यह समझना होगा कि माता-पिता किसी एक बेटे या बेटी की जिम्मेदारी नहीं हैं। वे पूरे परिवार की जड़ हैं। जिस पेड़ की छाया में पूरा परिवार बड़ा हुआ, उसकी देखभाल केवल इसलिए किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं हो सकती क्योंकि परिस्थितियों ने उसे अपने पास रख लिया है। भाई-बहनों को अपनी सुविधा के हिसाब से नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार माता-पिता की जिम्मेदारी साझा करनी चाहिए।
इसी प्रकार संपत्ति के विवादों में भी यह विचार आवश्यक है कि कानूनी अधिकार और पारिवारिक संबंध दो अलग चीजें हैं। अपना अधिकार मांगना गलत नहीं है, लेकिन अधिकार मांगते समय रिश्ते को समाप्त कर देना निश्चित रूप से बुद्धिमानी नहीं है। बातचीत, पारदर्शिता और आपसी सहमति से अनेक ऐसे विवाद समाप्त किए जा सकते हैं, जो वर्षों तक परिवारों को अदालतों और पुलिस थानों के चक्कर लगवाते रहते हैं।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को केवल संपत्ति कमाना न सिखाएं, बल्कि रिश्तों की कीमत समझाना भी सिखाएं। बच्चों को यह बताया जाना चाहिए कि भाई प्रतियोगी नहीं, जीवन का साथी है; बहन बोझ नहीं, परिवार की संवेदना है; माता-पिता जिम्मेदारी नहीं, जीवन का आधार हैं।
हमें अपने घरों में “मेरा” और “तेरा” की जगह “हमारा” शब्द को मजबूत करना होगा। हर चीज बराबर बांटना जरूरी नहीं, लेकिन सम्मान, संवेदना और अपनापन बराबर होना चाहिए।
क्योंकि अंततः मनुष्य की असली संपत्ति उसके बैंक खाते, जमीन-जायदाद या मकान नहीं होते। उसकी सबसे बड़ी संपत्ति वे लोग होते हैं, जो उसके सुख में मुस्कुराते और दुःख में उसके साथ खड़े रहते हैं।
समय रहते संभलना होगा। कहीं ऐसा न हो कि हम संपत्ति बचाते-बचाते रिश्ते खो दें और जीवन के अंतिम पड़ाव पर हमारे पास सब कुछ हो, लेकिन अपना कहने वाला कोई न हो।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर झांकें और स्वयं से एक सवाल पूछें—
हम अपने बच्चों के लिए कितनी संपत्ति छोड़ना चाहते हैं, और कितने मजबूत रिश्ते?
याद रखिए, “तेरा-मेरा” घर बांट सकता है, लेकिन “हमारा” ही परिवार बचा सकता है।
परिवार तभी परिवार है, जब उसमें अधिकार से पहले अपनापन और हिस्से से पहले रिश्ते दिखाई दें।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“रिश्ते संपत्ति के बंटवारे से नहीं, सोच के बंटवारे से टूटते हैं। घर की दीवारें ईंटों से बनती हैं, लेकिन परिवार प्रेम, विश्वास और त्याग से बनता है। इसलिए ‘मेरा कितना?’ पूछने से पहले यह पूछिए—‘हमारा क्या बचा रहेगा?’”


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