संपादकीय@Haresh Panwar

एक गांव में एक बुजुर्ग शिक्षक से किसी ने पूछा—“अगर किसी अपराध के लिए बहुत कठोर सजा का कानून बना दिया जाए तो क्या अपराध अपने आप खत्म हो जाएंगे?” शिक्षक ने पास रखी एक मजबूत लोहे की तिजोरी की ओर इशारा करते हुए कहा—“तिजोरी कितनी भी मजबूत क्यों न हो, अगर उसकी चाबी हर किसी के हाथ में हो और पहरेदार सो रहा हो, तो उसकी मजबूती किसी काम की नहीं।” फिर उन्होंने कहा—“कानून भी ऐसा ही है। कानून की किताब में लिखी कठोर सजा तभी समाज को सुरक्षा दे सकती है, जब कानून का निष्पक्ष और प्रभावी ढंग से पालन हो, पीड़ित की आवाज सुनी जाए और अपराध करने वाले को यह भरोसा हो कि वह अपने कृत्य की जवाबदेही से बच नहीं पाएगा।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज के समाज के सामने यही एक गंभीर सवाल खड़ा है कि जब महिलाओं, बच्चों और वंचित वर्गों की सुरक्षा के लिए अनेक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, तब भी असुरक्षा की घटनाएं क्यों सामने आती रहती हैं? देश में यौन अपराधों, बच्चों के खिलाफ अपराधों और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार से निपटने के लिए कठोर कानूनी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन किसी कानून की शक्ति केवल उसके कठोर शब्दों से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। विडंबना यह है कि अपराध होने के बाद अक्सर बहस इस बात पर केंद्रित हो जाती है कि कानून और अधिक कठोर होना चाहिए या नहीं। लेकिन उससे पहले यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि जो कानून पहले से मौजूद हैं, उनका पालन किस स्तर तक हो रहा है? जांच कितनी निष्पक्ष और समयबद्ध है? पीड़ित और गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा मिल रही है या नहीं? अभियोजन की गुणवत्ता कैसी है? अदालतों में मामलों के निस्तारण में कितना समय लग रहा है? इन सवालों के जवाब किसी भी समाज की वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था को समझने में अधिक महत्वपूर्ण हैं। कठोर कानून निश्चित रूप से आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन केवल कठोरता अपराध रोकने का अकेला उपाय नहीं है।

अपराधी के मन में कानून का भय तभी प्रभावी रूप से पैदा होता है, जब उसे यह विश्वास हो कि अपराध के बाद जांच होगी, साक्ष्य जुटेंगे, मुकदमा निष्पक्ष रूप से चलेगा और दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार दंड मिलेगा। दूसरी ओर, यदि किसी व्यक्ति को यह भरोसा हो जाए कि प्रक्रिया में लापरवाही, देरी या प्रभाव के कारण वह जवाबदेही से बच सकता है, तो कानून की कठोरता का निवारक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। लेकिन समस्या केवल पुलिस, अदालत और कानून की व्यवस्था तक सीमित नहीं है। समाज की मानसिकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। महिलाओं और वंचित समुदायों के प्रति सम्मान केवल कानून के डर से पैदा नहीं किया जा सकता। सम्मान संस्कारों, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार से पैदा होता है। यदि घर में बेटा और बेटी के लिए अलग-अलग मानदंड बनाए जाते हैं, यदि स्कूल में समानता केवल पाठ्य पुस्तक का विषय रह जाती है और यदि कार्यस्थल पर पद या शक्ति के आधार पर किसी की गरिमा कम या ज्यादा आंकी जाती है, तो कानून अकेला समाज को बदलने में सक्षम नहीं होगा। सबसे पीड़ादायक स्थिति तब बनती है, जब अपराध का सामना कर चुके व्यक्ति को ही समाज के सवालों का सामना करना पड़ता है। “तुम वहां क्यों गई थीं?”, “तुमने पहले शिकायत क्यों नहीं की?”, “लोग क्या कहेंगे?” जैसे सवाल पीड़ित के दर्द को और गहरा कर सकते हैं।

किसी अपराध की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर नहीं डाली जानी चाहिए जिसके साथ अपराध हुआ है। समाज का दायित्व है कि वह पीड़ित को दोष देने के बजाय उसे न्याय और सम्मान दिलाने में साथ खड़ा हो। बच्चों के मामले में तो जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्हें केवल कानून की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह सिखाना भी जरूरी है कि अच्छा स्पर्श और बुरा स्पर्श क्या है, असहज स्थिति में किससे मदद मांगनी है और किसी विश्वसनीय वयस्क को अपनी बात बताने में डरना नहीं चाहिए। इसी तरह माता-पिता, शिक्षक और संस्थानों को बच्चों की सुरक्षा को केवल घटना के बाद की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिम्मेदारी के रूप में देखना होगा। वंचित और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के प्रश्न में भी यही बात लागू होती है। कानून उन्हें विशेष संरक्षण देता है, लेकिन वास्तविक समानता तभी मजबूत होगी जब उन्हें थाने, प्रशासन, शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक जीवन में सम्मानजनक व्यवहार मिले। कानून का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि नागरिकों के भीतर यह विश्वास पैदा करना भी है कि व्यवस्था उनके अधिकारों की रक्षा के लिए खड़ी है। यहां मीडिया और समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

अपराध की खबर सामने लाना पत्रकारिता का आवश्यक दायित्व है, लेकिन पीड़ित की पहचान, गरिमा और निजता की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। सनसनी पैदा करने के बजाय तथ्य, जवाबदेही और न्याय की प्रक्रिया पर ध्यान देना समाज को अधिक जिम्मेदार बनाता है। समस्या का समाधान किसी एक संस्था के पास नहीं है। पुलिस को बेहतर जांच और संवेदनशील व्यवहार की आवश्यकता है, अभियोजन को मजबूत करने की जरूरत है, अदालतों में लंबित मामलों के समयबद्ध निस्तारण की दिशा में प्रयास आवश्यक हैं, गवाहों और पीड़ितों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी और स्कूल से परिवार तक समानता एवं सम्मान की संस्कृति विकसित करनी होगी। साथ ही, झूठे आरोपों की स्थिति में निष्पक्ष प्रक्रिया और आरोपी के कानूनी अधिकारों की रक्षा भी न्याय व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है।

न्याय तभी सार्थक है, जब वह पीड़ित की सुरक्षा और आरोपी के विधिसम्मत अधिकार—दोनों को निष्पक्ष प्रक्रिया के भीतर संतुलित करे। अंततः हमें यह समझना होगा कि सुरक्षित समाज केवल कठोर कानूनों से नहीं बनता। सुरक्षित समाज वह है जहां कानून का पालन निश्चित हो, न्याय तक पहुंच आसान हो, संस्थाएं जवाबदेह हों और नागरिकों की सोच में मानव गरिमा सर्वोच्च मूल्य बने। कानून अपराध के बाद न्याय का रास्ता दिखा सकता है, लेकिन अपराध रोकने के लिए परिवार, शिक्षा, समाज और संस्थाओं को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहां किसी की कमजोरी उसका शोषण करने का अवसर न बने। कानून की धार जितनी जरूरी है, उससे कहीं अधिक जरूरी है उसका निष्पक्ष क्रियान्वयन और समाज की संवेदनशील चेतना। जिस दिन पीड़ित को चुप रहने की सलाह देने के बजाय उसके साथ खड़े होने की संस्कृति मजबूत होगी और अपराधी को कानून से बच निकलने की उम्मीद के बजाय जवाबदेही का भरोसा होगा, उसी दिन सुरक्षा केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार में भी दिखाई देने लगेगी।