संपादकीय@18 सितंबर 2026

कभी परिवार में किसी बुजुर्ग की सबसे बड़ी पहचान उनकी संपत्ति नहीं, उनका अनुभव हुआ करता था। घर के आंगन में बैठा एक वृद्ध व्यक्ति भले ही आर्थिक रूप से साधारण जीवन जीता हो, लेकिन उसके अनुभव की बात ध्यान से सुनी जाती थी। रिश्तों में यह सवाल कम पूछा जाता था कि सामने वाला कितना कमाता है और यह अधिक देखा जाता था कि वह कैसा इंसान है। समय बदला, जीवनशैली बदली, जरूरतें बढ़ीं और धीरे-धीरे रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदलने लगा। आज आधुनिक और भौतिकवादी समाज की एक कड़वी सच्चाई यह है कि कई जगह व्यक्ति के सम्मान का पैमाना उसके संस्कार और चरित्र से अधिक उसकी आवक यानी कमाई बनती जा रही है। सवाल यह है कि जिस समाज में इंसान की कीमत उसके बैंक खाते से तय होने लगे, वहां रिश्तों में अपनत्व कितना शेष रह जाएगा? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

धन जीवन के लिए आवश्यक है। इससे परिवार की जरूरतें पूरी होती हैं, शिक्षा मिलती है, स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होती हैं और भविष्य को सुरक्षित करने में सहायता मिलती है। इसलिए धन को बुरा कहना न तो व्यावहारिक है और न उचित। समस्या धन कमाने में नहीं, बल्कि धन को मनुष्य की योग्यता, सम्मान और रिश्तों का अंतिम पैमाना बना देने में है। जब किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अधिक सम्मान मिलने लगे कि उसकी आय अधिक है और दूसरे व्यक्ति को केवल इसलिए उपेक्षा मिले कि उसकी कमाई कम है, तब समाज की मूल्य-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

विडंबना यह है कि आज कई बार व्यक्ति के व्यवहार से पहले उसकी आर्थिक स्थिति देखी जाती है। जिसके पास महंगी गाड़ी है, बड़ा कारोबार है या जिसकी मासिक आय अच्छी है, उसकी बात को अधिक महत्व मिल जाता है। उसके निर्णयों को सामाजिक स्वीकार्यता आसानी से मिल जाती है। कई बार उसके गलत निर्णयों पर भी लोग चुप रहना पसंद करते हैं। इसके विपरीत आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति यदि कोई सार्थक बात कहे, जीवन का लंबा अनुभव साझा करे या किसी महत्वपूर्ण विषय पर सही सलाह दे, तो उसकी बात को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता। यह मानसिकता केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि सम्मान की असमानता को भी जन्म देती है।

परिवार इस बदलाव का सबसे संवेदनशील स्थान है। माता-पिता ने बच्चों को पालने में अपना जीवन लगा दिया। उन्होंने अपनी इच्छाएं छोड़ीं, कठिनाइयां सहन कीं और बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष किया। लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तब कहीं-कहीं माता-पिता का सम्मान भी उनकी आर्थिक उपयोगिता से जोड़ दिया जाता है। जो संतान अधिक कमाती है, उसकी बात घर में अधिक वजनदार मानी जाती है और जो आर्थिक रूप से संघर्ष कर रही है, उसकी राय को कम महत्व मिल सकता है। यह स्थिति केवल उस व्यक्ति को दुख नहीं देती, बल्कि परिवार के भावनात्मक ताने-बाने को भी कमजोर करती है।

रिश्ता तब रिश्ता नहीं रहता, जब उसमें हर बातचीत के पीछे लाभ-हानि का हिसाब छिपा हो। भाई-भाई के बीच संपत्ति का हिसाब, माता-पिता और संतान के बीच आर्थिक अपेक्षाओं का हिसाब, मित्रता में हैसियत का हिसाब और सामाजिक सम्मान में आय का हिसाब—यदि जीवन के हर संबंध पर यही गणित हावी हो जाए तो मनुष्य के पास सुविधाएं तो बहुत रह सकती हैं, लेकिन आत्मीयता कम होती चली जाएगी।

हमारे समाज की वास्तविक शक्ति कभी केवल धन में नहीं रही। परिवार, पड़ोस, गांव और समुदाय एक-दूसरे के सुख-दुःख में खड़े होने की संस्कृति से मजबूत बने। किसी के घर विवाह हो तो पूरा मोहल्ला सहयोग करता था, किसी के घर बीमारी आए तो लोग हालचाल पूछने पहुंचते थे और किसी परिवार पर संकट आए तो सामूहिक सहयोग उसकी ताकत बन जाता था। उस समय रिश्तों की मुद्रा पैसा नहीं, विश्वास हुआ करता था। आज हमें उसी मानवीय पूंजी को फिर से पहचानने की आवश्यकता है।

यह भी समझना होगा कि अधिक कमाने वाला व्यक्ति आवश्यक रूप से अधिक समझदार, अधिक संस्कारी या अधिक श्रेष्ठ नहीं होता और कम कमाने वाला व्यक्ति किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं हो जाता। आय व्यक्ति की आर्थिक स्थिति बता सकती है, लेकिन उसका चरित्र नहीं। बैंक बैलेंस संपत्ति का संकेत दे सकता है, लेकिन संवेदनशीलता का नहीं। पद सामाजिक हैसियत बता सकता है, लेकिन संस्कारों की गहराई नहीं। असली पहचान इस बात से बनती है कि व्यक्ति अपने से कमजोर के साथ कैसा व्यवहार करता है, अपने माता-पिता के प्रति कितना सम्मान रखता है, कठिन परिस्थिति में कितना धैर्य रखता है और दूसरों के अधिकारों का कितना सम्मान करता है।

धन की अपनी उपयोगिता है, लेकिन धन को रिश्तों का निर्णायक बनाना खतरनाक है। पैसा आज है, कल कम हो सकता है; कारोबार बढ़ सकता है और घट भी सकता है; नौकरी जा सकती है और नई नौकरी मिल सकती है; संपत्ति बन सकती है और परिस्थितियों में बदल भी सकती है। लेकिन यदि पैसे के पीछे भागते-भागते हमने भरोसा, प्रेम और सम्मान खो दिया, तो उस नुकसान की भरपाई किसी बैंक खाते से नहीं हो सकती।

आज जरूरत नई पीढ़ी को यह समझाने की है कि सफलता का अर्थ केवल अधिक कमाना नहीं है। सफल वह भी है जो अपने परिवार को समय देता है, अपने बुजुर्गों का सम्मान करता है, जरूरतमंद के काम आता है और अपनी आर्थिक उपलब्धियों के बावजूद विनम्र बना रहता है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि किसी व्यक्ति का सम्मान उसके कपड़ों, मकान, वाहन या वेतन से नहीं, उसके व्यवहार और चरित्र से किया जाना चाहिए।

समाज में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के प्रति सम्मान केवल दया नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का प्रश्न है। जो व्यक्ति कम कमाता है, हो सकता है उसके पास जीवन का वह अनुभव हो जो करोड़ों रुपये वाला व्यक्ति भी खरीद नहीं सकता। किसी मजदूर के हाथों की मेहनत, किसान के पसीने, शिक्षक के ज्ञान, बुजुर्ग के अनुभव और मां के त्याग का मूल्य किसी वेतन-पर्ची से निर्धारित नहीं किया जा सकता।

रिश्तों को बचाने के लिए हमें अपने भीतर एक छोटा-सा परिवर्तन करना होगा—व्यक्ति की जेब देखने से पहले उसका दिल देखना होगा। उसकी आवक पूछने से पहले उसका हाल पूछना होगा। उसकी संपत्ति जानने से पहले उसके संस्कार पहचानने होंगे। क्योंकि जिस दिन रिश्तों का मूल्यांकन धन से नहीं, इंसानियत से होने लगेगा, उसी दिन परिवारों में फिर से संवाद लौटेगा और समाज में सम्मान की वास्तविक संस्कृति मजबूत होगी।

अंततः धन जीवन की आवश्यकता है, लेकिन रिश्तों की आत्मा नहीं। धन से घर बड़ा हो सकता है, लेकिन अपनत्व नहीं; सुविधाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन सुकून नहीं; पहचान बन सकती है, लेकिन सम्मान नहीं। सच्ची संपन्नता उस व्यक्ति की है जिसके पास कमाई के साथ अच्छे रिश्ते, व्यवहार में विनम्रता और दिल में दूसरों के लिए सम्मान बचा हुआ है।

इसलिए समय की मांग है कि हम आवक के चश्मे से रिश्तों को देखना बंद करें। बच्चों को धन कमाने की शिक्षा के साथ रिश्ते निभाने की शिक्षा दें, बुजुर्गों को उनकी संपत्ति नहीं बल्कि उनके अनुभव के कारण सम्मान दें और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को उसकी परिस्थिति नहीं, उसकी इंसानियत के आधार पर देखें। आखिर पैसा जीवन को चलाने का साधन हो सकता है, लेकिन जीवन को अर्थ देने वाली असली पूंजी आज भी प्रेम, सम्मान, विश्वास और अपनत्व ही है।