संपादकीय@ हरेश पंवार ,3 सितंबर 2026

एक बुजुर्ग बुनकर के पास एक दिन उसका शिष्य आया। उसने देखा कि बुनकर के हाथ में धागा उलझा हुआ था। शिष्य ने जल्दी-जल्दी उसे खींचकर सुलझाने की कोशिश की, लेकिन धागा और उलझ गया। बुनकर मुस्कुराया और बोला—“धागा जितना उलझा हो, उसे उतनी ही जल्दबाजी से नहीं, उतने ही धैर्य से सुलझाना पड़ता है।” फिर उसने एक-एक गांठ को पहचानकर धीरे-धीरे खोलना शुरू किया और कुछ ही देर में वही धागा फिर से सीधा हो गया। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

मानव जीवन भी कुछ ऐसा ही है। परिस्थितियां, असफलताएं, तनाव, रिश्तों में आई दरारें और अचानक आने वाले संकट कई बार जीवन के धागे को इतना उलझा देते हैं कि इंसान को आगे का रास्ता दिखाई देना बंद हो जाता है। उसे लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया है। लेकिन जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि उलझन अंत नहीं होती और टूटना अंतिम सत्य नहीं होता।

हर व्यक्ति के जीवन में ऐसे दौर आते हैं, जब परिस्थितियां उसकी कल्पना से बिल्कुल विपरीत हो जाती हैं। जिस योजना को लेकर उसने वर्षों मेहनत की, उसमें असफलता मिल सकती है। जिस रिश्ते पर उसे सबसे अधिक भरोसा था, वही रिश्ता टूट सकता है। रोजगार की समस्या, आर्थिक संकट, बीमारी, पारिवारिक विवाद या किसी प्रिय व्यक्ति का बिछड़ना मनुष्य को भीतर तक हिला सकता है। ऐसे क्षणों में मनुष्य को अपनी पूरी जिंदगी अंधकारमय दिखाई देने लगती है।

लेकिन संकट के क्षण में दिखाई देने वाला अंधकार हमेशा स्थायी नहीं होता।

कई बार हमें जीवन बदलने के लिए पूरी दुनिया बदलने की जरूरत नहीं होती, केवल दिशा बदलने की जरूरत होती है। एक सही सलाह, एक अनुभवी व्यक्ति का मार्गदर्शन, किसी अपने का हाथ और स्वयं पर विश्वास—ये चार चीजें इंसान को उस जगह से उठा सकती हैं जहां उसे लगता है कि अब उठना संभव नहीं है।

यही कारण है कि जीवन में मार्गदर्शन का महत्व बहुत बड़ा है। जब व्यक्ति स्वयं अपनी समस्या में उलझा होता है तो उसे रास्ता दिखाई नहीं देता। ऐसे समय में किसी अनुभवी व्यक्ति की निष्पक्ष सलाह प्रकाश स्तंभ की तरह काम कर सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई दूसरा हमारे जीवन की सारी समस्याएं हल कर देगा। बल्कि सही मार्गदर्शन हमें समस्या को नए दृष्टिकोण से देखने की क्षमता देता है।

लेकिन केवल सलाह काफी नहीं है। उसके बाद जरूरी है अपनों का साथ।

कठिन समय में एक वाक्य—“मैं तुम्हारे साथ हूं”—कई बार लंबी-चौड़ी सलाह से अधिक प्रभावी होता है। इंसान संकट में केवल समाधान नहीं चाहता, वह यह महसूस करना चाहता है कि वह अकेला नहीं है। परिवार, मित्र और समाज का संवेदनशील व्यवहार किसी टूटे हुए व्यक्ति के भीतर फिर से जीने की इच्छा और संघर्ष करने की ताकत पैदा कर सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी संकट में व्यक्ति के लिए समय पर भावनात्मक सहयोग, भरोसेमंद व्यक्ति से बातचीत और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लेने को महत्वपूर्ण मानता है।

यहीं से तीसरी शक्ति सामने आती है—आत्मविश्वास।

दूसरे लोग आपका हाथ पकड़ सकते हैं, रास्ता दिखा सकते हैं और हौसला दे सकते हैं, लेकिन पहला कदम आपको स्वयं उठाना पड़ता है। जब तक व्यक्ति अपने भीतर यह विश्वास बनाए रखता है कि “मैं इस परिस्थिति से निकल सकता हूं”, तब तक उम्मीद जीवित रहती है। परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, उनका सामना करने की मानसिक शक्ति व्यक्ति को आगे बढ़ाती है।

आत्मविश्वास का अर्थ यह नहीं कि हमें कभी डर नहीं लगेगा। डर लगना स्वाभाविक है। आत्मविश्वास का अर्थ है—डर के बावजूद आगे बढ़ने का साहस। असफलता के बाद दोबारा प्रयास करना। गिरने के बाद उठना। गलती से सीखना। और जब रास्ता बंद दिखाई दे तो दूसरा रास्ता तलाशना।

आज की युवा पीढ़ी विशेष रूप से इस बात को समझने की जरूरत महसूस करती है। प्रतियोगिता बढ़ रही है, रोजगार के अवसरों के लिए संघर्ष है, सामाजिक अपेक्षाएं बढ़ रही हैं और डिजिटल दुनिया ने तुलना की प्रवृत्ति को भी बढ़ाया है। सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता देखकर व्यक्ति कई बार अपनी जिंदगी को असफल समझने लगता है। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि हम दूसरों के जीवन की केवल दिखाई देने वाली तस्वीर देखते हैं, उनके संघर्ष नहीं।

हर सफलता के पीछे संघर्ष की कोई न कोई कहानी होती है।

इसलिए किसी की उपलब्धि देखकर अपने जीवन को छोटा मत समझिए। संभव है आपकी यात्रा अभी उस मोड़ पर हो जहां कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय लिखा जाना बाकी है।

जीवन में कुछ गांठें ऐसी भी होती हैं जिन्हें खोलने में समय लगता है। रिश्तों की गांठ संवाद से खुल सकती है। असफलता की गांठ आत्ममंथन से खुल सकती है। आर्थिक संकट की गांठ योजना और मेहनत से खुल सकती है। करियर की उलझन कौशल और मार्गदर्शन से सुलझ सकती है। मानसिक तनाव में बातचीत, सहयोग और पेशेवर सहायता रास्ता दिखा सकती है।

इसलिए समस्या आने पर खुद को समस्या मत समझिए। समस्या आपके जीवन का एक हिस्सा है, आपका पूरा जीवन नहीं।

हमें अपने आसपास ऐसे वातावरण का निर्माण भी करना होगा जहां संघर्ष कर रहे व्यक्ति का मजाक न उड़ाया जाए। किसी बेरोजगार युवक को निकम्मा कहना, किसी असफल विद्यार्थी को ताना देना, किसी आर्थिक संकट से जूझ रहे व्यक्ति को अपमानित करना या किसी भावनात्मक संकट से गुजर रहे व्यक्ति की भावनाओं को “बहाना” कह देना समस्या को और गहरा कर सकता है। इसके विपरीत संवेदनशील संवाद और समय पर सहायता व्यक्ति को संभलने में मदद कर सकती है।

और यदि कोई व्यक्ति निराशा में जीवन समाप्त करने या स्वयं को नुकसान पहुंचाने की बात करे, तो उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। उसके साथ रहना, ध्यान से सुनना, उसे अकेला न छोड़ना और तत्काल परिवार, चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लेना जरूरी है। WHO स्पष्ट करता है कि ऐसे संकटों में समय पर भावनात्मक सहयोग और पेशेवर सहायता जीवन बचाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

अंततः जीवन का अर्थ यह नहीं कि उसमें कभी धागा उलझे ही नहीं। जीवन की खूबसूरती तो इस बात में है कि जब धागा उलझे, तब हम उसे धैर्य से सुलझाना सीखें और यदि वह टूट जाए तो उसे फिर जोड़ने का साहस रखें।

कभी-कभी टूटा हुआ धागा पहले से अधिक मजबूत गांठ के साथ जुड़ जाता है। उसी प्रकार जीवन के संघर्ष भी व्यक्ति को पहले से अधिक परिपक्व, संवेदनशील और मजबूत बना सकते हैं।

इसलिए आज यदि आपका जीवन उलझा हुआ है तो घबराइए मत। एक कदम पीछे हटिए, परिस्थिति को समझिए, किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात कीजिए, सही मार्गदर्शन लीजिए और सबसे बढ़कर स्वयं पर विश्वास रखिए।

क्योंकि अंधेरा यह साबित नहीं करता कि सुबह नहीं आएगी; वह केवल यह बताता है कि हमें प्रकाश की ओर चलना है।

जीवन का धागा चाहे जितना उलझ जाए, धैर्य उसे सुलझा सकता है; और यदि वह टूट भी जाए, तो विश्वास, प्रेम और प्रयास उसे फिर से जोड़ सकते हैं। यही जीवन की असली जिजीविषा है और यही मनुष्य की सबसे बड़ी जीत।