भीम प्रज्ञा न्यूज.बुहाना। झुंझुनूं जिले का भिर्र गाँव आज भी अपनी गौरवशाली सैनिक परंपरा और अदम्य देशभक्ति के लिए पूरे क्षेत्र में जाना जाता है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तथा उसके बाद के युद्धों तक, इस गाँव के वीरों ने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इन वीर सपूतों की गाथा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। वर्ष 1943 में ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए चन्दगीराम मान, चंद्रा राम मान, गोविन्द राम मान, कालूराम मान और कंहीराम मान ने बाद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आह्वान से प्रेरित होकर आजाद हिंद फौज (INA) का दामन थामा। इन वीरों ने बर्मा मोर्चे पर अंग्रेजी सेना के खिलाफ बहादुरी से युद्ध लड़ा। युद्ध के बाद उन्हें बंदी बनाकर जेल में रखा गया, जहाँ उन्होंने कठिन परिस्थितियों का सामना किया। वर्ष 1946 में रिहाई के बाद वे अपने गाँव लौटे। इन वीरों के योगदान को सरकार ने वर्ष 1972 में मान्यता दी। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देते हुए ताम्रपत्र प्रदान किए गए और सम्मान पेंशन स्वीकृत की गई। चन्दगीराम मान का नाम राष्ट्रीय अभिलेखों में दर्ज होना इस गौरवगाथा का महत्वपूर्ण प्रमाण है। आज इन सभी वीरों का निधन हो चुका है, लेकिन 92 वर्षीय बोदां देवी उनके संघर्ष और उस दौर की स्मृतियों की जीवित साक्षी हैं। उनके पास उस समय से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ सुरक्षित हैं।

भिर्र गाँव देशभर में ‘फौजियों का गाँव’ के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ के युवाओं ने प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध और स्वतंत्रता के बाद हुए लगभग हर युद्ध में भाग लिया। वीरता के लिए अनेक सैनिकों को जंगीनामा, शौर्य चक्र जैसे सम्मान प्राप्त हुए हैं। वर्ष 1971 के युद्ध में शहीद हुए सूबेदार हरफूल सिंह मान और लीलाधर मान के परिजनों को राजस्थान सरकार द्वारा एक-एक मुरब्बा भूमि आवंटित की गई। भिर्र के युवा केवल सेना ही नहीं, बल्कि BSF, CRPF और अन्य पुलिस बलों में भी देश सेवा कर रहे हैं। CRPF में इंस्पेक्टर अंकित मान को छत्तीसगढ़ में उग्रवादियों के खिलाफ बहादुरी दिखाने पर 35 लाख रुपये के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। गाँव के कई परिवार चार-पाँच पीढ़ियों से सेना में सेवा देते आ रहे हैं और साथ ही कृषि कार्य भी कर रहे हैं। यहाँ सिपाही से लेकर मेजर जनरल तक के पदों पर सेवाएँ देने वाले सैनिक मौजूद हैं।

भिर्र के युवाओं ने केवल आजाद हिंद फौज के माध्यम से ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। जून 1946 से 15 अगस्त 1947 तक कर्नल मुरारी राम कौशिक, चन्दगीराम मान और अन्य युवाओं ने प्रजामंडल आंदोलन से जुड़कर ग्रामीणों को संगठित किया। वे जनसभाओं के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना जगाते और स्वतंत्रता के लिए जन-जागरण करते रहे। उनका संपर्क हरियाणा क्षेत्र में चल रहे आंदोलनों से भी रहा। भिर्र के वीरों की यह गाथा केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की राष्ट्रीय चेतना, त्याग और देशभक्ति का जीवंत दस्तावेज है। यह बताती है कि आजादी केवल बड़े नेताओं की नहीं, बल्कि अनगिनत गांवों के गुमनाम सेनानियों के संघर्ष का परिणाम है।

जयदयाल सिंह मान निवासी भिर्र ने बताया कि आजादी के 79वें वर्ष में यह आवश्यक है कि ऐसे स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियाँ केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित न रहें, बल्कि स्कूलों, युवाओं और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचें। भिर्र के वीर सपूतों की यह गाथा हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता अनगिनत बलिदानों की अमूल्य धरोहर है।