संपादकीय@हरेश पंवार_ 2 सितंबर 2026

एक वृद्ध पिता बरामदे में रोज शाम को कुर्सी लगाकर बैठते थे। सड़क की ओर उनकी नजरें टिकी रहतीं। बेटा शहर में नौकरी करता था और महीने में पैसे भेज देता था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन पिता की आंखों में एक इंतजार हमेशा रहता था। एक दिन पड़ोसी ने पूछा—“काका, बेटे से तो हर महीने पैसे आ जाते हैं, फिर किसका इंतजार करते रहते हो?” वृद्ध ने धीमे से कहा—“पैसे तो बैंक में आ जाते हैं बेटा, मुझे तो उसका थोड़ा-सा समय चाहिए।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यह छोटा-सा प्रसंग उस सच्चाई को सामने रखता है जिसे आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हम अक्सर भूल जाते हैं। बचपन में बच्चे को माता-पिता के सहारे की जरूरत होती है और जीवन के अंतिम पड़ाव में माता-पिता को बच्चों के सहारे की। यही जीवन का चक्र है और शायद रिश्तों की सबसे बड़ी परीक्षा भी।

बचपन मनुष्य के जीवन का वह दौर है, जब वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर होता है। उसे चलना नहीं आता तो कोई उंगली पकड़ता है, बोलना नहीं आता तो कोई शब्द सिखाता है, भूख लगती है तो कोई भोजन कराता है और डर लगता है तो मां की गोद सुरक्षा बन जाती है। बच्चा गिरता है तो माता-पिता उसे उठाते हैं, असफल होता है तो हौसला देते हैं और गलती करता है तो उसे समझाते हैं। वे उसकी जरूरतों को अपनी जरूरतों से ऊपर रखते हैं।

लेकिन समय कभी एक जगह नहीं ठहरता।

जिस बच्चे को कभी चलना सिखाने के लिए पिता ने अपनी उंगली आगे बढ़ाई थी, एक दिन वही पिता स्वयं धीमे कदमों से चलने लगते हैं। जिस मां ने बच्चे को रातों में उठकर संभाला था, एक समय ऐसा आता है जब उसे दवा लेने, अस्पताल जाने या घर के छोटे-छोटे कामों के लिए किसी हाथ की जरूरत होती है। जीवन का यही परिवर्तन हमें बताता है कि सहारा हमेशा एक दिशा में नहीं चलता; समय आने पर सहारे की भूमिका बदल जाती है।

बुढ़ापा कोई बोझ नहीं, जीवनभर की तपस्या का अंतिम पड़ाव है। लेकिन दुर्भाग्य से आधुनिक समाज में बुजुर्गों की सबसे बड़ी समस्या हमेशा आर्थिक नहीं होती। कई बार उनके पास घर होता है, पेंशन होती है, दवाइयां होती हैं और सुविधाएं होती हैं, लेकिन उनके पास बात करने वाला कोई नहीं होता। उनके कमरे में सामान बहुत होता है, मगर समय देने वाला व्यक्ति कम होता है।

बच्चे अपने काम, व्यवसाय और पारिवारिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हैं। यह व्यस्तता वास्तविक भी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अपने माता-पिता के लिए दिन के कुछ मिनट भी निकालना इतना कठिन हो गया है? जिस मां ने हमारे लिए वर्षों तक अपनी नींद त्याग दी, जिस पिता ने हमारी जरूरतों के लिए अपनी इच्छाओं को दबाया, क्या उनके लिए हमारे पास कुछ समय नहीं होना चाहिए?

आज की पीढ़ी को यह समझना होगा कि बुजुर्गों को केवल भोजन, कपड़े और दवा की जरूरत नहीं होती। उन्हें सम्मान, अपनापन, बातचीत और यह विश्वास चाहिए कि वे अभी भी परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

बचपन की नादानी हमें प्यारी लगती है। बच्चा बार-बार एक ही सवाल पूछे तो हम मुस्कुराते हैं। वह धीरे चले तो उसका हाथ पकड़ते हैं। वह अपनी बात बार-बार दोहराए तो धैर्य रखते हैं। लेकिन जब बुजुर्ग अपनी बात दोहराते हैं, धीरे चलते हैं या किसी काम को करने में समय लेते हैं, तो हम कई बार चिढ़ने लगते हैं। यही हमारे व्यवहार का विरोधाभास है।

हमें यह समझना होगा कि बुढ़ापे की कमजोरी भी जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। जिस प्रकार बच्चे की निर्भरता को प्रेम से स्वीकार किया जाता है, उसी प्रकार बुजुर्गों की निर्भरता को भी सम्मान से स्वीकार किया जाना चाहिए।

माता-पिता ने हमारे बचपन में केवल हमारी परवरिश नहीं की, बल्कि हमारे व्यक्तित्व की नींव रखी। उन्होंने हमें भाषा दी, संस्कार दिए, शिक्षा दिलाई, सही-गलत का अंतर समझाया और समाज में खड़े होने की क्षमता दी। हमारी सफलता में यदि हमारी मेहनत का योगदान है तो उसके पीछे उन हाथों की मेहनत भी है, जिन्होंने हमें खड़ा होने योग्य बनाया।

इसलिए माता-पिता की सेवा को केवल “कर्तव्य” कह देना भी शायद पर्याप्त नहीं है। यह कृतज्ञता का भाव है। यह उस प्रेम की वापसी है जिसे हमने बचपन में बिना मांगे पाया था।

आज परिवारों में पीढ़ियों के बीच संवाद की कमी भी एक बड़ी चुनौती बन रही है। बुजुर्गों के अनुभव और युवाओं की ऊर्जा यदि साथ आ जाए तो परिवार की शक्ति कई गुना बढ़ सकती है। बुजुर्गों के पास जीवन का अनुभव है और युवाओं के पास नई तकनीक तथा नई सोच। दोनों के बीच संवाद हो तो परिवार में ज्ञान और ऊर्जा का सुंदर संतुलन बन सकता है।

हमें यह भी समझना चाहिए कि बुजुर्गों की देखभाल केवल बेटों की जिम्मेदारी नहीं है। बेटियां, बहुएं, पोते-पोतियां और परिवार के सभी सदस्य अपनी संवेदना से इस जिम्मेदारी को साझा कर सकते हैं। सम्मान किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे परिवार की संस्कृति होनी चाहिए।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—माता-पिता के साथ समय बिताने के लिए किसी विशेष अवसर की प्रतीक्षा मत कीजिए। उनके जन्मदिन, किसी पर्व या किसी समारोह का इंतजार करने के बजाय सामान्य दिनों को ही विशेष बना दीजिए। उनके पास बैठिए। उनके पुराने किस्से सुनिए। उनकी दवाइयों का ध्यान रखिए। कभी बिना किसी काम के फोन कर पूछिए—“मां, कैसी हो?” या “पिताजी, आज दिन कैसा रहा?”

संभव है उन्हें उस समय किसी महंगे उपहार की जरूरत ही न हो।

उन्हें सिर्फ यह एहसास चाहिए कि उनका बच्चा आज भी उन्हें उतना ही अपना मानता है, जितना बचपन में वे उसे अपना मानते थे।

जीवन का चक्र हमें बहुत सुंदर संदेश देता है—कल हम उनकी उंगली पकड़कर चले थे, आज उनकी उंगली पकड़ने की हमारी बारी है। बचपन में उन्होंने हमारी कमजोरियों को प्रेम से स्वीकार किया; अब बुढ़ापे में उनकी कमजोरियों को प्रेम से स्वीकार करना हमारा धर्म होना चाहिए।

क्योंकि एक दिन बचपन लौटकर नहीं आता, लेकिन बुढ़ापा जरूर आता है।

जिस घर में बच्चों के कदमों की आहट और बुजुर्गों की दुआएं साथ रहती हैं, वही घर वास्तव में समृद्ध होता है। धन से घर बड़ा हो सकता है, सुविधाओं से सुंदर हो सकता है, लेकिन माता-पिता के सम्मान और प्रेम से ही वह घर घर बनता है।

इसलिए आज ही अपने माता-पिता के पास बैठिए। उनका हाथ थामिए और उन्हें महसूस कराइए कि जीवन की इस संध्या में वे अकेले नहीं हैं।

जिस उंगली ने हमें चलना सिखाया था, उसे बुढ़ापे में थाम लेना ही शायद संतान होने की सबसे खूबसूरत जिम्मेदारी है।