भीम प्रज्ञा न्यूज़ सिंघाना
प्रशासनिक लापरवाही या गफलती अनदेखी जनता का बड़ा सवाल
सिंघाना पंचायत समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायत पचेरी खुर्द में आरक्षण को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत गठन और आरक्षण व्यवस्था लागू होने के बाद से करीब 31 वर्षों में एक बार भी पचेरी खुर्द को अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित नहीं किया गया, जबकि वर्ष 2026 की आरक्षण लॉटरी में भी पंचायत को सामान्य वर्ग में रख दिया गया। ग्रामीणों के अनुसार पचेरी खुर्द में अनुसूचित जाति वर्ग के करीब 415 मतदाता हैं, जिनका प्रतिनिधित्व के अवसर से लगातार वंचित रहना गंभीर सामाजिक एवं प्रशासनिक प्रश्न खड़ा करता है।
2020 की लॉटरी बनी विवाद की सबसे बड़ी वजह
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2020 की आरक्षण लॉटरी में पचेरी खुर्द का नाम पहली बार अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आया था। लेकिन लॉटरी के बाद हुए पंचायत पुनर्गठन में राजस्व गांव माजरी को पचेरी खुर्द से अलग कर मुरादपुर ग्राम पंचायत में शामिल कर दिया गया। अन्य नवसृजित ग्राम पंचायत होने की वजह से आरक्षण कोटा नवसृजित पंचायत से पूरा हो गया और रोस्टर की वरीयता क्रम में पचेरी खुर्द आरक्षित ग्राम पंचायत नहीं बन सकी।ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद पचेरी खुर्द में हुए चुनाव सामान्य वर्ग की सीट पर हुए और अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिल सका।
यहीं से वर्तमान विवाद की मूल वजह सामने आती है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब 2020 में आरक्षण की अधिसूचना के बावजूद चुनाव आरक्षित सीट पर हुआ ही नहीं, तो उस वर्ष को अनुसूचित जाति आरक्षण का चक्र पूर्ण मानने का आधार क्या है?
परिसीमन के बाद फिर लौटा माजरी, फिर भी नहीं बदला आरक्षण गणित
ग्रामीणों के अनुसार इस बार परिसीमन में माजरी गांव को पुनः पचेरी खुर्द में शामिल किया गया है। उनका कहना है कि इससे 2020 में आरक्षण के समय पैदा हुई परिस्थितियां भी बदल गई हैं। ऐसे में पुराने आरक्षण चक्र को यथावत मानने के बजाय वर्तमान परिसीमन, जनसंख्या और आरक्षण रोस्टर के आधार पर पचेरी खुर्द की स्थिति पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए था।
ग्रामीणों का दावा है कि अनुसूचित जाति आबादी के अनुपात, पंचायत की वर्तमान स्थिति तथा लंबे समय से आरक्षण से वंचित रहने के आधार पर पचेरी खुर्द को वरीयता मिलनी चाहिए थी। इसके बावजूद 24 सितंबर 2026 को बुहाना उपखंड अधिकारी शकुंतला की मौजूदगी में सिंघाना पंचायत समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायतों के आरक्षण की लॉटरी में पचेरी खुर्द को सामान्य वर्ग में रखा गया।
‘आरक्षण मिला नहीं, फिर चक्र पूरा कैसे?’
पचेरी खुर्द के ग्रामीणों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वर्ष 2020 में पंचायत को अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित किया गया था, लेकिन पुनर्गठन के कारण दोबारा आरक्षण लॉटरी निकाली गई और पचेरी खुर्द ग्राम पंचायत को उस आरक्षण का वास्तविक चुनावी लाभ नहीं मिला, तो उसे आरक्षण चक्र में पूर्ण अवसर कैसे माना जा सकता है?
ग्रामीणों का कहना है कि आरक्षण का उद्देश्य केवल कागज पर किसी पंचायत के सामने ‘एससी’ लिख देना नहीं, बल्कि संबंधित वर्ग को वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अवसर उपलब्ध कराना है। यदि आरक्षण घोषित होने के बाद परिस्थितियों के कारण उस वर्ग को चुनाव लड़ने और प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का अवसर ही नहीं मिला, तो उस अवधि को वास्तविक प्रतिनिधित्व का अवसर मानना सामाजिक न्याय की भावना के अनुरूप है या नहीं—यह सवाल अब प्रशासन के सामने है।
रोस्टर और समान अवसर को लेकर उठे गंभीर सवाल
ग्रामीणों ने इस पूरे मामले को संविधान के समानता के सिद्धांत और अवसर की समानता से जोड़ते हुए आपत्ति जताई है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की बात करता है, जबकि पंचायती राज संस्थाओं में आरक्षण का संवैधानिक ढांचा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधानों पर आधारित है।
हालांकि, पचेरी खुर्द को 2026 में किस श्रेणी में आरक्षित किया जाना चाहिए था, इसका अंतिम निर्धारण संबंधित राजस्थान पंचायती राज नियमों, लागू आरक्षण रोस्टर, जनसंख्या आंकड़ों और प्रशासन द्वारा अपनाई गई गणना-पद्धति के आधार पर ही किया जा सकता है। इसलिए ग्रामीणों की आपत्ति की वास्तविक कानूनी स्थिति का परीक्षण सक्षम प्रशासनिक अथवा न्यायिक प्राधिकारी द्वारा किया जाना महत्वपूर्ण होगा।
कलेक्टर को पहले ही दी थी शिकायत, फिर भी नहीं बदली स्थिति
ग्रामीणों के अनुसार उन्होंने आरक्षण लॉटरी से पहले ही जिला कलेक्टर झुंझुनूं को लिखित शिकायत देकर पचेरी खुर्द के आरक्षण रोस्टर पर पुनर्विचार की मांग की थी। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत के बावजूद 24 सितंबर की लॉटरी में उनकी आपत्ति का समाधान नहीं हुआ।
अब ग्रामीणों ने राज्य निर्वाचन आयोग और संबंधित उच्च अधिकारियों से पूरे मामले की जांच कराने तथा आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया और रोस्टर की पुनः समीक्षा करने की मांग की है।
31 साल का इंतजार या रोस्टर की तकनीकी लापरवाही?
पचेरी खुर्द का विवाद अब केवल एक ग्राम पंचायत की आरक्षण श्रेणी का मामला नहीं रह गया है। यह सवाल भी सामने आ रहा है कि आरक्षण रोस्टर में किसी पंचायत का चक्र कब पूर्ण माना जाएगा—आरक्षण घोषित होने से या उस आरक्षण के आधार पर वास्तविक चुनाव और प्रतिनिधित्व होने से?
यदि प्रशासन के रिकॉर्ड में वर्ष 2020 का आरक्षण चक्र पूर्ण माना गया है, तो उसके पीछे लागू नियम और रोस्टर की गणना क्या है, यह स्पष्ट किया जाना ग्रामीणों की आपत्ति के समाधान के लिए महत्वपूर्ण होगा। दूसरी ओर, यदि ग्रामीणों की आपत्ति में तथ्यात्मक आधार पाया जाता है, तो आरक्षण निर्धारण की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता पर विचार किया जा सकता है।
अब नजर प्रशासनिक निर्णय पर
पचेरी खुर्द के ग्रामीणों की मांग है कि 2026 की आरक्षण लॉटरी से जुड़े रिकॉर्ड, वर्ष 2020 की आरक्षण स्थिति, बाद में हुए पंचायत पुनर्गठन, वर्तमान परिसीमन तथा अनुसूचित जाति आबादी के आंकड़ों की निष्पक्ष जांच कराई जाए। ग्रामीण चाहते हैं कि यदि रोस्टर निर्धारण में कोई विसंगति सामने आती है तो नियमानुसार संशोधित कार्रवाई की जाए और लंबे समय से प्रतिनिधित्व के अवसर से वंचित वर्ग को उसका संवैधानिक एवं कानूनी अधिकार मिले।
अब पचेरी खुर्द के 415 अनुसूचित जाति मतदाताओं की निगाह प्रशासन के अगले कदम पर टिकी है। सवाल सीधा है—यदि 2020 का आरक्षण वास्तविक चुनावी अवसर में तब्दील नहीं हुआ था, तो क्या उसे आरक्षण चक्र की पूर्णता माना जा सकता है? इसी सवाल के जवाब में पचेरी खुर्द के 31 साल पुराने इंतजार की अगली दिशा तय होगी।


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