भीम प्रज्ञा न्यूज़.बुहाना @हरेश पंवार 
बुहाना उपखंड क्षेत्र में पंचायत राज संस्थाओं के आरक्षण की 24 सितंबर 2026 को निकाली गई लॉटरी अब गंभीर सवालों के घेरे में आती दिखाई दे रही है। पंचायत समिति बुहाना की 30 और पंचायत समिति सिंघाना की 22 ग्राम पंचायतों के लिए निकाली गई आरक्षण लॉटरी के बाद पहले पचेरी खुर्द का मामला सामने आया और अब अन्य ग्राम पंचायतों से भी ऐसी ही आपत्तियां उठने लगी हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कुछ ऐसी पंचायतों को अगले आरक्षण चक्र में डाल दिया गया, जिन्हें उनके अनुसार पहले रोस्टर चक्र में ही आरक्षण का वास्तविक अवसर नहीं मिला था। ग्रामीणों की मुख्य आपत्ति यह है कि यदि पूर्ववर्ती रोस्टर चक्र में किसी ग्राम पंचायत को आरक्षण का वास्तविक लाभ नहीं मिला, तो उसे ‘रोस्टर चक्र पूर्ण’ मानकर अगले चक्र में कैसे पहुंचाया जा सकता है? उनका कहना है कि इस सवाल का स्पष्ट, नियम आधारित और पंचायतवार जवाब प्रशासन को सार्वजनिक करना चाहिए।हालांकि, प्रशासन द्वारा आरक्षण निर्धारण किस नियम, अधिसूचना और रोस्टर गणना के आधार पर किया गया, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों के बिना नहीं की जा सकती। इसलिए ग्रामीणों के आरोपों और प्रशासनिक रिकॉर्ड—दोनों का परीक्षण जरूरी है।

पचेरी खुर्द के बाद सामने आया गादली और थली का मामला

पंचायत समिति सिंघाना की ग्राम पंचायत पचेरी खुर्द को लेकर ग्रामीण पहले ही आपत्ति दर्ज करा चुके हैं। ग्रामीणों के अनुसार यहां 415 अनुसूचित जाति मतदाता हैं और पंचायत लंबे समय से एससी आरक्षण से वंचित रही है। ग्रामीणों का दावा है कि वर्ष 2020 में पचेरी खुर्द का नाम एससी आरक्षण में आया था, लेकिन बाद में पंचायत पुनर्गठन में माजरी गांव को अलग कर दूसरी पंचायत में शामिल कर दिया गया और चुनाव सामान्य श्रेणी में हुआ। इसी आधार पर ग्रामीण पूछ रहे हैं कि 2020 का आरक्षण चक्र पूर्ण कैसे माना गया। अब पंचायत समिति सिंघाना की ग्राम पंचायत थली के 288 एससी मतदाताओं तथा पंचायत समिति बुहाना की ग्राम पंचायत गादली के 782 एससी मतदाताओं के मामले को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार गादली को वर्ष 2020 के दौरान बने आरक्षण क्रम में अपेक्षित अवसर नहीं मिला और अब उसे दूसरे चक्र में शामिल कर दिया गया। उनका कहना है कि पहले चक्र में छूटी पंचायतों की स्थिति स्पष्ट किए बिना नए चक्र की शुरुआत करना रोस्टर की मूल भावना पर सवाल खड़ा करता है।

सवाल यह नहीं कि कौन-सी पंचायत आरक्षित हुई, सवाल यह कि रोस्टर चला कैसे?

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु किसी एक पंचायत को एससी आरक्षण मिलने या नहीं मिलने से आगे बढ़कर रोस्टर की गणना और क्रम की पारदर्शिता से जुड़ा है।ग्रामीणों का कहना है कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य संबंधित वर्गों को जनसंख्या और लागू नियमों के अनुरूप राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अवसर उपलब्ध कराना है। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है और राज्य के पंचायती राज प्रशिक्षण संस्थान के आधिकारिक विवरण में भी इस व्यवस्था का उल्लेख है। ऐसे में ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन केवल आरक्षण की अंतिम सूची जारी करने के बजाय पंचायतवार रोस्टर की पूरी गणना सार्वजनिक करे—किस पंचायत को किस वर्ष कौन-सा आरक्षण मिला, किस पंचायत का चक्र पूर्ण माना गया, किसे अगले चक्र में भेजा गया और उसका आधार क्या रहा।

2020 में बदला परिसीमन, फिर पुराने रोस्टर की गणना क्यों?

ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2020 में बुहाना पंचायत समिति का पुनर्गठन कर सिंघाना पंचायत समिति गठित की गई। इसी दौरान क्षेत्र की कुछ पंचायतों को नगर पालिका का स्वरूप भी मिला। इसके बाद हाल के पंचायत परिसीमन में ग्राम पंचायतों और पंचायत समिति क्षेत्रों की सीमाओं में पुनः बदलाव हुआ।

यहीं से आरक्षण गणना को लेकर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।

ग्रामीणों का तर्क है कि जब पंचायतों की भौगोलिक संरचना, ग्रामों का समावेश और पंचायतों की संख्या तक बदली है, तो पुराने रोस्टर को वर्तमान संरचना पर लागू करने का आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए। यदि प्रशासन ने इसके लिए कोई विशेष नियम या अधिसूचना लागू की है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि ग्रामीणों की आपत्तियों का तथ्यात्मक समाधान हो सके।

राजनीतिक दबाव में लॉटरी’ का आरोप, लेकिन प्रमाण की जरूरत

कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि उपखंड स्तर पर आरक्षण प्रक्रिया में राजनीतिक दबाव अथवा प्रभाव की भूमिका रही और कुछ जनप्रतिनिधियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से नियमों की अनदेखी की गई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे गंभीर आरोपों की स्थिति में सबसे उचित रास्ता यही है कि प्रशासन लॉटरी की पूरी कार्यवाही, रोस्टर रजिस्टर, संबंधित जनसंख्या आंकड़े, पूर्व आरक्षण की स्थिति और पंचायतवार वरीयता सूची सार्वजनिक करे। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि आरक्षण नियमों के अनुसार हुआ या कहीं गणना में वास्तविक त्रुटि हुई।

जनसंख्या के आंकड़े और वरीयता क्रम भी जांच के केंद्र में

ग्रामीणों का कहना है कि एससी-एसटी आरक्षण के निर्धारण में संबंधित पंचायतों की जनसंख्या और लागू वरीयता/रोस्टर प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल मौजूदा मतदाताओं की संख्या देखकर आरक्षण तय होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता; प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि किस आधिकारिक जनसंख्या आधार और किस रोस्टर पद्धति से आरक्षण निर्धारित किया गया। यही वजह है कि पचेरी खुर्द के 415, थली के 288 और गादली के 782 एससी मतदाताओं की संख्या को ग्रामीण प्रतिनिधित्व के सवाल के रूप में सामने रख रहे हैं, लेकिन इन आंकड़ों के आधार पर अपने-आप किसी पंचायत का आरक्षण तय होना जरूरी नहीं है।

शकलेक्टर को शिकायत के बाद भी नहीं मिला संतोषजनक जवाब

ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने लॉटरी से पहले ही जिला कलेक्टर झुंझुनूं और संबंधित अधिकारियों को अपनी आपत्तियों से अवगत कराया था। इसके बावजूद 24 सितंबर को आरक्षण लॉटरी जारी कर दी गई। अब ग्रामीणों की मांग है कि लॉटरी की प्रक्रिया की उच्च स्तर पर समीक्षा कराई जाए और यदि किसी पंचायत का पहला रोस्टर चक्र वास्तव में पूरा नहीं हुआ था, तो उस स्थिति को रिकॉर्ड में शामिल करते हुए नियमानुसार सुधार किया जाए।

शहाईकोर्ट जाने की तैयारी की चर्चा

मामला अब प्रशासनिक शिकायत से आगे बढ़कर कानूनी स्तर तक जाने की संभावना भी पैदा कर रहा है। ग्रामीणों की ओर से यह बात सामने आई है कि यदि प्रशासनिक स्तर पर समाधान नहीं हुआ तो वे उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर आरक्षण लॉटरी पर रोक अथवा न्यायिक हस्तक्षेप की मांग कर सकते हैं। हालांकि किसी न्यायालय से राहत मिलने की संभावना या लॉटरी पर रोक लगेगी या नहीं, इस संबंध में अभी कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यह संबंधित याचिका, दस्तावेजों और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों पर निर्भर करेगा।

अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल—रोस्टर की पूरी किताब खोलिए

बुहाना और सिंघाना पंचायत समितियों की आरक्षण लॉटरी को लेकर उठे सवालों का समाधान राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और नियमों को सार्वजनिक करने से होगा।

प्रशासन यदि पंचायतवार एक स्पष्ट विवरण जारी कर दे कि—

किस पंचायत को 1995 से अब तक कब-कब कौन सा आरक्षण मिला, 2020 में किस पंचायत का कौन सा रोस्टर था, पुनर्गठन के बाद उसकी स्थिति क्या बनी, वर्तमान परिसीमन में उसकी जनसंख्या कितनी है और 2026 की लॉटरी में किस नियम के तहत उसे कौन-सी श्रेणी दी गई— तो अधिकांश विवाद स्वतः स्पष्ट हो सकता है। राजस्थान सरकार का पंचायती राज प्रशिक्षण संस्थान भी पंचायती राज अधिनियम एवं नियमों को अपने प्रशिक्षण विषयों में शामिल करता है, जिससे यह स्पष्ट है कि पंचायत चुनाव और आरक्षण व्यवस्था नियमबद्ध प्रक्रिया का विषय है।

अब मुद्दा किसी एक पंचायत का नहीं, पारदर्शी रोस्टर का है

पचेरी खुर्द, थली और गादली के मामलों ने बुहाना उपखंड की आरक्षण लॉटरी को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। 415, 288 और 782—ये केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उन परिवारों और मतदाताओं की संख्या हैं जो अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अवसर को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यदि प्रशासन का रोस्टर नियमों के अनुरूप है तो उसे दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक करके ग्रामीणों की शंकाओं का समाधान किया जाना चाहिए। और यदि जांच में किसी स्तर पर गणना अथवा प्रक्रिया संबंधी त्रुटि सामने आती है, तो नियमों के अनुसार सुधार करना ही प्रशासनिक जवाबदेही का हिस्सा होगा। बुहाना-सिंघाना की आरक्षण लॉटरी अब महज एक सरकारी प्रक्रिया नहीं रह गई है—यह पारदर्शिता, रोस्टर की विश्वसनीयता और पंचायत राज में समान राजनीतिक अवसर के सवाल की परीक्षा बन चुकी है।