संपादकीय@ हरेश पंवार _4 नवंबर 2026

एक बार एक बुजुर्ग शिक्षक से उनके शिष्य ने पूछा—“गुरुजी, जीवन में सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?” शिक्षक ने मेज पर रखी एक सुंदर घड़ी उठाई और कहा—“यह घड़ी बहुत कीमती है, लेकिन यदि इसकी सुइयों को दिशा न मिले तो यह केवल घूमती रहेगी, समय नहीं बताएगी। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है। प्रतिभा, धन, शिक्षा और अवसर सब कुछ होने के बावजूद यदि जीवन के पास कोई आदर्श और उद्देश्य नहीं है, तो मनुष्य चलता तो बहुत है, लेकिन पहुँचता कहीं नहीं।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यही वह प्रश्न है, जिस पर आज के समाज को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है—हम जीवन जी रहे हैं या केवल जीवन की घटनाओं को पूरा कर रहे हैं?

“बिना आदर्श के जीवन सिर्फ घटनाओं का संग्रह है”—यह कथन केवल एक सुंदर विचार नहीं, बल्कि जीवन की दिशा और दशा को समझने की एक गहरी कसौटी है। मनुष्य का जन्म होना और जीवन को सार्थक बनाना दो अलग-अलग बातें हैं। जन्म हमें प्रकृति देती है, लेकिन जीवन को उद्देश्य, मूल्य और आदर्श देना हमारा अपना दायित्व है।

सुबह उठना, अपने काम पर जाना, परिवार की जिम्मेदारियां निभाना, पैसा कमाना, सुख-सुविधाएं जुटाना और रात को सो जाना—यदि जीवन केवल इसी क्रम का नाम बन जाए, तो उसमें और एक मशीन की कार्यप्रणाली में क्या अंतर रह जाता है? मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली शक्ति केवल उसकी बुद्धि नहीं, बल्कि उसके विचार, विवेक, मूल्य और आदर्श हैं।

आदर्श जीवन के लिए उस दीपक की तरह है, जो अंधेरे रास्ते में दिशा दिखाता है। परिस्थितियां चाहे कितनी भी बदल जाएं, आदर्श व्यक्ति को यह तय करने में मदद करता है कि उसे किस रास्ते पर चलना है और किस रास्ते से बचना है। जिसके जीवन में कोई सिद्धांत नहीं होता, वह परिस्थितियों का गुलाम बन जाता है। आज जिस दिशा में लाभ दिखाई देता है, वह उसी ओर मुड़ जाता है; जहां प्रशंसा मिलती है, वहीं खड़ा हो जाता है और जहां स्वार्थ पूरा होता है, वहीं अपना मूल्य बेच देता है।

इसके विपरीत आदर्शवादी व्यक्ति परिस्थितियों से समझौता कर सकता है, लेकिन अपने मूल्यों से नहीं। उसके लिए सफलता का अर्थ केवल धन, पद और प्रसिद्धि नहीं होता। वह पूछता है—मैं जो कर रहा हूं, क्या वह सही है? क्या इससे किसी दूसरे का अधिकार तो नहीं छिन रहा? क्या मेरी सफलता समाज के लिए भी उपयोगी है?

यही प्रश्न किसी साधारण जीवन को असाधारण बना देते हैं।

भारतीय इतिहास में ऐसे अनेक व्यक्तित्व हुए, जिनका जीवन केवल घटनाओं का सिलसिला नहीं रहा, बल्कि एक विचार और उद्देश्य की यात्रा बना। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सामाजिक जीवन के मूल आदर्शों के रूप में देखा। भारत सरकार के प्रकाशित उनके लेखन में भी उनकी सामाजिक दर्शन की आधारशिला इन्हीं तीन मूल्यों—स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व—को बताया गया है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब व्यक्ति अपने व्यक्तिगत संघर्ष को व्यापक सामाजिक उद्देश्य से जोड़ देता है, तो उसका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बन जाता है।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन भी इसी विचार की प्रेरक मिसाल है। वैज्ञानिक से लेकर भारत के राष्ट्रपति तक की उनकी यात्रा केवल उपलब्धियों की सूची नहीं थी। उनके विचारों में ज्ञान, कर्म, ईमानदारी, सेवा और राष्ट्रनिर्माण का स्पष्ट आग्रह दिखाई देता है। राष्ट्रपति भवन की आधिकारिक सामग्री में भी उनके विचारों में ज्ञान को कर्म से जोड़ने और मानव कल्याण के लिए कार्य करने पर जोर मिलता है।

यही फर्क है सफल व्यक्ति और सार्थक व्यक्ति में।

आज का समय भौतिक उपलब्धियों की चमक से भरा हुआ है। सोशल मीडिया ने प्रसिद्धि को उपलब्धि और महंगे संसाधनों को सफलता का प्रतीक बना दिया है। युवा पीढ़ी के सामने अनेक आदर्श हैं, लेकिन सवाल यह है कि उन आदर्शों में कितने चरित्र, संघर्ष, ईमानदारी और सामाजिक जिम्मेदारी पर आधारित हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने अपने बच्चों को यह सिखाना शुरू कर दिया है कि जीवन का उद्देश्य केवल अधिक कमाना, अधिक खरीदना और अधिक दिखाना है?

यदि ऐसा है, तो हमें रुककर अपने जीवन की दिशा देखनी होगी।

आदर्श का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति पूर्ण हो जाए और उससे कभी गलती न हो। आदर्श का अर्थ है—गलती होने के बाद भी सही दिशा में लौटने की क्षमता। आदर्श हमें कठोर नहीं, बल्कि जिम्मेदार बनाता है। वह हमें दूसरों से श्रेष्ठ बनने की नहीं, बल्कि स्वयं का बेहतर रूप बनने की प्रेरणा देता है।

एक शिक्षक का आदर्श शिक्षा हो सकता है, चिकित्सक का सेवा, पत्रकार का सत्य, न्याय से जुड़े व्यक्ति का निष्पक्षता, किसान का ईमानदार श्रम और युवा का राष्ट्रनिर्माण। हर व्यक्ति अपने जीवन में कोई ऐसा मूल्य चुन सकता है, जिसके साथ वह समझौता न करे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदर्श केवल भाषणों और पुस्तकों में नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। ईमानदारी की बात करना आसान है, लेकिन कठिन परिस्थिति में ईमानदार रहना आदर्श है। समानता की बात करना आसान है, लेकिन अपने से कमजोर व्यक्ति को बराबरी का सम्मान देना आदर्श है। मानवता की बातें करना आसान है, लेकिन किसी जरूरतमंद के लिए बिना स्वार्थ खड़ा होना आदर्श है।

आज समाज को ऐसे ही जीवंत आदर्शों की आवश्यकता है।

हमें अपने बच्चों से केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि उन्होंने कितने अंक प्राप्त किए, कितनी नौकरी पाई या कितना पैसा कमाया। उनसे यह भी पूछना चाहिए—तुम किस तरह के इंसान बनना चाहते हो? तुम्हारे जीवन का वह कौन-सा सिद्धांत है, जिसे परिस्थितियां बदलने पर भी तुम नहीं छोड़ोगे?

क्योंकि अंततः मनुष्य की पहचान उसके पास मौजूद वस्तुओं से नहीं, बल्कि उसके पीछे छोड़े गए मूल्यों से होती है।

समय गुजर जाएगा। पद बदल जाएंगे। धन किसी और के हाथ में चला जाएगा। प्रसिद्धि भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ जाएगी। लेकिन यदि जीवन ने किसी व्यक्ति के भीतर सत्य, करुणा, न्याय, समानता, साहस और सेवा का दीप जलाया है, तो उसकी रोशनी उसके बाद भी बनी रहती है।

इसलिए जीवन को केवल लंबा बनाने की चिंता न करें, उसे सार्थक बनाने का प्रयास करें। घटनाएं अपने आप जीवन में आती रहेंगी, लेकिन उन घटनाओं को उद्देश्य, दिशा और अर्थ देना हमारे हाथ में है।

क्योंकि आदर्शहीन जीवन में दिन तो बहुत होते हैं, लेकिन दिशा नहीं; जबकि आदर्शयुक्त जीवन में हर दिन एक उद्देश्य बन जाता है और हर कदम इतिहास की ओर बढ़ता हुआ एक सार्थक निशान छोड़ जाता है।