संपादकीय @हरेश कुमार 27 अगस्त 2026
एक मोहल्ले में चुनाव का मौसम आया। गलियों में पोस्टर लगे, चौपालों पर चर्चाएं शुरू हुईं और हर उम्मीदवार अपने-अपने तरीके से मतदाताओं के बीच पहुंचने लगा। किसी ने विकास का वादा किया, किसी ने जातीय समीकरण गिनाए तो किसी ने अपने राजनीतिक संपर्कों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताया। लेकिन उसी मोहल्ले में एक बुजुर्ग ने बड़ी सरल बात कही—“चुनाव पांच साल के लिए प्रतिनिधि चुनता है, रिश्ते पूरी जिंदगी के लिए होते हैं; इसलिए वोट का फैसला सोच-समझकर करना, लेकिन वोट के कारण रिश्ते मत तोड़ना।” यही बात आज राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों के माहौल में सबसे अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
राजस्थान में 309 नगरीय निकायों के चुनाव दो चरणों में 9 और 11 सितंबर को होने हैं। इन चुनावों में 10 नगर निगम, 51 नगर परिषद और 248 नगर पालिकाओं के कुल 10,245 पार्षद पदों के लिए मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनेंगे। मतगणना 14 सितंबर को होगी।
यह केवल चुनाव का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करने का अवसर है। पहली बार प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायती राज चुनावों को ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ की अवधारणा के तहत एक साथ कराने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है। इसके पीछे चुनावी प्रक्रिया को सरल बनाने, प्रशासनिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और राजनीतिक स्थिरता जैसे उद्देश्य बताए गए हैं।
लेकिन चुनाव केवल मतदान केंद्र तक सीमित नहीं होता। चुनाव का असली चरित्र उस सामाजिक वातावरण से तय होता है, जो मतदान से पहले और परिणाम आने के बाद दिखाई देता है।
आज शहरों की गलियों में हर वार्ड से प्रत्याशी मैदान में हैं। कोई निर्दलीय है, कोई राजनीतिक दल के बैनर पर चुनाव लड़ रहा है। सभी का अपना समर्थन आधार है और सभी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। राजनीतिक दल भी अपने-अपने सर्वे, समीकरण और संगठनात्मक रणनीति के आधार पर प्रत्याशियों का चयन कर रहे हैं। जयपुर जैसे बड़े शहरों में टिकट की दावेदारी को लेकर राजनीतिक दलों के स्तर पर व्यापक गतिविधियां भी शुरू हो चुकी हैं।
लेकिन इस पूरे चुनावी शोर में आम मतदाता को एक सवाल अपने आप से जरूर पूछना चाहिए—क्या मैं अपना वोट उस व्यक्ति को दे रहा हूं जो मेरे वार्ड की वास्तविक समस्याओं को समझता है, या उस व्यक्ति को जिसे मेरी जाति, गोत्र, धर्म, व्यक्तिगत संबंध या राजनीतिक पसंद के कारण समर्थन मिल रहा है?
नगर निकाय का चुनाव वास्तव में स्थानीय समस्याओं का चुनाव है। सड़क, नाली, सफाई, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, पार्क, अतिक्रमण, कचरा प्रबंधन, यातायात, सार्वजनिक सुविधाएं और नागरिक सेवाएं किसी जाति या दल की समस्या नहीं होतीं। इनका समाधान हर नागरिक को चाहिए। इसलिए पार्षद चुनते समय सबसे महत्वपूर्ण कसौटी प्रत्याशी की ईमानदारी, उपलब्धता, समझ, संघर्षशीलता और वार्ड के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए।
जाति, गोत्र, धर्म और राजनीतिक विचार लोकतांत्रिक पहचान का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इन्हें सामाजिक रिश्तों की दीवार नहीं बनने देना चाहिए।
सबसे बड़ी चिंता उस समय पैदा होती है जब चुनावी राजनीति सामाजिक जीवन में प्रवेश करने लगती है। आज कई स्थानों पर यह देखने को मिलता है कि कौन किस राजनीतिक दल के साथ खड़ा है, इसका असर सामाजिक मेलजोल तक पहुंचने लगा है। विवाह, सामाजिक समारोह, धार्मिक आयोजन और पारिवारिक कार्यक्रम भी कभी-कभी राजनीतिक खेमेबंदी के चश्मे से देखे जाने लगते हैं।
यह स्थिति चिंताजनक है।
विवाह किसी राजनीतिक दल का सम्मेलन नहीं है। शोकसभा किसी विचारधारा की बैठक नहीं है। सामाजिक समारोह किसी पार्टी का शक्ति प्रदर्शन नहीं है।
यदि किसी परिवार की खुशी में शामिल होने से पहले यह देखा जाने लगे कि परिवार किस पार्टी के करीब है, तो समझना होगा कि राजनीति ने समाज की सहजता पर अनावश्यक कब्जा करना शुरू कर दिया है।
विवाह जैसे संस्कारों में राजनीतिक पदाधिकारियों के स्वागत, माल्यार्पण और साफा बांधने की परंपरा अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि यह सम्मान सामाजिक आत्मीयता के बजाय राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाए, तो चिंतन आवश्यक है। लोकतंत्र में नेता जनता के प्रतिनिधि हैं; वे समाज से ऊपर नहीं हैं। उनका सम्मान होना चाहिए, लेकिन सामाजिक संबंधों को राजनीतिक पहचान के आधार पर बांटना समाज की एकता के लिए नुकसानदायक है।
हमें यह समझना होगा कि वोट अलग हो सकता है, पड़ोसी नहीं। विचार अलग हो सकते हैं, रिश्ते नहीं। राजनीतिक पसंद अलग हो सकती है, सामाजिक सम्मान नहीं।
आज चुनावी माहौल में सबसे जरूरी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों से ज्यादा मतदाताओं की है। राजनीतिक दल अपने हित के अनुसार रणनीति बनाएंगे। उम्मीदवार अपनी जीत के लिए प्रयास करेंगे। समर्थक अपने प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाएंगे। लेकिन अंतिम निर्णय मतदाता के हाथ में है।
इसलिए इस चुनाव में एक छोटी-सी लोकतांत्रिक कसौटी बनाई जा सकती है—उम्मीदवार से पूछिए कि वह आपके वार्ड के लिए क्या करेगा, कैसे करेगा और जीतने के बाद जनता के बीच कितनी आसानी से उपलब्ध रहेगा।
वोट मांगने वाला हर व्यक्ति विकास की बात करेगा, लेकिन मतदाता को भाषण नहीं, उसके पिछले आचरण और वर्तमान सोच को देखना चाहिए। जिसने बिना पद के समाज के लिए काम किया है, वह पद मिलने के बाद भी काम करने की संभावना रखता है। जिसने चुनाव से पहले ही समाज को जाति, धर्म या व्यक्तिगत वैमनस्य में बांटना शुरू कर दिया है, उससे चुनाव के बाद सामाजिक सद्भाव की उम्मीद करना कठिन हो सकता है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिताना नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि हारने वाले उम्मीदवार और उसके समर्थक का सम्मान बना रहे तथा जीतने वाला व्यक्ति पूरे वार्ड का प्रतिनिधि बनकर काम करे।
चुनाव परिणाम आने के बाद कोई ‘अपना’ और कोई ‘पराया’ पार्षद नहीं होना चाहिए। जो जीत जाए, वह पूरे वार्ड का प्रतिनिधि है। जो हार जाए, वह भी समाज का नागरिक है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चुनाव तक सीमित रहनी चाहिए; सामाजिक भाईचारा जीवनभर कायम रहना चाहिए।
इस बार राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों को केवल सत्ता और बोर्ड बनाने की लड़ाई न बनने दें। इसे स्वच्छ राजनीति, जिम्मेदार मतदान और सामाजिक सद्भाव का अभियान बनाएं। गलत सूचना, फर्जी लिंक, डीपफेक और साइबर धोखाधड़ी से भी मतदाताओं को सावधान रहने की जरूरत है; राजस्थान पुलिस ने चुनावी दौर में ऐसी गतिविधियों को लेकर विशेष चेतावनी जारी की है।
आखिर में मतदाता से यही आग्रह है—वोट जरूर दीजिए, लेकिन वोट देते समय अपना विवेक किसी के हाथ गिरवी मत रखिए।
जाति देखकर नहीं, चरित्र देखकर चुनिए।
नारे देखकर नहीं, काम देखकर चुनिए।
दबाव में नहीं, विवेक से चुनिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—वोट चाहे जिसे दें, लेकिन अपने पड़ोसी, रिश्तेदार और समाज के व्यक्ति को राजनीतिक विरोधी बनाकर अपना संबंध मत खोइए।
लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि हम अलग-अलग विचार रखते हुए भी साथ रह सकें। यदि चुनाव हमें अच्छे प्रतिनिधि देने के साथ-साथ बेहतर सामाजिक नागरिक भी बना सके, तभी यह लोकतंत्र का वास्तविक उत्सव कहलाएगा।
चुनाव आएंगे-जाएंगे, बोर्ड बनेंगे-बिगड़ेंगे, नेता बदलेंगे; लेकिन समाज का भाईचारा टूट गया तो उसकी भरपाई किसी चुनावी जीत से नहीं हो सकेगी।
यही समय है—राजनीति को राजनीति तक रखें और समाज को समाज बने रहने दें।
संपादकीय
लोकतंत्र का पर्व मनाइए, रिश्तो में राजनीति का जहर मत घोलिए
*भीम प्रज्ञा अलर्ट* “वोट की ताकत सरकारें बदल सकती है, लेकिन रिश्तों की ताकत समाज बनाती है; इसलिए राजनीतिक विचारों में मतभेद रखिए, मनभेद नहीं। चुनाव में अपना विवेक चुनिए और जीवन में अपना भाईचारा बचाइए।”



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