संपादकीय@हरेश पंवार _14 अक्टूबर 2026
दूध बेचने वाला घर-घर जाकर ग्राहक तलाशता है, अपनी गुणवत्ता साबित करता है और कीमत बताते समय मोलभाव भी सुनता है। दूसरी ओर, शराब की दुकान पर पहुंचने वाला ग्राहक अक्सर ब्रांड का नाम बताता है, पैसे चुकाता है और बिना किसी बहस के लौट जाता है। दूध महंगा होने पर लोग विरोध करते हैं, लेकिन शराब निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर मिलने पर भी अनेक लोग चुप्पी साध लेते हैं। दूध और शराब की यह तुलना केवल दो वस्तुओं की कीमतों का अंतर नहीं, बल्कि समाज की प्राथमिकताओं पर एक तीखा सवाल है। मगर राजस्थान में पंचायत चुनावों के माहौल में इस सवाल का एक और चिंताजनक पहलू सामने आता है—गांव का विकास करने का दावा करने वाले प्रत्याशियों की योग्यता और लोकप्रियता का आकलन कहीं शराब की थैलियों, मुफ्त की महफिलों और चुनावी खातिरदारी से तो नहीं होने लगा है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
पंचायती राज लोकतंत्र की वह बुनियाद है, जहाँ गांव के लोगों को अपने स्थानीय शासन में भागीदारी का अवसर मिलता है। ग्राम पंचायत केवल एक पद या प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन, विकास योजनाओं, सामाजिक न्याय और ग्रामीण भविष्य की जिम्मेदारी है। सरपंच के पास गांव की समस्याओं को समझने, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भूमिका निभाने और ग्रामसभा के माध्यम से जनभागीदारी को मजबूत करने का दायित्व होता है। लेकिन जब चुनावी मुकाबले में जनसेवा के संकल्पों से अधिक शराब की बोतलों, पव्वों और थैलियों की चर्चा होने लगे, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतंत्र का यह उत्सव धीरे-धीरे अपने ही उद्देश्य का उपहास बनता जा रहा है?
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ में पंचायत के पद पर बैठने के बाद व्यक्ति से निष्पक्ष न्याय और जिम्मेदारी की अपेक्षा दिखाई देती है। पंच का महत्व उसकी निजी हैसियत से नहीं, बल्कि न्याय करने की भावना से बनता है। आज उसी पंचायत व्यवस्था के चुनाव में यदि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए शराब बांटने, मुफ्त की महफिलें सजाने और व्यक्तिगत लाभ के लालच देने की शिकायतें सामने आती हैं, तो यह केवल चुनावी अनियमितता का विषय नहीं रह जाता; यह उस नैतिक आधार पर भी चोट है, जिस पर लोकतंत्र खड़ा है। पंच परमेश्वर की कल्पना और शराब के सहारे वोट जुटाने की प्रवृत्ति के बीच का अंतर हमारे समय की राजनीतिक विडंबना को उजागर करता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है, जब चुनावी शराब की खातिरदारी को ही राजनीतिक समर्थन का प्रमाण समझ लिया जाता है। कुछ लोग प्रत्याशी के समर्थक बनकर गली-मोहल्लों में घूमते हैं, शराब की व्यवस्था करते हैं और यह दावा करते हैं कि अमुक व्यक्ति के वोट पक्के हो गए। लेकिन क्या मुफ्त की शराब पीने वाला मतदाता वास्तव में किसी प्रत्याशी का समर्थक बन जाता है? क्या एक शाम की महफिल पांच साल के राजनीतिक संबंधों की गारंटी दे सकती है? मतदाता का निर्णय स्वतंत्र होता है और उसका वोट किसी की निजी संपत्ति नहीं है। जो व्यक्ति शराब की खातिरदारी स्वीकार करता है, वह भी अंततः अपने विवेक से मतदान कर सकता है। इसलिए शराब बांटने वाले प्रत्याशी के लिए यह मान लेना भी भ्रम है कि उसने किसी का वोट खरीद लिया है।
इस प्रवृत्ति का दूसरा पहलू आर्थिक है। चुनाव में यदि कोई प्रत्याशी बड़ी रकम खर्च करके शराब, भोजन और अन्य प्रलोभनों के सहारे समर्थन जुटाने का प्रयास करता है, तो यह सवाल उठता है कि चुनाव जीतने के बाद वह अपने खर्च की भरपाई किस मानसिकता से करेगा। यह कहना उचित नहीं होगा कि अधिक खर्च करने वाला हर प्रत्याशी भ्रष्ट ही होगा, लेकिन चुनाव को निवेश और पद को मुनाफे का साधन मानने की प्रवृत्ति निश्चित रूप से लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा है। पंचायत के बजट और सरकारी योजनाओं का उद्देश्य गांव का विकास करना है, न कि चुनावी खर्च की भरपाई करना। यदि किसी प्रत्याशी की प्राथमिकता ही निजी लाभ हो जाए, तो सड़क, नाली, पेयजल, स्वच्छता और जरूरतमंदों के हित पीछे छूट सकते हैं। इसलिए मतदाताओं को प्रत्याशी के चुनावी खर्च से अधिक उसकी नीयत, कार्यक्षमता और जवाबदेही पर ध्यान देना चाहिए।
लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी भी एक महत्वपूर्ण विषय है। महिला आरक्षण का उद्देश्य महिलाओं को स्थानीय शासन में वास्तविक प्रतिनिधित्व, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और नेतृत्व के अवसर प्रदान करना है। लेकिन यदि किसी महिला को केवल नामांकन भरवाने, दीवारों पर तस्वीर लगाने या औपचारिक प्रत्याशी बनाने तक सीमित रखा जाए और वास्तविक फैसले परिवार के पुरुष सदस्य ही लें, तो प्रतिनिधित्व का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। महिला जनप्रतिनिधि की पहचान केवल उसके नाम से नहीं, बल्कि पंचायत के निर्णयों में उसकी स्वतंत्र और प्रभावी भूमिका से होनी चाहिए। गांव की सरकार तभी समावेशी बनेगी, जब महिलाओं को प्रचार, संवाद, ग्रामसभा और प्रशासनिक निर्णयों में सक्रिय भागीदारी का अवसर मिलेगा।
यह भी समझना जरूरी है कि शराब का कारोबार करने वाला प्रत्येक व्यक्ति चुनावी अनैतिकता में शामिल नहीं होता और न ही शराब बांटने के आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सकता है। सवाल किसी विशेष व्यवसाय या समुदाय को निशाना बनाने का नहीं, बल्कि चुनाव में अवैध प्रलोभनों और मतदाताओं को प्रभावित करने वाली गतिविधियों का है। यदि शराब या अन्य वस्तुओं के वितरण के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश होती है, तो इसकी शिकायत संबंधित निर्वाचन अधिकारियों से की जानी चाहिए। निष्पक्ष जांच, कानूनी कार्रवाई और चुनावी नियमों का समान रूप से पालन ही लोकतंत्र की विश्वसनीयता को सुरक्षित रख सकता है।
अब जिम्मेदारी मतदाताओं की भी है। गांव के जागरूक नागरिकों, युवाओं, सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों को चुनावी चर्चा का केंद्र बदलना होगा। यह पूछा जाना चाहिए कि प्रत्याशी गांव की पेयजल समस्या का समाधान कैसे करेगा? सरकारी विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए उसकी योजना क्या है? पंचायत के धन का हिसाब जनता के सामने कैसे रखा जाएगा? अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी? क्या वह ग्रामसभा को प्रभावी बनाएगा और विकास कार्यों की गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा? ऐसे प्रश्न शराब की महफिलों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनका संबंध गांव के अगले पांच वर्षों से है।
डॉ. भीमराव आंबेडकर की लोकतांत्रिक दृष्टि में राजनीतिक लोकतंत्र के साथ सामाजिक समानता और बंधुता का महत्व भी केंद्रीय था। लोकतंत्र की रक्षा केवल मतदान केंद्र तक पहुंचने से नहीं होती, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय, समान अधिकारों के सम्मान और सार्वजनिक जीवन में नैतिक जिम्मेदारी से होती है। मतदाता यदि अपने वोट का मूल्य समझता है, तो वह क्षणिक प्रलोभन के बजाय दीर्घकालीन जनहित को प्राथमिकता दे सकता है। युवाओं को भी यह समझना होगा कि राजनीति में प्रवेश का अर्थ केवल भीड़ जुटाना, महफिल सजाना या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का समर्थक बनना नहीं है; वास्तविक नेतृत्व समाज की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए ईमानदारी से काम करने में है।
अंततः, पंचायत चुनाव किसी प्रत्याशी की जेब की ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि गांव के भविष्य का फैसला हैं। शराब की एक थैली कुछ समय के लिए उत्साह पैदा कर सकती है, लेकिन उससे गांव की टूटी सड़क नहीं बनती, खेतों तक पानी नहीं पहुंचता, विद्यालय की शिक्षा बेहतर नहीं होती और न ही सामाजिक भेदभाव समाप्त होता है। पांच साल तक गांव की जिम्मेदारी निभाने वाले प्रतिनिधि का चयन कुछ घंटों की खातिरदारी के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
अब समय है कि गांव का मतदाता शराब की थैली नहीं, प्रत्याशी की नीयत देखे; चुनावी शोर नहीं, विकास का रोडमैप सुने; और व्यक्तिगत लालच नहीं, सामूहिक भविष्य को प्राथमिकता दे। लोकतंत्र की चौपाल पर असली सम्मान उसी को मिलना चाहिए, जो जनता के विश्वास को सत्ता की सीढ़ी नहीं, बल्कि सेवा की जिम्मेदारी समझे। यदि गांव की सरदारी को शराब के प्रलोभन से बचाना है, तो जागरूक नागरिकों को आगे आना होगा और ईमानदार, जवाबदेह तथा जनहित के प्रति प्रतिबद्ध नेतृत्व को अवसर देना होगा। यही लोकतंत्र का वास्तविक उत्सव है—और यही उस उपहास से बचने का रास्ता भी, जिसमें गांव की सरकार का फैसला विकास के मुद्दों के बजाय शराब की थैली करने लगे।
संपादकीय
लोकतंत्र का उत्सव या उपहास? जब गांव की सरकार का फैसला शराब की थैली करने लगे!
जिस चुनाव में वोट की कीमत शराब की थैली तय करने लगे, वहाँ लोकतंत्र कमजोर और गांव का भविष्य गिरवी होने लगता है; क्योंकि मतदाता की असली ताकत उसका विवेक है, कोई क्षणिक प्रलोभन नहीं।”



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