संपादकीय@ हरेश पंवार_12 अक्टूबर 2026
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अपने जीवन में प्रेम, सम्मान, विश्वास और आत्मीयता की अपेक्षा करता है। उसे अच्छा लगता है जब कोई उसकी उपलब्धियों की प्रशंसा करता है, उसकी भावनाओं को समझता है और उसके संघर्षों का सम्मान करता है। लेकिन आज के सामाजिक जीवन की एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि कई बार जो लोग सामने हमारी तारीफों के पुल बांधते हैं, वही पीठ पीछे हमारी कमियां गिनाने और हमारी छवि खराब करने में पीछे नहीं रहते। उनके शब्दों में मिठास होती है, व्यवहार में अपनापन दिखाई देता है, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में व्यक्त होने वाले विचार उनके वास्तविक दृष्टिकोण को उजागर कर देते हैं। यही दोहरा व्यवहार रिश्तों की विश्वसनीयता को कमजोर करता है और समाज में अविश्वास की दीवार खड़ी करता है। प्रश्न यह है कि आखिर हम ऐसा समाज क्यों बनते जा रहे हैं, जहाँ सच बोलने से अधिक महत्वपूर्ण दूसरों को खुश रखना और अपनी वास्तविक भावनाओं को छिपाना हो गया है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
वास्तव में सामने प्रशंसा और पीछे निंदा करने की प्रवृत्ति के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं। कहीं यह ईर्ष्या का परिणाम होती है, कहीं व्यक्तिगत स्वार्थ का, तो कहीं सामाजिक संबंध बिगड़ने के डर का। कुछ लोग किसी व्यक्ति की सफलता को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते। वे सामने उसकी उपलब्धियों की प्रशंसा करते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर उससे अपनी तुलना करते रहते हैं। जब उन्हें लगता है कि दूसरा व्यक्ति उनसे आगे निकल रहा है, तो वे उसकी मेहनत और योग्यता को स्वीकार करने के बजाय उसकी कमियां खोजने लगते हैं। कुछ लोग अपने हित साधने के लिए प्रशंसा का सहारा लेते हैं, जबकि कुछ लोग किसी का सामना करके अपनी असहमति व्यक्त करने का साहस नहीं जुटा पाते। कारण चाहे जो भी हो, जब प्रशंसा ईमानदार भावना के बजाय स्वार्थ का माध्यम बन जाती है, तब संबंधों की नींव कमजोर होने लगती है।
आज यह प्रवृत्ति केवल व्यक्तिगत रिश्तों तक सीमित नहीं है। सामाजिक संगठनों, राजनीतिक गतिविधियों, व्यावसायिक संस्थानों और सार्वजनिक जीवन में भी इसकी झलक दिखाई देती है। किसी व्यक्ति की उपस्थिति में उसके विचारों का समर्थन करना और उसके जाते ही उन्हीं विचारों का उपहास उड़ाना सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। लोग कई बार व्यक्ति के गुणों की सराहना इसलिए करते हैं, क्योंकि उससे उन्हें कोई लाभ मिलने की उम्मीद होती है। लाभ की संभावना समाप्त होते ही व्यवहार बदल जाता है। ऐसे संबंधों में आत्मीयता कम और अवसरवादिता अधिक दिखाई देती है। यह स्थिति समाज के लिए चिंताजनक है, क्योंकि जब शब्दों और वास्तविक भावनाओं के बीच अंतर बढ़ने लगता है, तब व्यक्ति के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि किस पर विश्वास किया जाए।
हालाँकि, इस पूरे विषय को केवल दूसरों की बुराई करने वालों तक सीमित करके देखना भी उचित नहीं होगा। हमें अपने व्यवहार का मूल्यांकन भी करना चाहिए। क्या हम स्वयं किसी व्यक्ति के सामने उसकी प्रशंसा और अनुपस्थिति में उसकी निंदा नहीं करते? क्या हम किसी की सफलता देखकर प्रसन्न होते हैं, या मन ही मन उससे अपनी तुलना करने लगते हैं? क्या हम किसी की गलती को सुधारने की भावना से बताते हैं, या उसे छोटा साबित करने के लिए उसकी कमजोरी का प्रचार करते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर हमारे सामाजिक चरित्र का वास्तविक परिचय देते हैं। दूसरों के दोहरे व्यवहार पर नाराज होना आसान है, लेकिन अपने भीतर मौजूद ईर्ष्या, पूर्वाग्रह और दिखावे को पहचानना अधिक कठिन है। सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत दूसरों को कटघरे में खड़ा करने से नहीं, बल्कि स्वयं को ईमानदारी से परखने से होती है।
यहाँ आलोचना और निंदा के बीच अंतर समझना भी आवश्यक है। हर आलोचना गलत नहीं होती और हर प्रशंसा सच्ची नहीं होती। आलोचना तब उपयोगी होती है, जब उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति की गलती बताकर सुधार का अवसर देना हो। इसके विपरीत, निंदा तब विनाशकारी बन जाती है, जब उसका उद्देश्य अपमान करना, प्रतिष्ठा गिराना या व्यक्तिगत द्वेष निकालना हो। यदि कोई व्यक्ति हमारी कमियों की ओर ध्यान दिलाता है, तो हमें केवल इस कारण नाराज नहीं होना चाहिए कि उसने हमारी प्रशंसा नहीं की। संभव है कि उसकी बात में कोई सच्चाई हो। लेकिन यदि कोई व्यक्ति झूठी बातें फैलाकर हमारी छवि खराब करने का प्रयास करता है, तो उसे रचनात्मक आलोचना नहीं कहा जा सकता। समझदारी इसी में है कि हम प्रत्येक प्रतिक्रिया को विवेक की कसौटी पर परखें और उचित बात स्वीकार करने का साहस रखें।
संत कबीरदास ने कहा था, "निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।" इस दोहे का व्यापक संदेश यह है कि आलोचना करने वाला व्यक्ति हमारी कमियों से परिचित करा सकता है और आत्मसुधार का अवसर दे सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर निंदा करने वाला हमारा हितैषी ही होता है। आलोचना के पीछे की भावना, उसके तथ्य और उसके उद्देश्य को समझना आवश्यक है। जो व्यक्ति हमारी गलती सामने बताता है और सुधार का रास्ता सुझाता है, वह हमारे लिए उपयोगी हो सकता है। वहीं, जो व्यक्ति जानबूझकर अपमान करता है या झूठ फैलाता है, उससे उचित दूरी बनाए रखना समझदारी है। हमें न तो हर आलोचक को शत्रु मानना चाहिए और न ही हर प्रशंसा करने वाले को अपना सच्चा मित्र समझ लेना चाहिए।
वर्तमान समय में सोशल मीडिया ने भी इस दोहरे व्यवहार को नए रूप दिए हैं। सार्वजनिक मंचों पर लोग एक-दूसरे की प्रशंसा करते दिखाई देते हैं, लेकिन निजी समूहों और बातचीत में वही लोग कटु टिप्पणियाँ करने लगते हैं। किसी की सफलता पर बधाई देना आसान है, लेकिन उसकी उपलब्धि को ईमानदारी से स्वीकार करना हर किसी के लिए सहज नहीं होता। इसी प्रकार किसी की गलती पर सार्वजनिक रूप से उपहास उड़ाने के बजाय उससे सीधे और सम्मानजनक ढंग से बात करना अधिक जिम्मेदार व्यवहार है। हमें यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति उसे अपमानित करने की स्वतंत्रता नहीं देती। उसकी गरिमा का सम्मान करना भी हमारे चरित्र का हिस्सा होना चाहिए।
समाज को अधिक विश्वसनीय और संवेदनशील बनाने के लिए आवश्यक है कि हम स्पष्टवादिता को अपमान और चापलूसी को सद्भावना समझने की भूल न करें। यदि किसी से असहमति है, तो उसके सामने शालीनता से अपनी बात रखी जानी चाहिए। यदि कोई गुण प्रशंसनीय है, तो उसकी प्रशंसा बिना किसी स्वार्थ के की जानी चाहिए। यदि कोई गलती है, तो उसे सुधार की भावना से बताया जाना चाहिए। रिश्तों की मजबूती इस बात में नहीं है कि हम हमेशा एक-दूसरे की तारीफ करते रहें, बल्कि इस बात में है कि हम असहमति के बावजूद ईमानदार और सम्मानजनक बने रहें।
अंततः, दुनिया में हर व्यक्ति हमारी प्रशंसा करे, यह संभव नहीं है और न ही आवश्यक। हमारा मूल्य दूसरों के शब्दों से तय नहीं होता, बल्कि हमारे विचारों, कर्मों और व्यवहार से निर्धारित होता है। इसलिए झूठी तारीफों से अत्यधिक प्रभावित होने और पीठ पीछे होने वाली हर चर्चा से विचलित होने के बजाय हमें अपने चरित्र और कार्यों पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, हमें भी ऐसी प्रवृत्ति से बचना चाहिए, जिसमें सामने मिठास और पीछे कटुता हो। याद रखिए, सच्चा व्यक्ति वह नहीं जो हर समय आपकी प्रशंसा करे, बल्कि वह है जो आपके सामने सच बोलने का साहस रखे और आपकी अनुपस्थिति में भी आपकी गरिमा का सम्मान करे। समाज में विश्वास तभी मजबूत होगा, जब हमारी जुबान, हमारे विचार और हमारे व्यवहार के बीच दूरी कम होगी। यही ईमानदार संबंधों और स्वस्थ सामाजिक चेतना की बुनियाद है।
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सामने तारीफों के पुल, पीठ पीछे बुराई—समाज के दोहरे चरित्र का आईना
आज का मौलिक विचार “सामने तारीफ करना शिष्टाचार हो सकता है, लेकिन पीठ पीछे सम्मान बनाए रखना चरित्र की असली पहचान है।”



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