संपादकीय@हरेश पंवार _6 सितंबर 2026
लोकतंत्र को हम बचपन से एक सरल वाक्य में समझते आए हैं—जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन। यह परिभाषा किताबों में जितनी सुंदर दिखाई देती है, लोकतंत्र के वास्तविक धरातल पर उसकी परीक्षा उतनी ही कठिन है। लोकतंत्र केवल मतदान की मशीन, चुनाव चिह्न और उंगली पर लगी स्याही का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस विश्वास का नाम है, जिसमें नागरिक बिना किसी भय, लालच या दबाव के अपने विवेक से यह तय करता है कि सत्ता की जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए। लेकिन जब इसी पवित्र प्रक्रिया के आसपास शराब, कबाब, धन, दबाव और प्रलोभन का जाल फैलने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या हम लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं या धीरे-धीरे उसके भीतर दुर्व्यसन का जहर घोल रहे हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
चुनाव लोकतंत्र का पर्व है। इस पर्व में प्रत्याशी जनता के बीच जाता है, अपने विचार और योजनाएं रखता है तथा मतदाता अपने अनुभव और विवेक के आधार पर निर्णय करता है। आदर्श स्थिति यही होनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से कई स्थानों पर चुनावी प्रतिस्पर्धा का एक दूसरा चेहरा भी दिखाई देता है, जहां मतदाता के विवेक को प्रभावित करने के लिए शराब, भोजन, नकदी अथवा अन्य प्रलोभनों का सहारा लिया जाता है। निर्वाचन आयोग भी स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी प्रत्याशी के पक्ष या विपक्ष में वोट प्रभावित करने के लिए धन, शराब, नशीले पदार्थ या भोजन का प्रस्ताव स्वीकार करना रिश्वत की श्रेणी में आता है। चुनाव के दौरान शराब परोसने और बांटने पर भी स्पष्ट प्रतिबंध हैं।
विडंबना देखिए कि जिस वोट को संविधान ने नागरिक की शक्ति बनाया, वही वोट कभी-कभी एक बोतल, एक दावत या थोड़े से पैसों के सामने कमजोर पड़ जाता है। मतदाता को यह समझना होगा कि चुनाव के समय मिलने वाला छोटा-सा लाभ पांच वर्ष के शासन का विकल्प नहीं हो सकता। आज कोई आपको कुछ देकर आपका वोट खरीदता है तो कल वही व्यक्ति आपके अधिकारों, आपके विकास और आपके प्रश्नों की कीमत भी अपने हिसाब से तय करने की कोशिश करेगा। जिस जनप्रतिनिधि को जनता ने अपने विवेक से नहीं, बल्कि किसी लालच के कारण चुना हो, उससे ईमानदार और जवाबदेह शासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि धीरे-धीरे ऐसी प्रवृत्तियां सामान्य मान ली जाती हैं। लोग कहने लगते हैं कि चुनाव में यह तो चलता ही है। यही “चलता है” लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता है। जब गलत चीज बार-बार होती है और समाज उसे स्वीकार कर लेता है तो गलत आचरण धीरे-धीरे परंपरा का रूप लेने लगता है। फिर ईमानदार प्रत्याशी स्वयं को कमजोर महसूस करता है और बेईमानी करने वाला व्यक्ति चुनावी रणनीति का माहिर समझा जाने लगता है। यह स्थिति केवल चुनाव को नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की राजनीतिक सोच को भी प्रभावित करती है।
हमें एक क्षण के लिए अपने घर और परिवार की कसौटी पर भी इस समस्या को देखना चाहिए। यदि कोई पिता अपनी बेटी के लिए वर चुनता है तो वह उसके चरित्र, संस्कार, जिम्मेदारी और भविष्य को देखता है। वह यह नहीं कहता कि लड़का शराब पीता है तो कोई बात नहीं, बस आज उसने हमें कुछ खिला-पिला दिया है। हम बेटी का भविष्य नशे और दुर्व्यसन के हवाले नहीं करना चाहते। फिर राजनीति के मामले में हमारी कसौटी क्यों बदल जाती है? यदि हम अपने परिवार के भविष्य के लिए चरित्र देखते हैं तो अपने गांव, वार्ड, शहर और समाज के भविष्य के लिए जनप्रतिनिधि चुनते समय भी चरित्र, ईमानदारी, क्षमता और जनसेवा को ही प्राथमिकता क्यों न दें?
यह सवाल केवल मतदाता से नहीं, प्रत्याशियों से भी है। क्या चुनाव जीतना इतना महत्वपूर्ण है कि उसके लिए लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता कर लिया जाए? यदि कोई प्रत्याशी शराब या अन्य प्रलोभन के सहारे वोट प्राप्त करता है तो उसे स्वयं से पूछना चाहिए कि वह जनता का प्रतिनिधि बनना चाहता है या मतदाताओं की कमजोरी का लाभ उठाकर सत्ता तक पहुंचना चाहता है। लोकतंत्र में जीत महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण जीत का तरीका है। गलत साधनों से मिली जीत लोकतंत्र की उपलब्धि नहीं, लोकतंत्र की पराजय है।
राजनीतिक दलों और प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। निर्वाचन आयोग के मॉडल कोड में मतदाताओं को रिश्वत देने और डराने-धमकाने जैसी गतिविधियों से बचने का स्पष्ट निर्देश है तथा मतदान के दिन और उससे पहले के 48 घंटों में शराब परोसने या बांटने से भी रोक है। लेकिन किसी भी कानून की सफलता केवल सरकारी निगरानी से नहीं होती। समाज की जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि मतदाता स्वयं प्रलोभन लेने से इनकार कर दे तो खरीदने वाले की पूरी रणनीति कमजोर पड़ जाएगी।
इसलिए इस चुनावी पर्व पर हमें एक नया सामाजिक संकल्प लेना होगा—न वोट बिकेगा, न वोट खरीदा जाएगा। न शराब के बदले मतदान होगा, न किसी दबाव में लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल होगा। मतदाता अपने वोट को किसी व्यक्ति की मेहरबानी नहीं, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकार और जिम्मेदारी के रूप में देखे।
लोकतंत्र की पवित्रता केवल चुनाव आयोग, पुलिस या प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। लोकतंत्र की असली सुरक्षा मतदान केंद्र की चारदीवारी से बाहर, मतदाता के विवेक में होती है। जिस दिन मतदाता यह तय कर लेगा कि उसे शराब की बोतल नहीं, अपने बच्चों का भविष्य चुनना है; कुछ समय का लालच नहीं, पांच साल का विकास चुनना है; दबाव नहीं, अपने विवेक की आवाज सुननी है—उस दिन चुनाव की तस्वीर बदलने लगेगी।
आइए, लोकतंत्र के इस पर्व पर इतना संकल्प जरूर लें कि हम शराब पिलाने वाले, वोट खरीदने वाले और मतदाता के विवेक को प्रभावित करने वाले व्यक्ति को केवल इसलिए अपना प्रतिनिधि नहीं बनाएंगे कि उसने चुनाव के समय हमें कुछ दिया था। वोट भी चरित्र देखकर देंगे और समाज की बागडोर भी चरित्रवान हाथों में सौंपेंगे।
क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी में नहीं, सही प्रत्याशी चुनने वाले जागरूक मतदाता में होती है। यदि मतदाता बिकना बंद कर दे तो राजनीति का बाजार अपने आप बदल जाएगा। और जिस दिन वोट की कीमत बोतल, भोजन या नोट से नहीं बल्कि ईमानदारी, योग्यता और जनसेवा से तय होगी, उसी दिन लोकतंत्र वास्तव में जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन कहलाने का अधिकार प्राप्त करेगा।
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दुर्व्यसन से आच्छादित लोकतंत्र
“जिस दिन मतदाता अपने वोट की कीमत पहचान लेता है, उसी दिन राजनीति में बिकने वाली कुर्सियों की कीमत घटने लगती है।”



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