संपादकीय@Haresh Panwar

एक बार एक राजा ने अपने दरबार में घोषणा की कि वह अपने राज्य के सबसे धनी व्यक्ति को सम्मानित करना चाहता है। दरबार में अनेक धनवान व्यापारी आए। तभी एक वृद्ध शिक्षक भी वहां पहुंचे। उनके पास न सोना था, न चांदी और न ही कोई बड़ी संपत्ति। राजा ने पूछा—“आपके पास ऐसी क्या चीज है, जिसके कारण आप स्वयं को सम्मान का अधिकारी समझते हैं?” वृद्ध मुस्कुराए और बोले—“मेरे पास तीन रत्न हैं—ज्ञान, श्रेष्ठ विचार और उत्तम आचरण। पहला मुझे सही रास्ता दिखाता है, दूसरा उस रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है और तीसरा मेरे कदमों को सही दिशा में रखता है।” राजा कुछ क्षण मौन रहा। फिर उसने कहा—“धनवान व्यक्ति के पास संपत्ति है, लेकिन आपके पास वह संपदा है जिसे कोई चुरा नहीं सकता।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यह प्रसंग आज के समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक समाज में सफलता का मूल्यांकन अक्सर धन, पद, प्रतिष्ठा, मकान, वाहन और सुविधाओं से किया जाता है। व्यक्ति कितना कमाता है, उसके पास कितनी संपत्ति है और समाज में उसका कितना प्रभाव है—इन प्रश्नों ने मानो चरित्र, ज्ञान और आचरण को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन जीवन का वास्तविक मूल्य इन बाहरी उपलब्धियों से कहीं अधिक गहरा है। ज्ञान मनुष्य का पहला आभूषण है। ज्ञान केवल पुस्तकों में लिखी सूचनाओं का संग्रह नहीं है। वास्तविक ज्ञान वह है जो मनुष्य को विवेकशील बनाए, सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाए तथा परिस्थितियों को समझने की क्षमता प्रदान करे। डिग्री हासिल कर लेना ज्ञान की पूर्णता नहीं है।

यदि शिक्षा व्यक्ति के भीतर संवेदना, विवेक और जिम्मेदारी पैदा नहीं करती, तो वह शिक्षा अधूरी है। ज्ञान का उद्देश्य केवल अपने जीवन को बेहतर बनाना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी प्रकाश पहुंचाना है। जिस प्रकार दीपक स्वयं जलकर आसपास का अंधकार दूर करता है, उसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति अपने विवेक से समाज को दिशा देता है। लेकिन ज्ञान के बाद दूसरा महत्वपूर्ण रत्न है—श्रेष्ठ विचार। मनुष्य जैसा सोचता है, धीरे-धीरे वैसा ही बनने लगता है। विचार ही व्यवहार की भूमिका तैयार करते हैं और व्यवहार ही चरित्र का निर्माण करता है। यदि मन में घृणा, स्वार्थ, अहंकार और द्वेष भरे हों तो ज्ञान भी कभी-कभी विनाश का साधन बन सकता है। इसके विपरीत करुणा, न्याय, समानता, प्रेम और मानवता से भरे विचार व्यक्ति को समाज के लिए उपयोगी बनाते हैं।


आज सूचना का विस्फोट हो चुका है। मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से मनुष्य कुछ ही सेकंड में हजारों सूचनाएं प्राप्त कर सकता है। लेकिन सूचना और ज्ञान में अंतर है। सूचना बताती है कि क्या हो रहा है; ज्ञान समझाता है कि क्यों हो रहा है; जबकि विवेक यह तय करता है कि हमें क्या करना चाहिए। यही कारण है कि आज के समय में श्रेष्ठ विचारों की आवश्यकता पहले से अधिक है। ज्ञान और विचारों की असली परीक्षा उत्तम आचरण में होती है। कोई व्यक्ति कितना ही विद्वान क्यों न हो, यदि उसके व्यवहार में अहंकार, छल, शोषण और संवेदनहीनता है तो उसकी विद्वता समाज के लिए प्रेरणा नहीं बन सकती। ज्ञान सिर में हो सकता है, विचार मन में हो सकते हैं, लेकिन आचरण ही वह माध्यम है जिसके द्वारा दोनों समाज के सामने दिखाई देते हैं। किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके भाषणों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार से होती है। वह कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है, अपने से छोटे व्यक्ति का कितना सम्मान करता है, संकट में दूसरों के कितने काम आता है और अपने अधिकारों के साथ दूसरों के अधिकारों का कितना सम्मान करता है—यही उसके चरित्र की वास्तविक कसौटी है।


आज समाज के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन विवेक उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहा। शिक्षा बढ़ रही है, लेकिन संवेदनशीलता कई बार घटती दिखाई देती है। सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन संतोष कम होता जा रहा है। संचार के साधन बढ़े हैं, लेकिन संवाद कमजोर हुआ है। ऐसे समय में ज्ञान, श्रेष्ठ विचार और उत्तम आचरण को जीवन का आधार बनाना आवश्यक है। हमें बच्चों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करने की शिक्षा नहीं देनी चाहिए, बल्कि उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि ज्ञान का उपयोग किसके लिए करना है। उन्हें यह समझाना होगा कि सफलता का अर्थ केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि दूसरों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ना भी नहीं है। वास्तविक सफलता वह है जिसमें व्यक्ति अपनी प्रगति के साथ समाज के विकास में भी योगदान देता है। समाज में यदि ज्ञानवान लोग विचारहीन हो जाएं, विचारवान लोग आचरणहीन हो जाएं और चरित्रवान लोग मौन हो जाएं, तो सामाजिक व्यवस्था कमजोर होने लगती है। इसलिए इन तीनों का संतुलन आवश्यक है।


ज्ञान दिशा देता है, श्रेष्ठ विचार उद्देश्य देते हैं और उत्तम आचरण उस उद्देश्य को वास्तविकता में बदलता है। भौतिक संपत्ति जीवन को सुविधाजनक बना सकती है, लेकिन चरित्र ही जीवन को सम्मान देता है। धन समाप्त हो सकता है, पद छिन सकता है और प्रसिद्धि समय के साथ मिट सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति के अच्छे विचार और उत्तम कर्म पीढ़ियों तक याद किए जा सकते हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपनी सफलता की परिभाषा पर पुनर्विचार करें। बच्चों को केवल यह न सिखाएं कि “बड़ा आदमी बनो”, बल्कि यह भी सिखाएं कि “अच्छा इंसान बनो।” क्योंकि बड़ा पद व्यक्ति को ऊंचा दिखा सकता है, लेकिन उत्तम चरित्र ही उसे वास्तव में महान बनाता है। अंततः मनुष्य के पास सबसे मूल्यवान संपत्ति उसका बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि उसका विवेक, विचार और चरित्र है। ज्ञान को अपना दीपक बनाइए, श्रेष्ठ विचारों को अपनी दिशा और उत्तम आचरण को अपनी पहचान। जिस दिन ज्ञान सिर से उतरकर विचारों में और विचार व्यवहार में दिखाई देने लगें, उसी दिन मनुष्य की शिक्षा सार्थक और उसका जीवन वास्तव में सफल माना जाएगा।


भीम प्रज्ञा अलर्ट

“मनुष्य की असली पहचान उसके पास क्या है, इससे नहीं बल्कि वह दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है, इससे होती है। ज्ञान बुद्धि को प्रकाशित करता है, लेकिन विनम्रता उस ज्ञान को सम्मान देती है। इसलिए जीवन में इतना ही ऊंचा उठें कि सफलता सिर पर नहीं, बल्कि संस्कारों में दिखाई दे।”