संपादकीय@17 सितंबर 2026
चुनाव जीतना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जनादेश को खरीदने की राजनीति लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे बड़ा सवाल है।
राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यहां जो दिखाई देता है, वह हमेशा वैसा होता नहीं और जो भीतर चल रहा होता है, वह अक्सर दिखाई नहीं देता। राजनीति संभावनाओं का खेल जरूर है, लेकिन जब संभावनाओं की जगह जोड़-तोड़, स्वार्थ और धनबल लेने लगे तो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। चुनाव के दौरान जनता के दरवाजे पर जाकर वोट मांगने वाला प्रत्याशी जब चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि बनता है, तब वह केवल किसी राजनीतिक दल या समर्थक समूह का सदस्य नहीं रहता, बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था का हिस्सा बन जाता है। संविधान का 74वां संशोधन नगरपालिकाओं को स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के रूप में स्थापित करता है और नगरपालिकाओं के निर्वाचित सदस्यों के माध्यम से स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने की परिकल्पना करता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
लेकिन सवाल तब पैदा होता है, जब पार्षदों के चुनाव के बाद अध्यक्ष या सभापति की कुर्सी के लिए ऐसी राजनीतिक गतिविधियों की चर्चा होने लगे, जिन्हें आम बोलचाल में ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ कहा जाता है। किसी विशेष मामले में धन के लेन-देन का प्रमाण सामने आए बिना उसे तथ्य नहीं कहा जा सकता, लेकिन यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को प्रभावित करने के लिए खरीद-फरोख्त, दबाव या प्रलोभन के आरोप सामने आते हैं तो यह केवल राजनीतिक दलों का आंतरिक मामला नहीं रह जाता। यह उस मतदाता के विश्वास से जुड़ा प्रश्न बन जाता है, जिसने अपने मत से प्रतिनिधि चुनकर नगरपालिका में भेजा है।
विडंबना देखिए—जनता एक पार्षद को चुनने के लिए घर से निकलती है, धूप में कतार लगाती है, अपने विवेक से मतदान करती है और उम्मीद करती है कि उसका चुना हुआ प्रतिनिधि उसके मोहल्ले की सड़क, नाली, पानी, सफाई, रोशनी और नागरिक सुविधाओं की आवाज बनेगा। लेकिन यदि चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण इस तरह बदलने लगें कि जनता का दिया हुआ जनादेश केवल सत्ता की गणित का एक अंक बन जाए, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर मतदाता की भूमिका कितनी रह गई?
राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि उसमें संघर्ष है। संघर्ष तो लोकतंत्र की आत्मा है। असली संकट तब पैदा होता है जब विचारों की प्रतिस्पर्धा की जगह धन की प्रतिस्पर्धा और जनसेवा की जगह कुर्सी की प्रतिस्पर्धा ले लेती है। लोकतंत्र में बहुमत प्राप्त करना वैध राजनीतिक उद्देश्य है, लेकिन बहुमत बनाने के तरीके लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर होने चाहिए।
आज जरूरत राजनीतिक नैतिकता की उस पाठशाला को फिर से जीवित करने की है, जिसमें राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि सार्वजनिक सेवा का माध्यम समझा जाता था। राजनीति में सिद्धांतों का महत्व तभी है, जब सिद्धांत कठिन परिस्थितियों में भी व्यवहार में दिखाई दें। भाषणों में ईमानदारी, पारदर्शिता और जनसेवा की बातें करना आसान है; असली परीक्षा तब होती है जब सामने सत्ता की कुर्सी हो और उसे पाने के लिए समझौते का रास्ता खुला हो।
सबसे बड़ा प्रश्न राजनीतिक दलों से भी है। यदि कोई दल लोकतंत्र, पारदर्शिता और जनसेवा का दावा करता है, तो उसे अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति भी उतनी ही नैतिक जवाबदेही दिखानी चाहिए। टिकट वितरण से लेकर चुनाव परिणाम और उसके बाद स्थानीय निकायों में नेतृत्व चयन तक प्रत्येक स्तर पर पारदर्शिता लोकतांत्रिक विश्वास को मजबूत करती है। राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर का कोई भी राजनीतिक संगठन अपने आकार के कारण नैतिकता से ऊपर नहीं हो सकता। लोकतंत्र में बड़ा संगठन होने से बड़ी जिम्मेदारी आती है, छूट नहीं।
लेकिन दोष केवल राजनीतिक दलों के सिर डालकर जनता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती। मतदाता भी लोकतंत्र की पहली और अंतिम कड़ी है। यदि वोट देते समय जाति, व्यक्तिगत लाभ, तत्काल प्रलोभन या दबाव को प्राथमिकता मिले और ईमानदार, सक्षम तथा सार्वजनिक हित को महत्व देने वाले उम्मीदवार को केवल इसलिए नजरअंदाज कर दिया जाए कि वह चुनावी खर्च की दौड़ में पीछे है, तो धीरे-धीरे राजनीति में धनबल की भूमिका बढ़ने का रास्ता बनता है। मतदाता जिस राजनीतिक संस्कृति को स्वीकार करता है, वही संस्कृति आगे चलकर उसके सामने शासन और प्रतिनिधित्व के रूप में लौटती है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि ‘जनप्रतिनिधि बिकते हैं या नहीं?’ प्रश्न यह भी है कि क्या हमारा लोकतांत्रिक समाज ऐसी राजनीति को स्वीकार करने से इनकार करने के लिए तैयार है? यदि जनता चुनाव के समय प्रत्याशी से पूछ सकती है कि पांच साल में क्या करेंगे, तो चुनाव के बाद भी वह यह पूछ सकती है कि आपने किसके हित में निर्णय लिया और क्यों लिया। स्थानीय लोकतंत्र की ताकत केवल मतदान पेटी में नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की निरंतर निगरानी में भी है।
और यदि किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के विरुद्ध वास्तव में रिश्वत, दबाव या अवैध खरीद-फरोख्त का कोई ठोस प्रमाण हो, तो उसका रास्ता केवल राजनीतिक चर्चा नहीं बल्कि उपलब्ध कानूनी और संस्थागत प्रक्रियाओं से होकर जाना चाहिए। आरोपों की राजनीति से अलग प्रमाण, शिकायत और विधिसम्मत जांच ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है।
नगरपालिका की कुर्सी कोई निजी दुकान नहीं है, जिसे धन लगाकर खरीदा जाए और फिर जनता के संसाधनों से उसका मूल्य वसूल किया जाए। वह सार्वजनिक पद है। वहां बैठने वाला व्यक्ति करदाताओं के पैसे, नगर की संपत्ति और नागरिकों की अपेक्षाओं का संरक्षक होता है। इसलिए नेतृत्व का मूल्य उसकी कुर्सी की कीमत से नहीं, उसके कार्यकाल की पारदर्शिता और जनहित से तय होना चाहिए।
राजनीति में धन की भूमिका को पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं, लेकिन धन को लोकतांत्रिक निर्णयों का निर्णायक आधार बनने से रोकना राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों, प्रशासन और जनता—सभी की साझा जिम्मेदारी है। संविधान ने नगरपालिकाओं को स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं के रूप में मान्यता दी है; इसलिए उनका लोकतांत्रिक चरित्र केवल चुनाव कराने से पूरा नहीं होता। निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
आज आवश्यकता किसी एक दल या व्यक्ति को कठघरे में खड़ा करने से ज्यादा उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल उठाने की है, जिसमें कुर्सी साध्य और जनता साधन बन जाए। लोकतंत्र तब मजबूत होगा, जब चुनाव में पैसा नहीं, जनता का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होगा; जब पार्षद अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह होगा; जब राजनीतिक दल सत्ता के लिए नहीं, सार्वजनिक हित के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे और जब जीत के बाद भी जनादेश को अपनी निजी संपत्ति नहीं समझा जाएगा।
क्योंकि अंततः सवाल कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति का नहीं, उस कुर्सी की गरिमा का है। जनता ने प्रतिनिधि चुना है, मालिक नहीं; जनादेश दिया है, बिकाऊ अधिकार नहीं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी रक्षा यही है कि मत की कीमत बाजार तय न करे और जनता के विश्वास की बोली कोई राजनीतिक मंडी न लगा सके।
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लोकतंत्र की मंडी में जनादेश की बोली तो नहीं लग रही?
“जनता का दिया हुआ जनादेश किसी राजनीतिक सौदे की वस्तु नहीं, बल्कि विश्वास की अमानत है; जो इस अमानत की कीमत लगाता है, वह कुर्सी तो पा सकता है, लेकिन जनविश्वास नहीं।”



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