संपादकीय@28 सितम्बर 2017

राजस्थान में पंचायती राज चुनाव की तैयारियों के बीच आरक्षण की लॉटरी निकल चुकी है और अब चुनाव कार्यक्रम की प्रतीक्षा है। गांवों में संभावित प्रत्याशियों की चर्चाएं तेज हैं, राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं और आरक्षित सीटों पर दावेदारी को लेकर उत्सुकता बढ़ रही है। लेकिन इसी चुनावी हलचल के बीच राजस्थान के सीमावर्ती जिलों में एक ऐसा प्रश्न खड़ा हो गया है, जिसे केवल किसी एक महिला की चुनावी दावेदारी का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह प्रश्न है—यदि कोई महिला दूसरे राज्य में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के परिवार में जन्मी, उसी सामाजिक वर्ग की पहचान के साथ पली-बढ़ी और विवाह के बाद भी उसी सामाजिक वर्ग के परिवार में राजस्थान आकर वर्षों से रह रही है, तो केवल राज्य की सीमा बदल जाने से उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अधिकार क्यों समाप्त हो जाना चाहिए? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यह प्रश्न 24 सितंबर 2020 के राजस्थान उच्च न्यायालय के उस निर्णय के बाद विशेष महत्व रखता है, जिसमें दूसरे राज्यों से विवाह के बाद राजस्थान आई महिलाओं को राजस्थान के पंचायत चुनावों में आरक्षण का लाभ देने से इनकार किया गया था। संबंधित याचिकाओं में यह तथ्य भी न्यायालय के सामने था कि याचिकाकर्ताएं अपने मूल राज्यों में आरक्षित वर्ग से थीं और विवाह के बाद राजस्थान में ऐसे परिवारों में रह रही थीं, जिनकी सामाजिक श्रेणी भी उनके मूल वर्ग से समान थी। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित राज्य-विशिष्ट अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की व्यवस्था को आधार बनाकर पंचायत चुनाव में आरक्षण का दावा स्वीकार नहीं किया। साथ ही यह भी कहा कि ऐसे प्रवासी व्यक्तियों को सीमित प्रयोजनों के लिए जाति प्रमाण-पत्र दिया जा सकता है, लेकिन उससे राजस्थान में आरक्षण का दावा नहीं बनता।

न्यायालय के सामने कानून की अपनी बाध्यता थी और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी स्पष्ट प्रभाव था। रंजना कुमारी बनाम उत्तराखंड राज्य में सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब की वाल्मीकि महिला के मामले में कहा था कि पंजाब में अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त होने मात्र से उत्तराखंड में उसी जाति के नाम से अनुसूचित जाति आरक्षण का दावा स्वतः नहीं बनता, भले ही वह जाति उत्तराखंड की अनुसूचित जाति सूची में भी शामिल हो। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले के संविधान पीठ के निर्णयों का अनुसरण करते हुए राज्य-विशिष्ट सूची के सिद्धांत को दोहराया था।

लेकिन मुद्दे पर प्रश्न यहीं से शुरू होता है—क्या राज्य-विशिष्ट आरक्षण की यह व्यवस्था विवाह के बाद दूसरे राज्य में रहने वाली महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न का पूर्ण और अंतिम समाधान है?

संविधान का अनुच्छेद 14 प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। वहीं अनुच्छेद 15(1) राज्य को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर नागरिक के साथ भेदभाव करने से रोकता है। इसलिए यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी महिला की सामाजिक पहचान, पारिवारिक स्थिति और सामाजिक जीवन विवाह के बाद भी उसी वंचित समुदाय में बना रहता है, तो केवल उसके जन्मस्थान और वर्तमान निवास के अलग-अलग राज्यों में होने को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न में कितना निर्णायक माना जाना चाहिए?

यहां संविधान के अनुच्छेद 243-घ को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पंचायतों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण तथा उन आरक्षित सीटों में महिलाओं के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान इसी अनुच्छेद में है। महिलाओं के लिए पंचायतों में प्रतिनिधित्व का उद्देश्य केवल चुनावी औपचारिकता नहीं, बल्कि स्थानीय शासन में ऐतिहासिक रूप से कम प्रतिनिधित्व रखने वाले वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। संविधान स्वयं पंचायतों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित प्रतिनिधित्व का प्रावधान करता है।

तो फिर सवाल यह है कि जिस महिला को सामाजिक रूप से उसी समुदाय का हिस्सा मानकर वह परिवार अपना रहा है, जिसका पति उसी वर्ग से संबंधित है, जो वर्षों से उसी गांव में रह रही है और उसी समुदाय के सुख-दुख में सहभागी है, उसकी राजनीतिक पहचान केवल इस आधार पर क्यों बदल जाए कि उसका जन्म राजस्थान की सीमा के बाहर हुआ था?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर भी समझना होगा। राज्य-विशिष्ट अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सूची का सिद्धांत अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सामाजिक वास्तविकता का प्रश्न अपनी जगह है। न्यायालय ने जिस संवैधानिक व्यवस्था की व्याख्या की, वह आरक्षण के राज्य-विशिष्ट ढांचे से जुड़ी है। परंतु समाज बदल रहा है। अंतरराज्यीय विवाह बढ़ रहे हैं, सीमावर्ती गांवों में सामाजिक और वैवाहिक संबंध प्रशासनिक सीमाओं से कहीं पुराने हैं और अनेक परिवार पीढ़ियों से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ऐसे में कानून और सामाजिक वास्तविकता के बीच पैदा हो रहे अंतर पर पुनर्विचार का प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

यहां यह तर्क भी सामने आता है कि यदि विवाह के बाद दूसरे राज्य में पहुंची महिला को पंचायत चुनाव के आरक्षित प्रतिनिधित्व से बाहर रखा जाता है, तो क्या वह हर दूसरे कानूनी संदर्भ में भी अपने मूल सामाजिक वर्ग से बाहर मानी जाएगी? इसका उत्तर सीधा “हां” नहीं है। पंचायत चुनाव में आरक्षण की पात्रता और किसी अन्य कानून के अंतर्गत संरक्षण दो अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के विरुद्ध अत्याचारों की रोकथाम तथा पीड़ितों को संरक्षण, राहत और पुनर्वास प्रदान करना है। इसलिए किसी महिला का पंचायत आरक्षण के लिए पात्र न होना अपने आप यह निष्कर्ष नहीं देता कि वह हर परिस्थिति में उस कानून के संरक्षण से भी बाहर हो गई।

लेकिन यही अंतर इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है। यदि कानून के अलग-अलग क्षेत्रों में किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को अलग-अलग तरीके से देखा जाता है, तो नागरिक के सामने स्पष्टता का प्रश्न खड़ा होता है। क्या एक महिला पंचायत चुनाव में “राजस्थान की आरक्षित श्रेणी” की पात्र नहीं है, लेकिन किसी अन्य कानूनी संरक्षण में उसकी सामाजिक पहचान अलग तरीके से देखी जा सकती है? यदि हां, तो सरकार और निर्वाचन व्यवस्था को नागरिकों के सामने यह अंतर साफ-साफ समझाना चाहिए। वरना न्यायिक निर्णय की अलग-अलग व्याख्याओं से भविष्य में नए विवाद पैदा हो सकते हैं।

सबसे गंभीर सवाल महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का है। पंचायत केवल गांव की छोटी सरकार नहीं है। वह लोकतंत्र की पहली पाठशाला है। यहां चुना गया प्रतिनिधि सड़क, पानी, शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण और स्थानीय विकास से जुड़े फैसलों में भाग लेता है। संविधान ने महिलाओं को पंचायतों में प्रतिनिधित्व देने के लिए विशेष व्यवस्था इसलिए बनाई है ताकि लोकतंत्र में वे केवल मतदाता बनकर न रहें, बल्कि निर्णय लेने वाली संस्था का हिस्सा भी बनें।

ऐसे में यदि विवाह के बाद दूसरे राज्य से आई महिला वर्षों से राजस्थान के गांव में रह रही है, उसका परिवार और सामाजिक जीवन वहीं है, लेकिन उसे केवल मूल राज्य की वजह से आरक्षित पंचायत सीट से चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिलता, तो इस व्यवस्था के सामाजिक प्रभाव पर विचार होनाथ चाहिए। यह कहना न्यायालय के निर्णय को असंवैधानिक घोषित करना नहीं है; बल्कि यह पूछना है कि क्या वर्तमान कानूनी ढांचा बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त है?

राजस्थान के गंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर, धौलपुर, झुंझुनूं, सीकर, चित्तौड़गढ़ सहित अनेक सीमावर्ती क्षेत्रों में यह प्रश्न विशेष संवेदनशील हो सकता है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात से वैवाहिक संबंध रखने वाले परिवारों में ऐसी महिलाएं मिल सकती हैं, जो विवाह के बाद लंबे समय से राजस्थान में रह रही हैं। इसलिए यह विषय किसी एक जिले या किसी एक चुनाव तक सीमित नहीं है।

इस समय सबसे आवश्यक काम किसी महिला को चुनाव लड़ने से रोकने या किसी विशेष वर्ग को लाभ पहुंचाने की राजनीतिक बहस खड़ी करना नहीं, बल्कि कानूनी स्थिति को चुनाव से पहले पूरी तरह स्पष्ट करना है। राज्य निर्वाचन आयोग, पंचायती राज विभाग और राज्य सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए कि दूसरे राज्य से विवाह के बाद राजस्थान में आई महिलाओं की पंचायत चुनाव में आरक्षण संबंधी पात्रता किस आधार पर निर्धारित होगी। यदि वर्तमान न्यायिक व्यवस्था के कारण आरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने की पात्रता नहीं बनती, तो उसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। और यदि सरकार या समाज को लगता है कि इस व्यवस्था में कोई नीति संबंधी कमी है, तो उसके समाधान के लिए विधायी अथवा संवैधानिक रास्ते पर विचार किया जाए।

लोकतंत्र में न्यायालय के निर्णय का सम्मान आवश्यक है, लेकिन लोकतंत्र में कानून पर प्रश्न पूछने और कानून की सामाजिक परिणतियों पर चर्चा करने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। न्यायिक निर्णय अंतिम व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है, लेकिन सामाजिक विमर्श को समाप्त नहीं करता। जब कोई व्यवस्था बड़ी संख्या में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने की संभावना पैदा करे, तब यह पूछना लोकतांत्रिक दायित्व है कि क्या उसके पीछे का उद्देश्य और उसका सामाजिक परिणाम एक-दूसरे के अनुरूप हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि अनुच्छेद 14 केवल समानता की बात करता है; जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव के निषेध का विशिष्ट प्रावधान अनुच्छेद 15 में है। इसलिए इस मुद्दे की संवैधानिक बहस को सही प्रावधानों के साथ रखना आवश्यक है। साथ ही पंचायत आरक्षण को सीधे “मौलिक अधिकार” कहना भी कानूनी दृष्टि से सावधानी मांगता है; इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 243-घ में है।

आखिर सवाल किसी एक महिला की उम्मीदवारी का नहीं है। सवाल यह है कि क्या विवाह के बाद राज्य की सीमा पार करने वाली महिला की सामाजिक पहचान को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए इतना कमजोर मान लिया जाए कि उसके वर्षों के सामाजिक जीवन, पारिवारिक संबंध और समुदाय में उसकी वास्तविक भागीदारी का कोई महत्व ही न रहे?

कानून यदि ऐसी सीमा निर्धारित करता है तो उसका पालन होगा, लेकिन लोकतंत्र का दायित्व यहीं समाप्त नहीं होता। जहां कानून और बदलती सामाजिक वास्तविकता के बीच दूरी दिखाई दे, वहां समाज को प्रश्न पूछना चाहिए, सरकार को स्पष्टीकरण देना चाहिए और आवश्यकता हो तो विधायिका को समाधान तलाशना चाहिए।

राज्य की सीमा नक्शे पर खींची हुई रेखा हो सकती है, लेकिन विवाह के बाद किसी महिला का सामाजिक जीवन उस रेखा से कहीं अधिक व्यापक होता है। इसलिए पंचायत चुनावों से पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि प्रतिनिधित्व का दरवाजा केवल जन्मस्थान देखकर बंद होगा या वर्षों से उस गांव में रह रही महिला की सामाजिक भागीदारी को भी कोई स्थान मिलेगा। यही प्रश्न आज राजस्थान के सीमावर्ती गांवों में उठ रहा है और इसका उत्तर केवल चुनावी अधिसूचना से नहीं, बल्कि स्पष्ट कानून, संवैधानिक विमर्श और सामाजिक न्याय की दृष्टि से देना होगा।