संपादकीय@14 सितंबर 2026
प्रतिस्पर्धा जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब प्रतिस्पर्धा की जगह ईर्ष्या ले लेती है तो संघर्ष स्वस्थ नहीं रहता, बल्कि संबंधों, सामाजिक वातावरण और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भीतर से खोखला करने लगता है। चुनाव लोकतंत्र की वह प्रक्रिया है, जिसमें विचारों, नीतियों, व्यक्तित्व और जनविश्वास के आधार पर जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है। किंतु विडंबना यह है कि आज कई बार प्रतिस्पर्धा का अर्थ प्रतिद्वंद्वी को हराना नहीं, बल्कि उसे नीचा दिखाना समझ लिया जाता है। नगर निकाय चुनावों के दौरान भी अनेक स्थानों पर इसी मानसिकता की झलक देखने को मिली। सवाल केवल यह नहीं कि कौन जीता और कौन हारा, बल्कि यह भी है कि चुनाव के बाद हमारे बीच बचा क्या—प्रतिस्पर्धा की स्वस्थ भावना या ईर्ष्या और कटुता का ऐसा वातावरण, जिसमें पड़ोसी और समर्थक भी एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखने लगें? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज जब चुनाव परिणाम सामने आ रहे हैं, तब प्रत्येक प्रत्याशी और समर्थक के लिए सबसे आवश्यक शब्द है—संयम। परिणाम किसी के लिए उत्सव लेकर आएगा तो किसी के लिए आत्ममंथन का अवसर। जीतने वाले प्रत्याशी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा अब शुरू होगी, क्योंकि चुनाव जीतना नेतृत्व की शुरुआत है, अंत नहीं। जनता ने जिस विश्वास के साथ अपना प्रतिनिधि चुना है, उस विश्वास को निभाने की जिम्मेदारी अब विजेता के कंधों पर है। इसलिए विजय के बाद अहंकार नहीं, आभार होना चाहिए; प्रतिशोध नहीं, अपनत्व होना चाहिए; अपने समर्थकों और विरोधियों में भेद नहीं, बल्कि समान दृष्टि होनी चाहिए।
लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि मत अलग हो सकते हैं, लेकिन समाज अलग-अलग खेमों में स्थायी रूप से नहीं बंट सकता। चुनाव समाप्त होते ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को सामाजिक सौहार्द में बदलना नेतृत्व की पहली कसौटी होनी चाहिए। जिसने आपके पक्ष में मतदान किया, वह भी आपका नागरिक है और जिसने आपके विरोध में मतदान किया, वह भी उतना ही आपका नागरिक है। वास्तव में विजेता वही है जो चुनाव जीतने के बाद अपने विरोधियों का भी विश्वास जीतने की कोशिश करे।
पराजित प्रत्याशियों के लिए परिणाम निराशा का कारण जरूर हो सकता है, लेकिन उसे आत्मपराजय का प्रमाण मान लेना उचित नहीं। चुनाव में हार कई बार व्यक्ति की क्षमता का नहीं, बल्कि रणनीति, संगठन, जनसंपर्क, समय, संदेश और परिस्थितियों के मेल का परिणाम होती है। इसलिए हार के बाद सबसे जरूरी है—आत्मचिंतन और मंथन। स्वयं से पूछा जाना चाहिए कि आखिर जनता के एक हिस्से ने दूसरे विकल्प को क्यों चुना? क्या कहीं संवाद की कमी रही? क्या जनता की समस्याओं को अपेक्षित गंभीरता से नहीं समझा गया? क्या कार्यकर्ताओं और आम मतदाताओं के बीच पर्याप्त संपर्क नहीं बन पाया? क्या व्यवहार में कोई ऐसी कमी रही जिसने लोगों को दूर किया? इन प्रश्नों के ईमानदार उत्तर भविष्य की राजनीति का रास्ता खोल सकते हैं।
राजनीति में अचानक उभरकर लंबे समय तक टिक जाने का विकल्प अब लगभग समाप्त हो चुका है। जननेतृत्व निरंतर संपर्क, सेवा, संघर्ष और विश्वास से निर्मित होता है। जो व्यक्ति चुनाव के समय ही जनता के बीच दिखाई देता है, उसकी तुलना उस व्यक्ति से नहीं की जा सकती जो वर्षों तक बिना किसी पद के भी लोगों के सुख-दुःख में खड़ा रहता है। राजनीति में पद परिणाम हो सकता है, लेकिन जनविश्वास प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
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ऐसे अवसर पर कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की प्रसिद्ध पंक्तियां विशेष अर्थ रखती हैं—“क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं।” इन पंक्तियों को अटल बिहारी वाजपेयी भी सार्वजनिक जीवन में अक्सर उद्धृत करते थे। इनका संदेश स्पष्ट है कि हार और जीत दोनों जीवन की यात्रा के पड़ाव हैं; किसी भी परिणाम से मनुष्य का संतुलन और कर्तव्यबोध विचलित नहीं होना चाहिए।
चुनाव परिणाम के इस अवसर पर सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि जीतने वाले विनम्र रहें और हारने वाले धैर्यवान। समर्थक उत्सव मनाएं, लेकिन किसी की भावनाओं को आहत किए बिना; पराजित पक्ष परिणाम को स्वीकार करे, लेकिन लोकतांत्रिक संघर्ष का रास्ता छोड़े बिना। क्योंकि चुनाव की असली जीत किसी प्रत्याशी की जीत से कहीं बड़ी है—वह है समाज में विश्वास, भाईचारा और लोकतांत्रिक संस्कारों की जीत।
ईर्ष्या व्यक्ति को भीतर से जलाती है, जबकि प्रतिस्पर्धा व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि हम ईर्ष्या को पीछे छोड़कर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को अपनाएं। जीतने वाला जनता का सेवक बने और हारने वाला स्वयं को बेहतर बनाने का संकल्प ले। यही लोकतंत्र की गरिमा है, यही सामाजिक सौहार्द की रक्षा है और यही उस राजनीति की पहचान है, जिसमें व्यक्ति नहीं, बल्कि जनता सर्वोपरि होती है।
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ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से
“जीत का उत्सव मनाइए, लेकिन अहंकार का नहीं; और हार को स्वीकार कीजिए, लेकिन उम्मीद को मत हारिए—क्योंकि चुनाव का परिणाम एक दिन का होता है, जबकि आचरण की पहचान लंबे समय तक लोगों के दिलों में रहती है।”



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