संपादकीय

लोकतंत्र की मंडी में जनादेश की बोली तो नहीं लग रही?
संपादकीय@17 सितंबर 2026
चुनाव जीतना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जनादेश क...

रिश्तों की कीमत आवक से नहीं, आदर से तय होनी चाहिए
संपादकीय@18 सितंबर 2026
कभी परिवार में किसी बुजुर्ग की सबसे बड़ी पहचान ...

मर्यादा लांघकर चर्चित होना नहीं, मर्यादा में रहकर दिलों में जगह बनाना बड़ी बात है
संपादकीय@13 सितंबर 2026
आज के दौर में चर्चित होना जैसे सफलता का पर्याय बन...

ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से
संपादकीय@14 सितंबर 2026
प्रतिस्पर्धा जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन ज...

इरादे फौलादी हों तो चुनौती छोटी पड़ जाती है
संपादकीय@ हरेश पंवार- 11 सितंबर 2026
जीवन की राह कभी भी पूरी तरह सपाट न...

चुनाव लोकतंत्र का पर्व, उत्साह से मनाएं
संपादकीय@ हरेश पंवार _10 सितंबर 2026
लोकतंत्र केवल शासन व्यवस्था का नाम ...

काबिलियत और बड़प्पन जिम्मेदारियों की भट्टी में तपकर ही हासिल होते हैं
संपादकीय@हरेश पंवार -9 सितंबर 2026
सुविधाएं इंसान को आराम दे सकती हैं,...

भविष्य की चिंता में वर्तमान का गला न घोंटें
संपादकीय@7 सितंबर 2026
एक व्यक्ति जीवनभर धन कमाने में लगा रहा।...

तेरा-मेरा की संकीर्ण सोच से बिखरते परिवा
संपादकीय@8 सितंबर 2026
मनुष्य ने विज्ञान, तकनीक और भौतिक सुविधाओं के ...

दुर्व्यसन से आच्छादित लोकतंत्र
संपादकीय@हरेश पंवार _6 सितंबर 2026
लोकतंत्र को हम बचपन से एक सरल वाक्य म...

परिश्रम, आत्मचिंतन, मौन और सावधानी—सफल जीवन के चार मार्गदर्शक
संपादकीय@5 सितंबर 2026
एक बार एक बुजुर्ग व्यक्ति ने अपने जीवन के अनुभवों ...

आदर्शहीन जीवन: घटनाओं की भीड़ या सार्थक यात्रा?
संपादकीय@ हरेश पंवार _4 नवंबर 2026
एक बार एक बुजुर्ग शिक्षक से उनके शिष्य...

*बचपन की उंगली से बुढ़ापे के सहारे तक—यही है रिश्तों की असली परीक्षा*
संपादकीय@हरेश पंवार_ 2 सितंबर 2026
एक वृद्ध पिता बरामदे में रोज शाम को कु...


लोकतंत्र का पर्व मनाइए, रिश्तो में राजनीति का जहर मत घोलिए
संपादकीय @हरेश कुमार 27 अगस्त 2026
एक मोहल्ले में चुनाव का मौसम आया। गलिय...

इंसान के मन का जहर, समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा
संपादकीय@हरेश पंवार -26 अगस्त 2026
साँप के फन में भरा जहर शरीर को नुकसान ...

शुद्धता मन की हो, इंसान की नहीं
संपादकीय@ हरेश पंवार -25 अगस्त 2026
एक छोटे से गांव में एक कुआं था। गांव ...

खुशी बाहर नहीं, भीतर की रोशनी है
संपादकीय@हरेश पंवार
एक व्यक्ति सुबह घर से निकला। उसके पास अच्छा मका...

80 वर्ष की आजादी : तिरंगे के नीचे खड़े होकर खुद से पूछने का समय
संपादकीय@Haresh Panwar

रिश्तों में प्रेम जरूरी है, लेकिन अति हर प्रेम को बोझ बना देती है
संपादकीय@Haresh Panwar


देश
राजनीति
Web Story