संपादकीय@हरेश पंवार _13 अक्टूबर 2026

राजस्थान में पंचायती राज चुनावों की आहट के साथ ही गांवों की चौपालें सजने लगी हैं। कहीं सरपंच बनने के सपने बुने जा रहे हैं, कहीं समर्थकों की गिनती हो रही है, तो कहीं जातीय समीकरणों और चुनावी रणनीतियों पर माथापच्ची चल रही है। कोई विकास के दावे कर रहा है, कोई जनसेवा का संकल्प दोहरा रहा है और कोई गांव की तस्वीर बदलने का भरोसा दिला रहा है। लेकिन यदि इस चुनावी माहौल में किसी संभावित प्रत्याशी से पूछ लिया जाए कि सरपंच बनने की सबसे बड़ी योग्यता क्या है, तो संभव है कि वह शिक्षा, सामाजिक समझ, ईमानदारी, नेतृत्व क्षमता और विकास की दृष्टि जैसे गुण गिनाने लगे। मगर जरा ठहरिए! इन तमाम खूबियों की चर्चा से पहले एक अदद शौचालय का हिसाब भी तो देना पड़ेगा। जी हां, व्यंग्य की भाषा में कहें तो गांव की सरकार में प्रवेश का एक ऐसा दरवाजा भी है, जिसके सामने बड़े-बड़े चुनावी दावे धरे रह सकते हैं—और वह है घर में शौचालय की अनिवार्य शर्त, जहाँ लागू हो। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि जनता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करती है, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए कानून द्वारा निर्धारित योग्यताओं और अयोग्यताओं का भी अपना महत्व है। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों को लेकर शिक्षा और दो से अधिक संतान जैसी कुछ पुरानी अयोग्यताओं को हटाए जाने के बाद यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है कि जनप्रतिनिधि बनने की वास्तविक कसौटी आखिर क्या होनी चाहिए? क्या किसी व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता, सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता, वित्तीय पारदर्शिता, कानून की समझ और गांव के विकास का दृष्टिकोण अधिक महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए? और यदि घर में शौचालय की उपलब्धता को पात्रता की शर्त बनाया जाता है, तो यह भी विचारणीय है कि इस एक कसौटी से किसी व्यक्ति की समग्र नेतृत्व क्षमता का कितना आकलन किया जा सकता है।

व्यंग्य का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि चुनाव में प्रत्याशी को जनता से यह साबित करना है कि वह गांव की समस्याओं का समाधान कर सकता है, लेकिन उसे अपने घर के शौचालय से जुड़ी निर्धारित शर्तों का अनुपालन भी सुनिश्चित करना होगा। अब कल्पना कीजिए कि कोई प्रत्याशी गांव की सड़क, नाली, पेयजल, विद्यालय, स्वास्थ्य सेवाओं और बेरोजगारी पर शानदार भाषण दे रहा है, लेकिन नामांकन के समय उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि उसके घर में शौचालय से संबंधित कानूनी शर्तें पूरी होती हों। लोकतंत्र की इस तस्वीर में हास्य भी है और एक गंभीर प्रश्न भी—क्या हम जनप्रतिनिधि चुनने की प्रक्रिया में प्रतीकात्मक पात्रताओं को इतना महत्व दे रहे हैं कि शासन चलाने की वास्तविक योग्यता पर चर्चा पीछे छूट जाती है?

यहाँ स्पष्ट होना चाहिए कि शौचालय कोई छोटी आवश्यकता नहीं है। स्वच्छता, स्वास्थ्य, महिलाओं की गरिमा और खुले में शौच से मुक्ति के लिए शौचालयों की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण है। सरकारों द्वारा स्वच्छता को बढ़ावा देना और ग्रामीण परिवारों को शौचालय निर्माण के लिए प्रोत्साहित करना जनहित का आवश्यक कार्य है। लेकिन जब स्वच्छता के लक्ष्य को चुनावी पात्रता से जोड़ा जाता है, तब उस व्यवस्था के औचित्य, वर्तमान कानूनी स्थिति और व्यावहारिक प्रभाव पर चर्चा भी जरूरी हो जाती है। किसी प्रत्याशी के घर में शौचालय होना स्वच्छता के प्रति जिम्मेदारी का संकेत हो सकता है, लेकिन क्या केवल इसी आधार पर यह मान लिया जाए कि वह भ्रष्टाचार नहीं करेगा, जनता की समस्याएँ समझेगा और पंचायत के धन का सदुपयोग करेगा? शौचालय की दीवारें पक्की हो सकती हैं, दरवाजा मजबूत हो सकता है और पानी की व्यवस्था भी बेहतर हो सकती है, लेकिन इससे प्रत्याशी के चरित्र, विवेक और प्रशासनिक क्षमता की गारंटी नहीं मिलती।

दूसरी ओर, कोई व्यक्ति शिक्षित हो या कम पढ़ा-लिखा, उसके पास राजनीतिक अनुभव हो या न हो, वह चुनाव लड़ने की अन्य निर्धारित शर्तें पूरी करता हो या नहीं—इन सभी प्रश्नों का उत्तर संबंधित कानून से ही तय होगा। किसी विशेष योग्यता या अयोग्यता के बारे में अनुमान लगाकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। चुनावी पात्रता के मामले में कानून की वर्तमान स्थिति, लागू प्रावधानों और संबंधित न्यायिक निर्णयों को देखना जरूरी है। नामांकन पत्र में किसी जानकारी का मांगा जाना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि वह शर्त आज भी हर स्थिति में अनिवार्य अयोग्यता है। इसलिए प्रत्याशियों और मतदाताओं को अफवाहों के बजाय आधिकारिक नियमों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

फिर भी इस व्यवस्था पर व्यंग्य का अधिकार और उसकी आवश्यकता दोनों बने रहते हैं। आखिर पंचायत केवल शौचालयों की गिनती करने वाली संस्था नहीं, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र की बुनियादी इकाई है। उसे गांव के विकास की प्राथमिकताएँ तय करनी हैं, सार्वजनिक धन का हिसाब रखना है, पात्र लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ पहुँचाना है और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज बनना है। पंचायत प्रतिनिधि को यह समझना चाहिए कि सरकारी योजना का पैसा निजी लाभ का साधन नहीं, बल्कि जनता की अमानत है। उसे जाति, धर्म, व्यक्तिगत संबंधों और राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर निर्णय लेने चाहिए। ऐसे दायित्वों को निभाने के लिए केवल औपचारिक पात्रता नहीं, बल्कि ईमानदारी, संवेदनशीलता, जवाबदेही और जनहित की स्पष्ट दृष्टि भी आवश्यक है।

विडंबना यह है कि चुनाव के दौरान प्रत्याशी अपने घर के शौचालय से लेकर गांव के विकास तक हर मुद्दे पर प्रमाण और वादे प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं, लेकिन मतदाताओं के सामने यह प्रश्न अक्सर कमजोर पड़ जाता है कि चुने जाने के बाद वे ग्राम पंचायत के कामकाज में कितनी पारदर्शिता रखेंगे। कितने प्रत्याशी ग्रामसभा की नियमित बैठकों, सामाजिक अंकेक्षण, सार्वजनिक बजट और विकास कार्यों की गुणवत्ता को अपनी प्राथमिकता बनाते हैं? कितने लोग पंचायत के प्रत्येक निर्णय में वंचितों, महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और जरूरतमंद परिवारों की भागीदारी सुनिश्चित करेंगे? लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा इन सवालों से होती है, न कि केवल चुनावी मंच पर दिए गए भाषणों से।

हमारा उद्देश्य शौचालय की अनिवार्यता का उपहास उड़ाकर स्वच्छता के महत्व को कम करना नहीं, बल्कि चुनावी पात्रता और जनप्रतिनिधि की वास्तविक योग्यता के बीच के अंतर पर विचार करना है। स्वच्छता आवश्यक है, लेकिन सुशासन भी उतना ही आवश्यक है। घर में शौचालय होना अच्छी बात है, पर पंचायत के कामकाज में ईमानदारी, सार्वजनिक धन की रक्षा और जनता के प्रति जवाबदेही भी होनी चाहिए। जिस प्रकार शौचालय के निर्माण में गुणवत्ता और उपयोगिता देखी जाती है, उसी प्रकार गांव की सड़क, नाली, विद्यालय, जलापूर्ति और सरकारी भवनों के निर्माण में भी गुणवत्ता की कसौटी लागू होनी चाहिए।

अंततः, पंचायत चुनाव केवल पद प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की परीक्षा हैं। मतदाताओं को प्रत्याशी की जाति, धनबल, बाहुबल और चुनावी दिखावे से आगे बढ़कर उसकी नीयत, कार्यक्षमता, सामाजिक संवेदनशीलता और सार्वजनिक जीवन के आचरण पर विचार करना चाहिए। कानून द्वारा निर्धारित पात्रताओं का पालन अनिवार्य है, लेकिन लोकतंत्र की सफलता इससे कहीं आगे जाती है।

क्योंकि सरपंच के घर में शौचालय होना स्वच्छता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, मगर उसके मन में जनसेवा, निर्णयों में निष्पक्षता और कार्यों में ईमानदारी होना गांव के भविष्य के लिए उससे भी बड़ी आवश्यकता है। दीवारों से शौचालय बनते हैं, लेकिन अच्छी पंचायत का निर्माण विचारों, जिम्मेदारी और जनविश्वास से होता है।